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व्यवस्थित अव्यवस्था आवश्यक है जीवन के लिए…

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भावनात्मक अधोगमन के साथ ऊर्जा के उर्ध्वगमन के व्युत्क्रमानुपाती नियम के साथ समानानुपाती रूप से आगे बढ़ते रहिये। प्रेम और पैसे के जोड़ या घटाव के परिणाम की चिंता किये बिना दो समानांतर रेखा की तरह बिना किसी के मिले अपनी रेखा पर सीधे चलते रहिये… क्योंकि हर गोल-मोल रेखा भी सरल रेखा के अंश से ही बनती है। एक बार यह बात समझ आ गयी तो जीवन के सारे प्रमेय सिद्ध किये बिना भी सिद्धि पा जाएँगे।

लेकिन सिद्ध हो पाने की सारी यात्रा के दौरान दौड़ते रहना होगा रुधिर की तरह धमनियों में हृदय से ऊतकों तक और शिराओं के साथ लौट आना खाली होकर हृदय में। ये परिसंचरण केवल रुधिर का नहीं, चेतना के उन सूक्ष्म कणों का भी है जो इन रक्तवाहिनियों को चीरकर आवागमन से मुक्त हो जाना चाहती है…

ये जो मंगल लाल दिखाई देता है न वो एक ही दिन में न हो गया होगा। रक्त के इसी लाल रंग को उठाकर पोत आए थे मंगल के मुंह पर गरियाते हुए कि तुम्हारे कारण कुण्डली के जंगल में हमेशा मंगल ही होता रहा और जीवन भर मांगलिक दोष के साथ जिसके भी जीवन में कदम रखा अमंगल ही किया।

अब जान लो कि जीवन में जो कुछ भी अमंगल हुआ या किया वो सिर्फ इसलिए कि गुरु का आकार बड़ा हो सके। मंगल और गुरु के योग से प्राप्त शुभ-अशुभ के संकेत या युति-प्रतियुति के चक्कर में ग्रहों की तरह एक घर से दूसरे घर में कूदते फांदते रहने का खेल भी समाप्त हो जाता है एक समय के बाद।

लेकिन इस समय से परे खड़े होकर ही यह अनुभव होगा कि जो भी तुम्हें दुर्भाग्य या दुर्घटना या दुर्भाव या जो कुछ भी दुर और दूर लगता है वो ऐसी अव्यवस्था है जो जीवन में बहुत व्यवस्थित तरीके से योजनाबद्ध की गयी है, ताकि संघर्ष और जिजीविषा पर सवार तुम्हारी मुक्ति की आकांक्षा क्षण भर को भी विराम न ले।

और तुम पूरी तरह थका देने वाले जीवन से, देह पर चढ़ी धूल की पर्त की तरह लापरवाही से झाड़ते हुए ही मुक्ति पा लो। इतना सहज और हल्का हो जाने के लिए ही ये भारी भरकम विषयों और शब्दावलियों की तरह जीवन में भारी भरकम अव्यवस्था फैलाई गयी है।

ताकि तुम जान सको कि जिन चीज़ों को सहज और सरल शब्दों में कहकर भी बात की जा सकती थी उसके लिए इतनी क्लिष्ट परिभाषाओं की आवश्यकता ही नहीं। जीवन सिर्फ साँसों का आना और जाना ही होता तो इतने प्रपंच फ़ैलाने की आवश्यकता ही नहीं, ये इतना ही आसान है बस एक बार इन क्लिष्ट और कठिन बकवास के पीछे का सबसे सरल सूत्र पकड़ में आ जाए।

बस यही तो कहना था – जीवन इतना ही आसान और व्यवस्थित है, बस एक बार उकताकर कहो तो – क्या बकवास योजना बनाई है, इस भूल भुलैया का क्या फायदा। मैं तो ये चली या चला इस भूल भुलैया के बाहर, अब की बार नहीं फंसना है इस मायाजाल में।

बस रास्ता मिल जाए तो सारी कुण्डलियाँ रीढ़ के मनकों पर कूद-कूद कर ऊपर की ओर चल पड़ेगी। बस मनकों की फिसलन भरी सतह पर पूरी सजगता और साक्षीभाव से कदम रखना क्योंकि अब की बार गिरे तो सीधे मूल में औंधे मुंह गिरोगे।

और पता है ना ऊर्जा के अधोगमन और भावनात्मक उर्ध्वगमन का व्युत्क्रमानुपाती सम्बन्ध होता है।

चलिए बहुत जलेबियाँ घुमा ली.. पुस्तक “युगन युगन योगी”में सद्गुरु ने बहुत सरल और सुन्दर शब्दों में कहा है कि –

फिलहाल आश्रम का माहौल सुनियोजित तरीके से रचा गया है – जहाँ अस्तव्यस्तता भी होती है और उल्लास भी, जो हर किसी को पर्याप्त भ्रम में रखने के लिए बरकरार रखी जाती है। यहाँ पर इतना भ्रम है कि आप साधना करते जाते हैं और इस सोच विचार में भी पड़े रहते हैं कि, – “क्या यह वाकई उपयोगी है?”

लेकिन कभी भी भ्रम इतना ज़्यादा नहीं होता कि यहाँ पूरी तरह अव्यवस्था फ़ैल जाए। इस संतुलन को क़ायम रखना बड़े कमाल की बात है। इसके लिए काफी कोशिश करनी पड़ती है। अगर लोग कुछ ज़्यादा निश्चिन्त हो जाएं, अगर यह संगठन बहुत ज़्यादा व्यवस्थित हो जाए, तो फिर आध्यात्मिक खोज ही नहीं बचेगी, और आश्रम एक कारपोरेशन बन जाएगा। लेकिन साथ ही यह सवाल उठता है कि आप कितनी अव्यवस्था को पचा सकते हैं?”

सद्गुरु मानते हैं कि जब एक गुरु सशरीर मौजूद हो, तो कुछ हद तक लचीलापन संभव है, लेकिन उसके बाद, बड़े पैमाने पर व्यवस्था लाना ज़रूरी होगा।

और सद्गुरु की उपरोक्त बात सिर्फ आध्यात्मिक आश्रम पर ही लागू नहीं होती, राजनीति, राष्ट्र, सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन पर भी बराबर लागू होती है.. बस एक बार अपने जीवन में फ़ैले  अव्यवस्थित ब्लॉक्स को एक दूसरे के साथ जोड़कर तो देखिये आपको एक मुकम्मल तस्वीर नज़र आएगी।

– माँ जीवन शैफाली

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