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ओ मारिया : Paulo Coelho की पुस्तक Eleven Minutes की नायिका

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अगर मुझे आज की ज़िंदगी के बारे में किसी को बताना पड़े, तो मैं इस तरह बता सकती हूँ, जिससे समझ में यह आए कि मैं एक साहसी, प्रसन्न और स्वतन्त्र महिला हूँ…

बकवास : मुझे तो उस शब्द को कहने के भी इजाज़त नहीं है जो ग्यारह मिनटों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है- प्यार!!!

अपने पूरे जीवन में, मैं यह समझती रही कि प्यार किसी प्रकार की स्वेच्छा से स्वीकार की गई दासता है. पर यह सच नहीं है : स्वतंत्रता का अस्तित्व तभी है जब प्यार की उपस्थिति हो…. जो व्यक्ति खुद को पूरी तरह दे देता है, जिसे सम्पूर्ण स्वतंत्रता का अहसास होता है, वही व्यक्ति भरपूर प्यार दे सकता है….

और जो भरपूर प्यार देता है वही स्वतंत्रता का एहसास कराता है….

इसलिए, इस बात से बेपरवाह कि मैं क्या अनुभव करती हूँ, क्या काम करती हूँ, क्या सीखती हूँ, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा. आशा करती हूँ कि यह वक्त जल्दी बीत जाए और मैं खुद को तलाश करने का अपना प्रयास फिर शुरू कर सकूं- एक ऐसे मर्द की तलाश जो मुझे समझ तो सकेगा पर मुझे तकलीफ नहीं देगा……

पर यह मैं क्या कर रही हूँ? प्यार में तो कोई किसी को नुकसान नहीं पहुंचा सकता, हम में से हरेक अपनी भावनाओं के लिए खुद ज़िम्मेदार है और हमें जो बोध होता है उसका आरोप हम किसी दूसरे पर नहीं मढ सकते…

मुझे बेहद तकलीफ हुई थी जब एक एक करके मैंने उन मर्दों को खो दिया जिन्हें मैंने प्यार किया था, अब हालांकि मुझे यकीन हो गया है कि कोई किसी को नहीं खोता क्योंकि कोई किसी का स्वामी नहीं होता…

स्वतंत्रता का यही सच्चा अनुभव है : संसार के सबसे महत्वपूर्ण वस्तु का अपने पास होते हुए भी उसका मालिक न होना….

– उपरोक्त पंक्तियाँ पाउलो कोएलो की पुस्तक Eleven Minutes के अंश हैं

मैं मारिया, पाओलो कोएलो के उपन्यास इलेवन मिनिट्स की नायिका – यूं तो मैं हर उस उपन्यास की नायिका हूं, जिनके लेखक ने औरत को एक शरीर से ऊपर उठकर एक आत्मा के रुप में प्रस्तुत किया है. लेकिन मेरी बात कुछ और है, क्योंकि इसमें मेरी आत्मा तक पहुंचने के लिए मेरी देह को पुल बनाया, उस पर चलकर उसे पार भी किया. अन्यथा अकसर लोग इस पुल पर चलते हुए बस यहीं पर अटक कर रह जाते हैं, उसे पार नहीं कर पाते.

देह के इस पुल पर चलते हुए जिस आनंद का अनुभव हुआ उस क्षणिक आनंद की वह सिर्फ़ झलक मात्र थी, उसकी पूर्णता को तो तब जाना जब मेरी आभा एक ऐसे व्यक्ति के आभा मण्डल में प्रवेश कर गई जो एक नहीं कई शरीरों से गुज़रकर ये जान पाया कि इसमें अब जानने को कुछ नहीं बचा.

फिर भी कुछ तो ऐसा है जिससे ये दुनिया कायम है, और दुनिया को बनाने वाले अदृश्य हाथों का जादू कायम है. ऐसा कुछ खोजते हुए वह मुझसे मिला और मैंने उसे उन पलों में पाया जब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था- यहां तक कि देह के व्यापार में लिप्त होने की आत्मग्लानि भी नहीं, पैसे कमाने का सपना भी नहीं और एक राजकुमार की खोज भी नहीं, जिसको पाने का सपना लिए जब घर से निकली तो फिर सिर्फ़ उस सपने के साथ ही लौट जाने का फैसला किया. उस सपने का साकार आंखों के सामने साक्षात होते हुए भी उसे स्वीकारने का साहस नहीं कर सकी, सिर्फ़ इस वजह से कि सपने का जादुई असर कहीं खत्म न हो जाए.

लेकिन वह नहीं माना एक चित्रकार जो था, मेरी देह ही नहीं मेरी आत्मा को भी कैनवस पर उतारा अपने प्रेम के रंगों में तूलिका भीगोकर….. और मैं हमेशा के लिए उसकी आत्मा के कैनवस पर चित्रित हो गई. और वह मुझे अपने साथ ले गया वहां जहां हम दोनों ने अपने अपने अकेलेपन को एकदूसरे में उड़ेलकर एक नई दुनिया बसा ली.

मैं मारिया, पाओलो कोएलो के उपन्यास इलेवन मिनिट्स की नायिका- यूं तो मैं हर उस उपन्यास की नायिका हूं, जिसने औरत की देह से गुज़रते हुए उसके हर अंग को बड़ी सुन्दरता और कमनीयता से प्रस्तुत किया लेकिन पाओलो कोएलो की बात कुछ और है क्योंकि इस उपन्यास को लिखते हुए देह के जिन अनछुए हिस्से को उन्होंने छुआ है और जितनी बार छुआ है ऐसा लगा मानो मैं किसी पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग की यात्रा को निकल गई और बस स्वर्ग की एक झलक दिखाकर यूं धीरे धीरे नीचे उतारा कि जैसे मैं किसी हलके से सूखे पत्ते पर बैठकर नीचे उतर रही हूँ…

और ऐसा एक तरीके से नहीं कई तरीकों से उस उत्कर्ष सीमा तक पहुँची हूँ… फिर चाहे वो प्रेम का कोमल स्पर्श हो या कठोर चाबुक का दर्द…

Female Orgasm एक बहुत ही सामाजिक विषय (जिसे लोगों ने असामाजिक और वर्जित करार दिया है), पर लेखक ने एक पुरुष होते हुए जिन शब्दों में औरत की कामुक प्रवृत्ति का वर्णन किया है कि कोई भी औरत प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती…

महिलाओं को ओर्गेज्म पुरुष की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों ही में किस तरह से प्राप्त हो सकता है.. कैसे वो पुरुष के बिना भी उसे प्राप्त कर सकती है उसे इस बेबाकी से प्रस्तुत किया है कि मैं खुद को उन अनुभवों से गुजरता हुआ देख आत्माभिभूत हो रही थी….

यह उपन्यास हर उस लड़की को पढ़ना चाहिए जिसने अभी अभी अपने शरीर को पहचानना शुरू किया है…

और हर उस औरत को पढ़ना चाहिए जिसे ये लगता है कि वह अपने शरीर के हर अंग को पहचानती है…

और हर उस औरत को जिसने एक पुरुष के पीछे अपना पूरा यौवन बर्बाद कर दिया हो…

और हर उस औरत को जिसने अपनी देह को एक मंदिर और आत्मा को उस मंदिर की मूरत समझकर पूजा हो….

 – माँ जीवन शैफाली

Photo Courtesy Bollywood Photographer Jayesh Sheth

शेरोन : जिसे रचा गया है साँसों के संतूर पर, आत्मा की लय में, एक सुंदर शरीर में!

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