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मानो या ना मानो : क्या मार्गदर्शन करती हैं आत्माएं?

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एक खुशहाल परिवार, न पैसे की दिक्कत, न आपसी कलह, न कोई और किल्लत… फिर ऐसा क्या हुआ कि दो भाइयों के पूरे परिवार ने एक साथ जान दे दी। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में 11 लोगों की खुदकुशी की घटना ने देश भर को झकझोर कर रख दिया है। मामले में अभी परिवार के बुजुर्ग की आत्मा का असर माना जा रहा है। ऐसे में इसने रूह, आत्मा, झाड़-फूंक आदि को लेकर हमेशा से चली आ रही बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। आखिर यह आत्माओं को लेकर कोरा अंधविश्वास है या फिर किसी मनोवैज्ञानिक बीमारी का असर, विज्ञान और आस्था की उलझी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं श्रीकांत शर्मा

उद्योगपति सुभाष त्यागी की पत्नी निशा की 1990 में किडनी ट्रांसप्लांट हुई थी। ऑपरेशन के बाद वह कोमा में चली गईं। एक महीना कोमा में रहने के बाद जब वह होश में आईं तो उन्होंने जो कुछ बताया, उसे सुन कर उनके परिजन हैरान रह गए।

निशा का कहना था कि उस एक महीने के दौरान कोई बुजुर्ग उनका ख्याल रखते थे। एसी के कारण उन्हें ठंड महसूस होती थी तो वह बुजुर्ग उन्हें कंबल ओढ़ाते थे और उन्हें प्यार से तसल्ली दिया करते थे, जबकि असल में उस दौरान उनके कमरे में देखभाल के लिए सिर्फ निशा की मां शांति ही मौजूद रहती थीं। निशा जिस बुजुर्ग के बारे में बात करती थीं, उनका चेहरा-मोहरा सुभाष के ताऊजी से मेल खाता था, जिनका निधन काफी पहले हो चुका था।

ऐसा ही अनुभव मीडियाकर्मी शैली अत्रिषी का भी है। वह ग्वालियर में रेडियो जॉकी थीं। दिल्ली की रहने वाली शैली ग्वालियर में कंपनी की ओर से मिले मकान में रहती थीं। मकान मालकिन ने एक रात शैली को बताया कि मेरे ससुर मेरी देखभाल के लिए उस मकान में ही रहते हैं।

शैली ने तब तक किसी बुजुर्ग को उस मकान में नहीं देखा था। उन्होंने मकान मालकिन से पूछा, ‘मैंने तो उन्हें नहीं देखा। कहां हैं वह?’

मकान मालकिन ने कहा, ‘उन्हें मरे हुए 10 साल हो गए हैं। लेकिन वह गए नहीं, यहीं रहते हैं।’ यह सुनकर शैली को तो जैसे चक्कर ही आ गया।

खोरशेद भावनगरी की किताब ‘द लॉज़ ऑफ द स्प्रिट वर्ल्ड’ में बताया गया है कि यह किताब उनके बेटों विस्पी और रतू की आत्माओं ने लिखवाई। उनका मकसद इस लोक के वासियों को जीवात्मा लोक के बारे में जानकारी देना और यह बताना था कि जीवात्मा लोक के भी तयशुदा नियम होते हैं।

जब कोई आत्मा पृथ्वी लोक से उस लोक में जाती है तो उस लोक में पहले से मौजूद उनके प्रियजनों की आत्माएं उन्हें लेने आती हैं। विस्पी और रतू की एक कार हादसे में जान चली गई थी। अपनी मां को कथित तौर पर किताब लिखवाते हुए उन्होंने बताया कि उनके शरीर से जब उनकी आत्मा निकली तो नानाजी उनके पास आए और उन्हें बताया कि वह जीवात्मा लोक में उनका मार्गदर्शन करने के लिए उन्हें लेने आए हैं।

क्या मार्गदर्शन करती हैं आत्माएं?

निशा या शैली के अनुभव आत्माओं के वजूद पर सोचने को मजबूर करते हैं। अगर आत्मा का वजूद है तो इसकी संभावना बनती है कि वे अपने परिजनों की मदद के लिए पृथ्वी लोक पर रहती हैं।

वैसे हिंदू धर्म के अनुसार, व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद आत्मा बरसी तक पृथ्वी पर रहती है। फिर वह अपने कर्मों का लेखा-जोखा देने के लिए धर्मराज तक पहुंचती है और तब नए रूप में आने तक वह पितर लोक में वास करती है। वहीं से वह अपने प्रियजनों के मार्गदर्शन के लिए धरती पर भी आती है।

धर्म में आत्मा और परमात्मा के मिलन को ही किसी भी जीव के अस्तित्व के होने का उद्देश्य माना जाता है। इसीलिए आत्मा कहें या रूह, धर्म में उसका वजूद माना जाता है। हिंदू धर्म हो या मुस्लिम, आत्मा या रूह को लेकर दोनों धर्मों के गुरू अपने-अपने ढंग से इस बारे में तर्क देते हैं।

उज्जैन में साधक कांता गुरू पुनर्जन्म की थ्योरी का विश्लेषण करते हुए आत्माओं का वर्गीकरण अच्छी आत्मा और दुष्टात्माओं के तौर पर करते हैं, जबकि जामे शहीद दरगाह पंजा शरीफ के मौलाना मजहर अब्बास मजहर गाजी पुनर्जन्म को मानने से इनकार करते हैं, लेकिन अल्लाह के भेजे आखिरी इमाम इमामे मेहदी के आने की बात कहते हुए इस धरती पर मौजूद सभी रूहों के पलट कर आने का दावा करते हैं। लेकिन कांता गुरू या मौलाना मजहर अब्बास में से कोई भी ऐसा कोई सबूत नहीं दे पाए, जिसे विज्ञान स्वीकार कर सके।

मनोवैज्ञानिक बीमारी है यह

मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक इन सारे तर्कों को सिरे से नकार देते हैं। आत्मा, भूत-प्रेत बाधा आदि को वे अंधविश्वास से उपजा रोग मानते हैं। मनोचिकित्सकों का मानना है कि विज्ञान आत्मा के वजूद को ही स्वीकार नहीं करता। कथित रूप से आत्माओं, भूत-प्रेत के असर में आए लोगों की अजीबोगरीब हरकतों या अपनी शक्ति से ज्यादा किसी काम को करने का कारण वे जुनून या उन्माद को मानते हैं। इहबास के डायरेक्टर और मनोचिकित्सक डॉ. निमेष जी देसाई कहते हैं कि विज्ञान किसी के भी होने का सबूत मांगता है। आत्मा के वजूद का सबूत क्या है? ऐसे में बुराड़ी कांड के पीछे आत्मा का हाथ होने की बात पूरी तरह कोरा वहम है।

आत्मा के वजूद के सवाल का जवाब खोजते हुए अवचेतन मन की शक्ति और टेलीपैथी जैसे बातों को जेहन में रखना जरूरी है। आयरलैंड में जन्मे और बाद में अमेरिका में जा बसे डॉ. जोसेफ मर्फी ने अपनी किताब ‘द पावर ऑफ यॉर सबकॉन्शस माइंड’ में दावा किया है कि उन्होंने इस शक्ति के जरिए ट्यूमर को ठीक कर दिया।’

अपनी रिसर्च के सिलसिले में काफी अरसे भारत में भी रहे डॉ. मर्फी लिखते हैं कि आपका अवचेतन मन आपके विचारों पर प्रतिक्रिया करता है और उन्हीं के अनुरूप अनुभवों, घटनाओं और परिस्थितियों को पैदा कर देता है। इस सिद्धांत के अनुसार इंसान जो सुनना चाहता है, उसकी कल्पना कर उसे सुन लेता है। ललित और उसके परिजनों, निशा या शैली और उसकी मकान मालकिन के अवचेतन मन ने भी शायद उनके विचारों के अनुसार परिस्थितियों को पैदा किया।

मनोचिकित्सक डॉ. अरविंद कामरा का कहना है कि ललित और उनके परिजन ‘मानसिक रूप से बीमार’ थे और उन्हें सही इलाज की जरूरत थी। ‘पुनर्जन्म और कर्म की थ्योरी’ को भी सिरे से नकारते हुए उनका कहना है कि इन सबका कोई आधार नहीं है।

डॉ. कामरा के अनुसार, ललित जिन बातों को अपने पिता की बात समझता था, मुमकिन है, वे बातें उसके मन में पहले से ही बैठी हों और उन बातों को अपने पिता की बात कहकर परिवार का समर्थन लेता हो।

सामूहिक खुदकुशी के मामले में भी इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि परिवार के सदस्यों को इस बात पर विश्वास होगा कि ललित के पिता की आत्मा उन्हें बचा लेगी। लेकिन ऐसा तो तब होता, जब सचमुच उनकी आत्मा का कोई अस्तित्व मौजूद होता। आत्मा को घर में आने के लिए दरवाजा-खिड़कियां क्यों खोल कर छोड़ने की जरूरत थी, जबकि मान्यताओं के अनुसार आत्माएं तो कहीं भी, किसी भी प्रकार से आ-जा सकती हैं। फिर अगर आत्मा वाकई थी तो उसने इन लोगों को बचाया क्यों नहीं!

पूरे परिवार पर हो सकता है असर

मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी बुराड़ी मामले को साइकोटिक डिस्ऑर्डर बताते हैं। डॉ. त्रिवेदी के अनुसार मनोरोगियों में व्यक्तित्व को लेकर जब विकार आता है तो वह बाई पोलर डिस्ऑर्डर हो सकता है जिसमें दो अवस्थाएं होती हैं। इन अवस्थाओं को मतिभ्रम की स्थिति माना जाता है।

सिजोफ्रेनिया को स्पिलिट पर्सनैलिटी डिस्ऑर्डर माना जाता है। लोगों को लगता है कि वह किसी के वश में है। ऐसा मनोरोगी खुद को दूसरे की पर्सनैलिटी में समझता है। वह कहते हैं कि ललित के साथ उसके परिवार के बाकी 10 सदस्यों का बर्ताव उन्हें ‘शेयर्ड साइकोटिक डिस्ऑर्डर’ का शिकार दिखाता है।

ललित को अपने पिता पर अगाध श्रद्धा रही होगी और उन्हें विश्वास होगा कि इस दुनिया से जाने के बाद भी पिता परेशानियों में रास्ता दिखाएंगे। अपनी आवाज जाने के बाद ललित ने पिता को याद किया होगा और उन विचारों के कारण वह ललित को सपने में दिखाई दिए। जो ललित सोचते होंगे, वही उन्होंने अपने पिता के मुंह से सुना होगा। इलाज के कारण उनकी आवाज लौटी तो पिता पर ललित और बाकी परिजनों की श्रद्धा बढ़ गई। वे सब ‘शेयर्ड साइकोटिक डिस्ऑर्डर’ का शिकार हो गए।

शेयर्ड साइकोटिक डिस्ऑर्डर के शिकार लोगों को एक जैसा विश्वास होता है। कोई आवाज न आने पर भी उन्हें एक जैसी ही आवाजें सुनाई देती हैं। कोई आकृति न होने पर भी एक जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं। पिता की आत्मा का ललित पर आना मतिभ्रम हो सकता है। ऐसे में इंसान की हरकतें ऐसी हो जाती हैं जो उसकी ताकत से परे होती हैं। पूरा शरीर दिमाग से जुड़ा होता है और अवचेतन में तनाव होने पर उसमें उन्माद चढ़ने लगता है। उस हालत में वह अजीब-सा बर्ताव करने लगता है जिसे देखने वाले परालौकिक शक्तियों का नाम देते हैं। यह सब दिमाग से एक खास तरह का केमिकल निकलने की वजह से होता है। इसी की मात्रा कम करने के लिए मरीज को दवा दी जाती है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार यही बात निशा, शैली की मकान मालकिन आदि पर भी खरी उतरती है। निशा को सिर्फ महसूस होता था कि कोई बुजुर्ग उनकी देखभाल कर रहा था, जिसका कोई सबूत नहीं था। शैली को जब तक मकान मालकिन के ससुर की आत्मा के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तब तक वह उस मकान में आराम से थीं, लेकिन जब उन्हें बताया गया कि कोई आत्मा उस मकान में घूमती है, तो वह वहां एक रात भी नहीं बिता सकीं।

यह सब माइंडसेट का खेल है। हरियाणा में एक शख्स पर ‘ऊपरी हवा’ लगने का अंदेशा था। लोगों का मानना था कि उसके छोटे भाई का भूत उसे सता रहा है क्योंकि उसने अपने भाई की अर्थी का अपमान किया था। लेकिन बाद में पता लगा कि उस शख्स को लिवर का कैंसर था जिससे उसकी मृत्यु हो गई। कैंसर की छटपटाहट में उस व्यक्ति के बर्ताव को गांव वाले भूत-प्रेत का चक्कर बताते रहे जिससे उसकी पीड़ा कई गुना बढ़ गई।

विधु विनोद चोपड़ा की ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ में मुरली शर्मा की भूमिका निभाने वाले संजय दत्त को गांधीजी दिखाई देते हैं, जिनके बारे में लाइब्रेरी में तीन दिन-रात बैठ कर दिमाग को आराम दिए बगैर अध्ययन किया होता है। मुरली अध्ययन सामग्री में गांधीजी को इतना आत्मसात कर लेता है कि वह उसे साक्षात दिखने लगते हैं और उससे बात करते हैं। मुरली लोगों के उन्हीं सवालों के जवाब दे पाता है जिनके जवाब उसे पहले से आते हैं। जैसे ही उससे वे सवाल पूछे जाते हैं जिनके जवाब उसे नहीं आते, वह हकबका जाता है।

अक्षय कुमार की ‘भूल भुलैया’ में भी नायिका सिर्फ कहानियों के आधार पर पहले किसी राजा के अत्याचार की शिकार हुई नर्तकी की भूमिका में घुस जाती हैं। ‘भुल भुलैया’ में तो इस विषय को बहुत ही मनोवैज्ञानिक तरीके से बड़ी खूबसूरती से पेश किया गया।

हालांकि ऐसे डॉक्टरों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि इलाज तो हम पूरे मन से करते हैं, लेकिन मरीज को तंदुरुस्त करने वाला तो ईश्वर ही है। अब अगर ईश्वर का वजूद है तो आत्माओं के अस्तित्व को भी सिरे से नकारा नहीं जा सकता। घूम-फिरकर बात सबूत पर आकर रुक जाती है। जब तक कोई सबूत सामने नहीं आता, तब तक विज्ञान के ज्ञान को मानना ही बेहतर है।

प्लेनचिट: एक आत्माकथा!

किसी आत्मा को बुलाने की कोशिश एक बार मैंने भी की थी। कोई आत्मा सचमुच मेरे पास आई थी कि नहीं, यह मैं दावे के साथ नहीं कह सकता। 1966 के आसपास की बात है। उस वक्त प्लेनचिट की चर्चा आम थी। लोग अपने घरों में प्लेनचिट का अनुभव करने को उत्सुक दिखने लगे थे।

मेरी उम्र उस वक्त करीब 15 साल की रही होगी। जिस मकान में मैं अपने माता-पिता के साथ रहता था, उसमें एक तहखाना था। उस तहखाने में कबाड़ पड़ा होने के बावजूद उसका थोड़ा-सा हिस्सा बैठने लायक था। प्लेनचिट को लेकर मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। एक दिन मेरे माता-पिता बाजार गए हुए थे। मौका पाकर मैंने अपने तीन मित्रों के साथ प्लेनचिट का अनुभव करने की योजना बनाई।

जैसा सुना था, उसी के अनुसार हम लोगों ने घर में रखी पुरानी चौकी पर चार मोमबत्तियां जलाईं। चारों दोस्त उस चौकी के चारों ओर मोमबत्तियों के सामने बैठ गए। एक सफेद कागज पर पेंसिल से कुछ लिखकर उसे चौकी के बीचोंबीच रख दिया। उस कागज के बीच में एक पुरानी-सी कैंची रख दी। हम इस असमंजस में थे कि किसकी आत्मा को बुलाया जाए?

यह सोच कर कि किसी के दादाजी की आत्मा तो आएगी, यह तय किया गया कि सब अपने दादाजी की आत्माओं का आह्वान करें। सबने आंखें मूंद कर अपने-अपने दादाजी का ध्यान किया और पेंसिल की नोक कैंची के बीच लगे पेंच पर रख दी। पेंसिल का दूसरा सिरा हम पकड़े रहे। थोड़ी देर सब आंखें मूंदे बैठे रहे। अचानक पेंसिल में हल्का-सा कंपन हुआ और हमने आंखें खोल कर कैंची की तरफ देखा। तभी कैंची तेजी से हिली और हम सब घबरा गए। तहखाने में मोमबत्ती की रोशनी के बावजूद सब कुछ छोड़छाड़ कर हम बाहर की तरफ भाग आए।

मैं आज तक नहीं समझ सका कि कैंची हिली कैसे? मुझे लगता है कि उस सारे माहौल में मेरे हाथ से ही कंपन हो गया था और कैंची हिल गई जो संकेत था कि आत्मा आई है। हालांकि इतना जरूर था कि उस सबका डर काफी दिनों तक मन में बैठा रहा और उसके बाद दादाजी की आत्मा को बुलाने की कोशिश करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।

भूत-प्रेत या पितर v/s मन की बीमारी (राजकमल प्रकाशन की किताब ‘साधु, ओझा, संत’ से साभार)

सुधीर कक्कड़ देश के जाने-माने मनोविश्लेषक हैं। उन्होंने भारत, यूरोप और अमेरिका की कई यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ाया है। ‘साधु, ओझा, संत’ किताब लिखने के लिए उन्होंने मनोरोगियों के संदर्भ में भारतीय चिकित्सा परंपरा और उनके चिकित्सकों के बारे में बरसों रिसर्च की है। पेश है, इसी किताब के कुछ हिस्से:

मैंने मनोचिकित्सकों के भारतीय प्रतिरूपों हकीम-वैद्य, ओझा-गुनिया, साधु-सयानों को समझने की कोशिश की है और उसकी चिकित्सा-प्रणालियों को भी जानने का प्रयास किया है जिसके अंतर्गत वे अपनी शर्तों और मान्यताओं के आधार पर उपचार करते हैं।

पश्चिमी दुनिया में जिसे मनोस्वास्थ्य कहा जाता है, उसकी परंपरा भारत में भी मिलती है। पश्चिमी मनोचिकित्सा की तुलना में यहां ‘दैवी’ तत्त्वों’ पर ज्यादा जोर दिया जाता है। ‘दैवी तत्व’ कहने का तात्पर्य साधु-संन्यासियों के ब्रह्य, भक्तों-उपासकों के कृष्ण अथवा अन्य देवी-देवताओं भर से नहीं है बल्कि इसमें पुरखों की आत्माएं, वनदेवियां, ब्रह्मराक्षस, बह्मपिशाच और सूने में या श्मशान में घात लगाकर बैठे रहनेवाले भूत-प्रेत, चुड़ैलें और डाकिनियां भी शामिल हैं। इसी ‘दैवी-तत्त्व’ को मनाने के कारण मन की विषय-वासना का उपचार बनानेवाले गुरुओं को हम प्रेतात्माओं से जूझनेवाले ओझा-गुनिया से जोड़कर देख सकते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक चेतना से संपन्न व्यक्ति को इस तरह का इलाज विचित्र लगता है, भले ही वह पश्चिम का हो अथवा पूरब का, दक्षिण का हो अथवा उत्तर का। लेकिन फ्रायड ने स्वयं कहा है, मनोचिकित्सा की बहुत-सी पद्धतियां हैं और अनेकश: साधन हैं, जिनसे मरीज ठीक हो जाए, वह सभी सही हैं। वास्तविक महत्व इस बात का है कि उपचार करनेवाले में रोगी का विश्वास है कि नहीं और उपचार करनेवाला रोगी में विश्वास जगा पाता है या नहीं।

पश्चिमी मनोचिकित्सक अत्यधिक मनोविकारों का इलाज करते हैं जबकि बाबा विशेषतया उन्हीं मनोविकारों का इलाज करते हैं जो धार्मिक-आध्यात्मिक दायरे में आते हैं तथा जिनकी मनोचिकित्सा की पश्चिमी प्रणाली में उपेक्षा की जाती है। प्रेतबाधा जनित रोगों से छुटकारा दिलानेवाले व्यक्ति के रूप में बाबा की साख संतुष्ट मरीजों ने बनाई है। इस तरह उनके पास जो मरीज आते हैं, उन्हें पहले से ही विश्वास होता है कि उनका इलाज हो जाएगा। इस विश्वास के कारण इलाज में मदद मिलती है।

तंत्र द्वारा बीमारियों के इलाज की बात गलत तो नहीं है लेकिन इसकी एक सीमा है। तंत्र द्वारा इलाज में खास तरह की नाटकीयता होती है मसलन जलती चिता से लकड़ी लाकर उस पर रोटी पकाई जाए तो खाने से मिरगी दूर होगी या मानव खोपड़ी से पानी पीना। नतीजे वे भी देते हैं और ये भी देते हैं। 100 फीसदी रिजल्ट वे नहीं देते और ये भी नहीं देते।

उपचार की पद्धतियों तथा उपचारकों के बीच में जो अंतर पाया जाता है, उसे महज ‘पारंपरिक’ और ‘आधुनिक’ या ‘पश्चिमी’ और ‘एशियाई’ पद्धति का अंतर कहकर नहीं टाला जा सकता। यह अंतर हर संस्कृति और हर काल में समान रूप से विद्ममान रहा है। कुछ लोग विचारधारात्मक स्तर पर इस बात को मानते हैं कि बीमारियां शरीर की खराबी से पैदा होती हैं। ये लोग प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर औषधि द्वारा निदान करते हैं। कुछ अन्य लोगों का मानना है कि बीमारियां मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कारणों से पैदा होती हैं। ऐसे चिकित्सक अपने निदान में तर्कबुद्धि का सहारा नहीं लेते या कहें कि तर्कबुद्धि का वैसा इस्तेमाल नहीं करते जैसा पहली कोटि के चिकित्सक करते हैं। ये लोग चिकित्सक कम तथा पुजारी या साधु-संत ज्यादा होते हैं।

बालाजी मंदिर में जो व्यक्ति इलाज के लिए पहुंचते हैं, उनमें अधिकार हिस्टीरिया पीड़ित होते हैं। इनमें बहुतेरी युवा स्त्रियां होती हैं। यदि पारंपरिक भाषा में कहें तो उन पर प्रतिबंधित कामेच्छा या आक्रामकता के भूतों का साया होता है। बालाजी मंदिर में आई महिलाओं विशेषकर ग्रामीण स्त्रियों से अपने साक्षात्कार के दौरान में इस बात से अचंभित रह गया कि उनके अंदर वर्षों से दबा क्रोध पड़ा था। अबला युवतियों का दबा हुआ क्रोध सामाजिक प्रतिबंध के कारण निकल नहीं पाता और इस अवस्था में वह एक फलक का रूप धारण कर लेता है जिस पर हिस्टीरियाजनित मनोविकार के वैयक्तिक चित्र उभरते हैं।

औरतों के मामले में हिस्टीरियाग्रस्त होने का लक्षण हम सामाजिक रूप से उनका असहाय होना पाते हैं। कमोबेश भारतीय नारियां इससे सामान्य रूप से पीड़ित हैं। पुरुषों में हिस्टीरिया का लक्षण है स्वायत्त होने की मांग तथा व्यक्ति के रूप में अकेले हो जाने की चिंता।

माना जाता है कि पढ़े-लिखे तथा मेधावी लोगों एवं स्वस्थ अथवा तेज स्त्रियों पर प्रेत की छाया नहीं पड़ती। चिकित्सा की पद्धति चाहे कोई भी हो, उसका फायदा सबको समान रूप से नहीं पहुंचता। इसी तरह बालाजी मंदिर आने वाले सभी रोगी ठीक होकर जाते हैं, ऐसा नहीं है। कभी-कभी ऐसा होता है कि रोगी दरबार में ‘अर्जी’ दे, उसकी ‘पेशी’ भी हो और भूत अपना ‘बयान’ भी दर्ज कराए लेकिन रोग के लक्षण समाप्त नहीं होते। ऐसे मामलों में कहा जाता है कि रोगी को कई संकटों ने घेर रखा है।

मैंने बहुधा यह अनुभव किया है मेरे और इन चिकित्सकों के, ओझों पीरों-फकीरों के बीच-एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दूरी है। इस दूरी के कारण मुझे उन्हें भांति-भांति समझा भी जा सकता है या नहीं। जब भी मन में इस तरह की शंका जन्म लेती थी मैं सोचकर संतोष कर लेता था कि किसी बात को पूर्णरूपेण समझना इंसान के बस की बात नहीं। यह काम तो केवल ईश्वर ही कर सकता है।

– राजेश मित्तल के सौजन्य से

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