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प्रस्तुतिकरण का मस्का और ऑनलाइन शॉपिंग का चस्का

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एक दिन दोनों बेटे मेरे पास आए – क्या आपके पास नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे रुपये हैं?

नहीं, मेरे पास तो नहीं है… मुझे तो ये भी नहीं पता नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे लिखते कैसे हैं… लेकिन आपको क्यों चाहिए है?

अरे… चार बार 9 लिखो और नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे रुपये हो जाते हैं… और आपके पास नहीं भी होंगे तो चलेगा आप ऑनलाइन खरीद सकती हैं उसके लिए आपको पैसा नहीं देना पड़ता बस फोन नंबर डायल करना पड़ता है… आपके लिए किचन सेट खरीदना है … पता है उसमें दस थालियाँ, इत्ते बाउल्स, इत्ते चम्मच… और उन दोनों ने पूरी लिस्ट गिना दी…

अरे नहीं भाई सिर्फ फोन कर लेने से वो फ्री में नहीं दे देंगे, ऑनलाइन का मतलब इन्टरनेट की मदद से आपके बैंक से वो पैसे निकाल लेते हैं… और हमारे घर में तो कितने सारे बर्तन है और बर्तन खरीद के कहाँ रखेंगे…

लेकिन वो लोग साथ में फ्री में बहुत सारी चीज़ें दे रहे हैं…

उनको बहुत समझाया, फ्री के लालच में ही लोग बिना ज़रूरत की चीज़ों का ढेर घर में लगा लेते हैं… चीज़ें वही खरीदना चाहिए जिसकी ज़रूरत हो…

अच्छा तो आप बर्तन मत लेना… ये ले लाना.. वो ले लेना… ये हमारे पास नहीं… ये भी नहीं…. उनकी फरमाइश चालू रही….

उनको समझा ही रही थी कि पड़ोस की आंटी बड़ा सा झोला लिए घर में आई… उनके चेहरे से खुशी ऐसे झलक रही थी मानो खज़ाना मिल गया हो…

आइये आंटी क्या बात है आज बहुत खुश नज़र आ रही हैं..

हाँ सच्ची! देखो ना ये डिब्बे नौ सो निन्यानवे में पूरे नौ डिब्बे मिले हैं, उस पर यह फलाना चीज़ फ्री और इतने महीने की वारंटी भी है… और….

वो और भी कुछ बोलती रही और मैं अपने दोनों बच्चों को निरीह भाव से देख रही थी और मेरे दोनों बच्चे उत्साहित होकर आंटी के डिब्बों को…

 

क्या फर्क है इन दोनों मासूम बच्चों और वयस्क आंटी में… सिर्फ उम्र का… दिमाग दोनों तरफ एक ही चीज़ से प्रभावित हुआ है, और वो है शॉपिंग चैनल्स पर ज़ोर जोर से चिल्लाकर जल्दी जल्दी चीज़ों के फायदे और कीमत बताना… सारी खूबियाँ गिना डालना और खरीदने के आसान उपाय बताना जैसे कि बस एक फोन लगाइए या फिर नेट बैंकिंग से आर्डर कीजिये…

 

जो चीज़ें पहले घर घर हुआ करती थीं, वो अब ऑनलाइन आप हजारों रुपये देखर खरीद रहे हैं

वास्तव में विज्ञापन बनाने में मनोविज्ञान पर बहुत बारीकी से काम किया जाता है. जिन वस्तुओं की आपको ज़रूरत नहीं, उसके बारे में इतनी खूबी से इतना सारा और इतनी जल्दी जल्दी बताया जाता है कि आपको सोचने का मौका ही नहीं मिलता. आपके मन में तुरंत यह बात बैठ जाती है कि ये चीज़ आपके बहुत काम की है और इसके बिना आपका गुज़ारा हो ही नहीं सकता.

महिलाओं में ये विशेष तरीके से काम करता है साड़ी, गहने, बर्तन और दूसरे किचन एप्लायंसेस इतनी सुन्दर तरीकों से दिखाए जाते हैं कि वे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकतीं.

दूसरी महत्वपूर्ण बात ऑनलाइन खरीदी हुई चीज़ों में ना आप भाव ताव कर सकते हैं, ना चीज़ खराब आने पर उसे बदल सकते हैं. मैंने बहुत सारे लोगों से ये शिकायत सुनी है कि खरीदी गयी वस्तु टूटी हुई मिली या वो नहीं भेजी गयी जिसका लालच दिया गया था.

इतनी दूर से मंगवाई गयी चीज़ों को बदलने की परेशानी में पड़ने से बेहतर हमें अफ़सोस मनाकर रह जाना आसान लगता है.

टीवी पर पहले सिर्फ विज्ञापनों के ज़रिये ग्राहकों को लुभाया जाता था जो गाहे बगाहे किसी कार्यक्रम के बीच में आते थे जिसे अक्सर लोग देखा अनदेखा कर देते थे. लेकिन अब चौबीसों घंटे चलने वाले ऐसे चैनल्स ने माहौल और बिगाड़ दिया है.

ऐसे चैनल्स देखकर सड़क किनारे सब्ज़ी बेचने वालों की याद आती है जो चीख चीखकर अपने ग्राहकों को आकर्षित करते हैं कि हमारे पास आइये हमसे खरीदिये, यहाँ चीज़ें सस्ती मिएंगी. और सस्ते के चक्कर में कब हम बिना उपयोग की चीज़ों पर रुपये व्यर्थ में खर्च कर घर में कबाड़ा इकठ्ठा कर लेते हैं हमें पता ही नहीं चलता.

कुछ चीज़ें है जो सस्ती मिलती होगी, अच्छी भी होगी लेकिन उसके लिए अपने विवेक और जेब की गुंजाइश और आवश्यकता को ध्यान में रखिये. उनका तो काम ही है मस्का लगाना लेकिन आप फिसलिये नहीं, संभलकर चलिए.

ऑनलाइन शॉपिंग का चस्का एक बार जग जाए तो आसानी से निकलता नहीं है. इसलिए दिखावे पर न जाएं, अपनी अक्ल लगाएं.

– माँ जीवन शैफाली

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