Menu

ओ हंसनी… कहाँ उड़ चली… – 2

0 Comments


सरधो दीदी

नाम तो उनका शारदा था पर लोग उन्हें सरधो पुकारते थे। उसमें प्रेम का अपभ्रंश कितना हुआ था, कहना मुश्किल है। मेरे लिए वे सरधो दीदी थीं। जबसे मैंने सरधो दीदी की संज्ञा को समझना शुरू किया तब से उन्हें एकनिष्ठ देखा। वही सफेद धोती, वही धवल हास और शंभु भैया के लिए जीवनपर्यन्त वही विकल मन। ये तीन चीजें कभी बदल न सकीं।

सरधो दीदी का ब्याह हुआ पर दांपत्य जीवन की दामिनी क्षण भर के लिए छिटक कर जीवन भर के वैधव्य में बदल गई। वे निःसंतान रहीं। सहोदरा ने अपना बेटा उन्हें सौंप दिया। सरधो दीदी का मातृत्व लहलहा उठा। शंभु भैया उनकी कोख से नहीं आए थे मगर कोख से आने वाली संतानों के लिए भी वैसा प्रेम होता है क्या!

अगर प्रेम स्वयं अपनी परिभाषा पूछे तो मेरा उत्तर है सरधो दीदी। अगर त्याग और आत्मोत्सर्ग का कोई रूपाकार है तो मेरा उत्तर है सरधो दीदी। अगर संतान के प्रति स्नेह के पागलपन से दूसरों के मन में खीज तक पैदा करते हुए मैंने किसी को देखा है तो वो हैं सरधो दीदी।

सरधो दीदी में मैंने दुख को जीते हुए देखा। शंभु भैया के लिए उमड़ने वाली इच्छा से उपजे दुख को उनके भीतर उठते, बैठते देखा था। शंभु भैया के लिए अनेकानेक कामनाओं में डूबी एक उदास विधवा, एक विकल मां जिसका जीवन ही शंभु नाम का एक व्यक्ति था।

शंभुआ! के लिए उनका प्रात: था। शंभुआ के लिए ही दुपहरी, संध्या और रात्रि थी। वे स्वयं जागती रही कि शंभु सो सके। आधा पेट खाती रहीं कि शंभु को पूरा मिल सके। दौड़ दौड़ कर मेरी मां के पास आती रहीं कि शंभु को सर्वस्व मिल जाय। और गर शंभु बीमार हो गया फिर तो उनका जीना ही मुहाल।

ऐसा लगता था जैसे जीवन की अथाह दुखधार को पार करती हुई वे प्रेम की खोज में किसी गहन वन में भटक गईं, जहां उन्हें शंभु नाम का शिशु मिल गया और सरधो दीदी स्वयं को भूल गईं। मैं जब तक गांव में रहा, सरधो दीदी का सान्निध्य पाता रहा। सरधो दीदी हमसे बहुत प्रेम करती थीं। शंभु भैया से हमदोनों भाई बहुत स्नेह करते थे और स्वयं शंभु भैया हमपर लहालोट थे। गांव छूटा, सरधो दीदी छूट गई।

कई वर्ष पहले जब उनसे मिला था तब वे अकेली रह गई थीं। शंभु भैया अपनी पत्नी और बच्चों से अलग रहकर नौकरी करते थे। सरधो दीदी ने मुझे देखा तो उन्हें लगा जैसे कोई जादुई चिराग मिल गया हो। उन्होंने शंभु भैया और पत्नी दोनों की एक जगह नौकरी लगवाने की मुझसे गुज़ारिश की थी। बिचारी! एक बेचैन आत्मा थीं जो सिर्फ शंभु का सुख देखना चाहती थीं। उन्हें क्या पता था कि वह सब कर पाना मेरे अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था।

शंभु भैया के जीवन में व्यापे दुख में घुलती हुई सरधो दीदी एकदिन समाप्त हो गईं। पर सरधो दीदी जैसा ममत्व भी मरता है क्या? उनके घर का एक मुहाना मेरे मन में अटका हुआ है, जहां वे अक्सर बैठती थीं। जीवन में बहुत कुछ बीतता है। पर कुछ चीजें बीत कर भी रीत नहीं पातीं। स्मृतियों के शांत परकोटे पर वे कपोत की तरह बैठी रहती है, अचानक कभी जब यादों का अंधड़ आता है तब फड़फड़ाकर उड़ जाती हैं और मनुष्य हताश खड़ा रह जाता है।

मुझे शंभु भैया से मिले हुए कई साल हो चुके हैं। मुझे यह भी नहीं मालूम कि वे इनदिनों कहां रहते हैं। लेकिन मैं जल्द ही उनसे मिलूंगा। उन्हें छूकर सरधो दीदी को अनुभव करना चाहता हूं।

– देवांशु झा

दादी

साल 1990 की एक सुबह मेरे छात्रावास के कमरे में दस्तक हुई। नींद में अनमना सा मैंने दरवाज़ा खोला। सामने राजेन्द्र भैया खड़े थे। चेहरा गंभीर था, मुझसे पेश आने वाले स्वभाव के विपरीत। गांव के राजेन्द्र भैया मेरे पिता के विश्वासी थे और परम सहायक भी।

वे मेरे कमरे में प्रविष्ट हुए और जेब से एक खत निकाल कर मेरे हाथ में थमा दिया। मैंने खत खोलकर पढ़ना शुरू किया ही था कि जड़ होकर रह गया। पिता ने लिखा था कि उनकी प्यारी मां और मेरी स्नेहमयी दादी नहीं रहीं। वे जानते थे कि मेरी इंटरमीडिएट की अंतिम परीक्षा होने वाली थी इसलिए उन्होंने समझाने का प्रयास किया था कि मैं परीक्षा छोड़कर दादी के श्राद्ध में आने का न सोचूं।

मैं चुप खड़ा रहा। आंखों से आंसू झरते रहे, मैं विधाता को कोसता रहा। कुछ देर ठहर कर राजेन्द्र भैया गांव वापस लौट गए। दो दिन के बाद मेरी परीक्षा शुरू होने वाली थी पर अचानक जैसे विधाता ने रुद्ध कंठ को सुन लिया। परीक्षा एक माह के लिए टल गई और मैं उसी दिन गांव रवाना हो गया। घर की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बाबूजी मिल गए। हहर गए थे। लगा जैसे किसी बीमारी से उठे हों। दादी के जीते जी उनके ओठों पर अहर्निश पिता का ही नाम रहा और बाबूजी यथासंभव उनके हर कष्ट का निवारण करते रहे।

मेरी दादी युवावस्था की दहलीज पर विधवा हो गई थी और उन्होंने पूरा जीवन छोटे छोटे केशों के साथ वैधव्य में काटा। तथापि, हंसी उनकी सहोदरा बहिन थी जिसे उन्होंने कभी दूर नहीं किया। हमसे अनन्य प्रेम करते हुए कई बार भिनभिना कर डांटा भी, खासकर तब तो अवश्य डांटा जब मैंने उन्हें बिना नहाए छूने की कोशिश की या उनका भावनात्मक शोषण किया कि दादी मुझे पैसे दो नहीं तो शौच से आकर बिना स्नान किए तुम्हें अशुद्ध कर दूंगा!

दादी बिचारी हंसते हुए, हाथ उठाने की भंगिमाओं के साथ अठन्नी या एक रुपया थमा देती जिनसे मैं गोलियां या पतंगें खरीदता था। दादी और मैं पूरे वर्ष प्रेमभाव से रहते थे। परंतु सर्दियां आते ही मैं उनकी अत्यंत निजी संपत्ति, बोरसी लूटने की कोशिश करता। दादी मानती थीं कि बोरसी पर उनका एकाधिकार है और मैं अनुभवजन्य समझ से जानता था कि दालान के घूरे की बंटी हुई आग से अच्छा है दादी की झिड़कियां खाते हुए बोरसी की प्रदीप्त ज्वाला को मंद मंद भोगना। ज्यों ज्यों सुबह बीतती जाती वे बोरसी अपनी ओर खींचतीं और मैं उनकी ओर खिसकता जाता। तब दादी क्रुद्ध होकर कहतीं, जाओ पढ़ने लिखने!

उन्होंने जीवनभर मेरे पिता के सामने भोजन नहीं किया। जिस पर हम हंसते भी रहे। यूं तो दादी बाबूजी से कुछ घंटे विलग होने को तैयार नहीं होती, दिन में जब तक उन्हें दो तकलीफ़ें न बयां कर देतीं उन्हें चैन न पड़ता पर उन्हें बाबूजी के सामने खाना खाने में लाज आती थी।

मुझे हैरत होती है कि अस्सी वर्ष के जीवन में साठ वर्ष वैधव्य को भोगने वाली, जिन्होंने पति का प्रेम निष्ठुर अल्पायु वसंत की तरह पाया था, वो कैसे हमारे सामने आजीवन वासंतिक स्मित से भरी रही। उतना निष्कलुष मनुष्य मैंने कम देखा। जिसके जीवन की प्रथम और अंतिम इच्छा सिर्फ पुत्र का ध्यान पाना था। एक छोटी सी आह पर मेरे पिता को अपनी ओर आते देखना ही उन्हें अथाह सुख देता था। दो जोड़ी सफेद धोती और हवाई चप्पल उनकी संपत्ति थी। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने दर्पण नहीं देखा। हमारी आंखों में हमें और स्वयं को देखती रही। वहीं से उनके हृदय में हर्ष के शतदल खिले और दुख की वनबेला भी वहीं से झरी। मुझे ऐसा विश्वास होता है कि मैंने अपने जीवन की सबसे धवल हंसी उनके ही चेहरे पर देखी थी।

– देवांशु झा

एक थी चौबाइन

मेरे घर के पीछे पद्मदेव पाण्डेय का मकान था। पद्मदेव पाण्डेय उस जमाने में गाँव के एक मात्र पढ़े लिखे व्यक्ति थे। वह भी Bsc, MA, L.L.B। मेरी माँ और उनकी पत्नी का आपस में बहनापा था। बहनापा इस बात से कि दोनोंका मायका आस पास के गाँवों में था। ये दोनों गाँव एक हीं पिता की दो सन्तानों के नाम पर बसे हुए थे। सन्तानों के नाम थे – कृपाल उपाध्याय और बबुआ उपाध्याय और गाँव के नाम थे – कृपाल पुर व बबुआ पुर। इस नाते पद्म देव पाण्डेय और उनकी पत्नी हमारे मौसा मौसी हुए।

मेरे घर से एक घर छोड़कर चौबे जी का मकान था। पति पत्नी रहते थे। कोई सन्तान नहीं थी। दोनों ” हरि इच्छा बलियसि” मानकर अपना वक़्त गुजार रहे थे। तभी उनके जीवन में भूचाल आया।

हुआ यह कि चौबे जी ने पद्मदेव पाण्डेय (हमारे मौसा ) के घर एक लौकी भिजवा दी। चौबाइन का उस घर की औरतों से कुछ दिनों से अबोलापन था। चौबे जी को पता नहीं था। अब क्या था! चौबाइन ने पूरे घर में कोहराम मचा दी। मेरी लौकी तुमने क्यों दी?

चौबे जी बेचारे हैरान व परेशान! क्या करें! जब यह बात हमारे मौसा के घर वालों को पता चली तो उन लोगों ने अपने घर से एक दूसरी लौकी तोड़कर भिजवा दी, क्योंकि उस लौकी की तो सब्जी बन गई थी।

चौबाइन अब इस ज़िद पर अड़ गईं कि उन्हें वही लौकी चाहिए। आज भी यह किस्सा हमारे गाँव में लोकोक्ति के रूप में जन जन में मशहूर है – चौबाइन की लौकी।

दशहरा का मौसम चल रहा था। कहते हैं कि इन्हीं दिनों लोग जादू टोना सीखते हैं। पद्मदेव पाण्डेय की बड़ी बेटी हमारे घर आई। उसने मेरी माँ से पूछा – मौसी! जादू टोना कैसे किया जाता है? माँ ने मजाक में एक सर्वप्रचलित दोहा कह दिया –

टोना मोना सुप का कोना,
जहाँ भेंजू वहाँ जाओ टोना…

वह लड़की बाहर जा इस टोने को जोर जोर से बोलने लगी। सबने सुना, चौबाइन ने भी सुना। वो कहने लगीं – पद्मदेव की बेटी तो टोना सीख गई। अब एक अक्षर और कहेगी तो टोना हो जाएगा। गाँव के गोपाल अहीर सुन रहे थे। उन्होंने कहा – वो एक अक्षर क्या है? आपको तो पता होगा तभी तो आप कह रहीं हैं? चौबाइन भड़क उठीं। उन्होंने गोपाल अहीर की सात पीढ़ियों का बुरी बुरी गालियां देते हुए इस बावत उद्धार किया कि वे उन्हें डायन कह रहे हैं।

वक़्त का पहिया चलता रहा। चौबेजी दिवंगत हो गए थे। चौबाईन निपट अकेली हो गईं। उन्होंने अपने आप को पूजा पाठ व भगवत भजन में झोंक दिया। वह साफ़ सफाई की बहुत कायल थीं। एक बार उनके गुरूजी आए। उन्होंने सब्ज़ी धोई, फिर कटी, फिर धोई, दाल चावल से एक एक कंकर चुने, धोया और बनाया।

इस सारे क्रिया कलाप में एक विचारणीय समय गुज़र गया। पूरा गाँव सो गया। तब जा कर चौबाइन ने अपने गुरूजी को खाने के लिए बुलाया। गुरूजी के पेट में चूहे कूद रहे थे। उन्होंने इतनी देर बाद खाना खिलाने पर एक तल्ख टिप्पणी कर दी। बस फिर क्या था? चौबाइन ने गुरूजी को भी नहीं बख्शा। उनकी खूब लानत मलामत की। पूरा गाँव जग गया। लोगों ने बीच बचाव किया। गुरूजी को किसी तरह खाना खिलाया गया। आज भी हमारे गाँव में यह लोकोक्ति मशहूर है –

लोग सूती अउरी कुकुर भुकि;
तब चौबाइन के बीजे होखि….

अर्थात् लोग सो जायेंगें, कुत्ते भौंकना शुरू कर देंगे;
तब जा के चौबाइन का खाने का बुलावा आएगा…

चौबाइन मेरे जनम से पहले ही गुजर गई थीं, पर उनके किस्से आज भी जनश्रुति का रूप ले चुके हैं। शायद अकेला पन और नि:सन्तान होना उन्हें इस मनस स्थिति में ले आया था।

– Er S D Ojha

ओ हंसनी… कहाँ उड़ चली…

Facebook Comments
Tags: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!