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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

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आज आपको आँखों सुनी और कानों देखी बात बताने जा रहा हूँ। जी हाँ! आपने सही देखा। अगर सुनने का साहस हो और तपाक से प्रतिउत्तर न देने की आदत हो तभी आगे पढ़े।

ये मार्मिक वृतांत एक बुजुर्ग शख़्स के बारे में है, उनका नाम ‘कृष्ण लाल शर्मा’ है। इंदौर के शीतल नगर में रहते हैं। मुझे शीतल नगर आये अभी 1 महीना ही हुआ है। ऑफिस जाते वक़्त इनको रोज़ाना घर की दहलीज के बाहर एक कुर्सी पर बैठा हुआ पाता, जब ऑफिस से वापस आता तब भी ये वहीं बैठे मिलते। करीब 8 -10 दिन से मैं यह गौर कर रहा था। कोई आस पास भी नहीं बैठा रहता, वैसे ही बड़बड़ाते रहते। न सुबह कोई साथ दिखता, न ही शाम। समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि आखिर बात क्या है?

परसों मैं गली से गुजर रहा था आते वक़्त, तो उनके बगल में बैठ गया और ऐसे ही उनकी तरफ मुँह न करते हुए बैठा रहा। वो भी अपना बड़बड़ा रहे थे मन ही मन, कि अचानक बोले कि – “तुम यहाँ से रोज गुज़रते हो बेटा?”

मैंने कहा – हाँ !

क्या हुआ, ऐसे बैठे हो, किसी का इंतज़ार कर रहे हो क्या?

नहीं तो! थक गया तो बैठा हूँ।

अच्छा! पानी लाऊँ?

कोई है नहीं क्या अंदर आप क्यों तकलीफ ले रहे?

है तो, बहू-नाती पर उनको कौन परेशान करे। बेटा ऑफिस गया है।

अच्छा। अरे! मैं तो भूल ही गया मेरे पास खुद बोतल है पानी की।

पानी पीने लगा पीते-पीते उन्होंने कहा – ‘कटनी’ की बात ही अलग है। मैंने कहा क्यों? इंदौर भी तो कितना अच्छा है। साफ़ – सफाई, बड़ी-बड़ी बिल्डिंग, आपका घर भी तो कितना अच्छा है। खाने पीने का सामान भी हर समय उपलब्ध रहता है यहाँ, पास में ही बाजार होता है। कटनी से तो कई गुना बेहतर है। ऐसा क्या है कटनी में? जो यहाँ नहीं है। उनका जवाब था – “सुकून” और “प्रेम”।

मैंने कहा वो तो आपको यहाँ भी है, आपका बेटा यहाँ आपके साथ रहता है। बहू – नाती सभी तो हैं।

उन्होंने कहा – बेटा साथ नहीं रहता, मैं बेटे के साथ रहता हूँ।

मैंने कहा बात तो वही हुई, हैं तो आप साथ ही ?? साथ हैं, पर पास नहीं।

अब लगा कि कुछ तो है जिस वजह से ये खुद में ही बड़बड़ाते रहते हैं। मैंने कहा हो सकता है आप निराशावादी हो रहे हों? बेटे की अपनी व्यस्तताएँ हैं, बहू-नाती की अपनी जगह।

उन्होंने कहा – हो सकता है। मगर 4 साल से? क्या संभव है? मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या बोलूँ क्यूंकि उनकी आवाज़ खनकने लगी थी, गला भर गया था उनका।

मैंने उनसे कहा – पानी मगाऊँ? बोले नहीं मैं पी लूँगा कमरे में जग रखा है भरा हुआ।

मैं नमस्ते करके घर की तरफ आ गया। सुबह जब ऑफिस गया, वो वहीँ बैठे हुए थे। देखकर हल्का सा मुस्काये, मैंने भी कंजूसी न करते हुए मुस्कुरा दिया और ऑफिस निकल गया। जब वापस लौटा तब भी वो वहीँ बैठे हुए थे। बोले जल्दी में हो? कुछ समय है तो हमसे बातें कर लो। मैं रुक गया और बगल में रखे टाट के बोरे को सरकाकर उस पर बैठ गया।

उनके एक दिन पहले की कही सारी बातें मेरे मन में घूम रही थीं। मुझे फिल्म मसान का एक डायलॉग याद आ रहा था। जहाँ पंकज त्रिपाठी जी से ऋचा जी पूँछती हैं कि –

आप अकेले रहते हो?

नहीं! हम पिताजी के साथ रहते हैं, पिताजी अकेले रहते हैं।

 

उनके अंदर से ‘कटनी’ निकल ही नहीं रहा था। जब से कटनी से आये हैं तब से कटनी को ही रो रहे हैं। ढो रहे हैं। बोले – कटनी में एक घर है। जिसमें 60 साल से रहा हूँ। मेरे पिताजी के पिताजी भी उसी में रहे हैं। वहाँ के मोहल्ले और यहाँ कि कालोनियों में बहुत फर्क है। वहाँ सब मुझे नाम से जानते हैं। यहाँ अगल बगल बालों को मतलब नहीं किसी से।

मैं कुछ ओवर आशावादी बनकर जवाब दे रहा था, मैंने कहा शहर – शहर का फर्क है। आपको प्रॉब्लम किस बात से है यहाँ? आपके मित्र, पड़ोसी , घर ये सब यहाँ नहीं है क्या इसी बात से आपको प्रॉब्लम है? बेटे के साथ रहने का तो हर बाप का सपना है। आपके पास गाड़ी है, इतना अच्छा और बड़ा घर है। फिर क्या प्रॉब्लम है और ‘कटनी’ में कौन है अब? कोई नहीं! फिर इतना क्यों सोचते हो आप?

अपनी ही लिखी हुई एक पंक्ति याद आ गयी.. “बेटे की नौकरी के कारण , बाप का बुढ़ापा भी शहर बदल रहा है।”

ये भी आया कि ‘बाप की नौकरी के चलते बेटे का बचपन भटकता रहा है।’ बिल्कुल सही होगा। कृष्ण लाल शर्मा जी की तरह उनकी भी कहानी होगी कुछ।

बेटे की नौकरी से बाप के बुढ़ापे का भटकना सही है?

और बचपन का भटकना किसे कहते हैं आज कल लोग?

अब परिभाषाएँ बदल रही हैं, खुले विचारों का मतलब फूहड़ विचारधारा होता है आजकल।

माना बचपन भटका होगा मगर कैसा… किस सन्दर्भ में बचपन को भटका हुआ कहा जा रहा है? वैसे भी बचपन को लोग हमेशा से ही सबसे अच्छा समय कहते आये हैं। बचपन हमेशा कवियों, लेखकों के लिए फंतासी का विषय रहा है। बचपन को फिर से जीने की ख्वाहिश रखते हैं। काश! बचपन लौट आये? ऐसी बातें सुनते ही रहते होंगे…

अरे क्यों लौट आये भई बचपन! क्या करोगे बचपन आजायेगा तो? फिरसे ABCD पढ़कर UPSC ही पढ़ोगे। बार बार ABCD पढ़ने और बचपन में जाने का क्यों लगा रहता है सबको। बुढ़ापा भी ख़ुशनुमा होता होगा, कई मायनों में। बाप की नौकरी से घर ही चलता है, मगर यहाँ बाप के पलायन से, उसके भौतिक शरीर को छोड़कर बाकी चीज़ो के ‘कटनी’ में छूट जाने की बात हो रही है।

अभी कृष्ण लाल जी जहाँ हैं वहाँ न बेटा उनके पास होता है, न पत्नी, न बहू, न पड़ोसी और न कोई दोस्त। बात सिर्फ बच्चे, चाय – मोहल्ले का विधवा विलाप करना नहीं है। अगर ऊपर से पढ़ते हुए यहाँ तक पहुंच गए हो तो समझ सकते हो आप? इससे अच्छा, खुश और स्वस्थ शायद वो कटनी में ही रहते। बच्चे पहले भी खुश थे, अभी भी खुश हैं। दुःख सिर्फ उन्हीं को है। मैं और आप सिर्फ बहस ही कर सकते हैं।

उन्होंने बताया एक बार तो उन्होंने खुद स्वयं वृद्धाश्रम जाने का सोच लिया था। Micromax का पुराना मोबाइल है उनके पास, उससे उन्होंने इंदौर में चल रहे वृद्धाश्रम भी खोज लिए थे। मगर फिर बेटे का मुँह देखा तो रुक गए। अब आप घर में अकेले 6 वीं – 7वीं मंजिल का नजारा देखकर प्रसन्न होंगे या सबके साथ रहकर? उनको 6 वीं मंजिल नहीं चाहिए थी, अकेले चढ़ भी नहीं सकते और कोई चढ़ाने के लिए उपस्थित नहीं, जहाँ वो अकेले कुर्सी पर टाँग पर टाँग डालकर गर्व महसूस कर सकें।

संयुक्त परिवार होता; तो भी सही था कि सब लोगों में से कोई एक तो उनके साथ होता। अब यहाँ जो हैं वो भी नहीं हैं। मगर क्या! मन तो लगाना पड़ेगा। दुनिया का दस्तूर, घर घर की कहानी जैसे जुमलों से बात कवर करेंगे और कुर्सी कुछ साल और गेट के बाहर डलती रहेगी। उसमें क्या है। यही होता है, यही होता आ रहा है। यही होना चाहिए?

ये उन्हीं के शब्द हैं जैसे के तैसे में लिख रहा हूँ –

“यहाँ मैं घर के चौकीदार से ज्यादा नहीं हूँ, जो कि दरवाजे पर कुर्सी डालकर और हाथ में डंडा लिए आने – जाने बालों को देखता रहता है और कुत्तो को भगाता रहता है। कटनी में, मैं अपने बेटे की तरह था। 4 साल इंदौर को दिए मगर मुझे कुछ नहीं मिला, सिवाए इस कुर्सी और डंडे के। मैं क्यों रहूं यहाँ, मैं अकेला रह लूँगा कटनी। शायद में वहां रहकर 2 -4 साल ज्यादा ही जियूँ। यहाँ घुटन सी होती है हर दिन।”

‘मुझे अब वापस कटनी ही जाना है, यहाँ मन नहीं लगता।’

ये बात को लगभग 15 दिन हो गए हैं, और कल जब गली से निकला तो कुर्सी की जगह अर्थी ले चुकी थी। द्वार पर भीड़ जमा थी। कुर्सी और डंडा दोनों गेट से सटे हुए रखे थे।

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

– भास्कर सुहाने

बुज़ुर्गों का ध्यान रखने में भारत सबसे अंतिम नंबर पर!

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