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वह अजीब स्त्री : ज़िन्दा स्त्री को अफॉर्ड करना हर पुरुष के वश का नहीं

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लोग बताते हैं कि जवानी में वह बहुत सुन्दर स्त्री थी। हर कोई पा लेने की ज़िद के साथ उसके पीछे लगा था। लेकिन शादी उसने एक बहुत साधारण इंसान से की, जिसका ना धर्म मेल खाता था, ना कल्चर। वह सुन्दर भी खास नहीं था और कमाता भी खास नहीं था। बहुत बड़े, रसूखदार और अच्छी पोजीशन वाले अनगिनत रिश्ते उसके पास आये, अनगिनत प्रेम निवेदन उसके पास आये लेकिन उसने जिसे जीवन साथी चुना वह इन सबमें कमतर था।

लोग उस स्त्री के बारे में सुनते, सामाजिकता में पगे, रटे-रटाये वाक्य दोहरा देते, जैसे कि “बहुत सुन्दर स्त्री की अक्ल घुटने में होती है”, “नखरे निकल जाने के बाद ऐसे ही मिलते हैं”, “ज्यादा भाव खाने वालों को कोई भाव नहीं देता”आदि।

उस स्त्री को ऐसे किसी बीज वाक्य से सरोकार नहीं था, वह अपनी पसंद के जीवन साथी के साथ खुश थी, सुखी थी।

उसकी कहानी एक पत्रकार ने सुनी, उसे इस कहानी में कई रंग नज़र आये। वह उस स्त्री के पास गया। पत्रकार उसकी सुंदरता देखकर दंग था। आज भी वह बेहद सुन्दर और ज़हीन थी।

पत्रकार ने विनम्रता से उस स्त्री को साक्षात्कार के लिए निवेदन किया। स्त्री ज़ोर से ठहाका लगाकर हंसी, बोली “मेरा इंटरव्यू पूरा करने से पहले या तो तुम बीच में भाग जाओगे, या फिर अपनी पारम्परिक सोच को मिक्स करके अपनी ही कहानी पेल दोगे, इसलिए मैं कोई इंटरव्यू देने की इच्छुक नहीं हूँ। आप चाय पीजिये, रुखसत लीजिये।”

पत्रकार के जीवन का ऐसा पहला वाकया था जब एक ही वाक्य में उसका खुद का इंटरव्यू हो लिया था। वह सम्भला और जैसे-तैसे उसने इंटरव्यू के लिए उस ज़हीन स्त्री को राज़ी कर लिया।

पत्रकार ने पूछा, “आप बेहद सुंदर हैं, बहुत स्त्रियों को आपकी सुंदरता पर रश्क़ होता है। आप इसे कैसे लेती हैं?”

स्त्री ने पत्रकार को देखे बिना बाल झटकते हुए जवाब दिया, “बकवास सवाल, मेरे सुंदर होने में मेरा कोई योगदान नहीं, कुदरत ने मुझे दिया, इसे मेरी उपलब्धि ना कहें। अगर मैं इतराती हूँ तो मेरा इतराना गैर वाज़िब है। दैहिक सुंदरता पूर्ण सुंदर होना नहीं।”

पत्रकार असहज हुआ, दूसरा सवाल किया –

“आप ने कभी किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग क्यों नहीं लिया। आप विश्व की कोई भी प्रतियोगिता जीत सकती थीं।’

स्त्री ने इस बार पत्रकार की नज़रों में नज़रें डाल दी। पत्रकार उसके तेज का सामना नहीं कर पाया, उसने नज़रें झुका ली।

स्त्री बोली- “सुंदरता में प्रतियोगिता कैसी। सब अपने अपने हिसाब से सुंदर हैं। गोरी चमड़ी सुंदर क्यों है। बहती नदी को देखिए कभी। जहाँ जहाँ वह गहरी है वहाँ वहाँ सांवली हो जाती है। किसी से सुंदरता की प्रतियोगिता जीत कर आप सुंदरता के मानदण्ड स्थापित करना चाहते हैं? सुंदर लोग आपने देखे नहीं। मेरी झुर्रियों वाली दादी मेरी नज़र में सबसे सुंदर महिला है, आपकी माँ आपकी नज़र में सबसे सुंदर हो सकती है। आपकी पत्नी अपने पिता की नज़र में सबसे सुंदर होगी। आपकी बहन किसी को दुनिया की सर्वश्रेस्ठ सुन्दरी लग सकती है। गुलाब सुंदर या चमेली ये वाहियात प्रतियोगिता है। आगे पूछिये।”

“जी,
आप के संबंध बड़े औऱ रसूखदार लोगों से रहे, फ़िल्म के हीरो भी लट्टू थे आप पर, ऐसा सुना है, फिर शादी आपने एक बहुत ही साधारण इंसान से की। साधारण मतलब लो प्रोफाइल, वैसे तो आपने चुना है तो असाधारण भी हो सकते हैं। क्या कहेंगी आप।”

“देखिये पत्रकार महोदय, मैं इंटरव्यू इसलिए नहीं देती क्योंकि आपके तथाकथित सभ्य समाज मे मैं किसी का आदर्श नहीं हूँ। स्त्रियां मुझे फॉलो नहीं कर सकती। उनकी सामाजिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे खुद पर प्रयोग कर सकें। मैंने खुद पर प्रयोग किये और सुंदर, रसूखदार लोगों से मोहभंग होने के बाद मैंने एक असाधारण पुरूष जिसे आप साधारण कहते हैं को अपना जीवन साथी बनाया। मेरी कहानी किसी के काम नहीं आएगी इसलिए मैं अपनी कहानी जीना चाहती हूं, बांटना नही।”

स्त्री के सहज चेहरे पर वितृष्णा फैलने लगी। वह खामोश हो गई। उसने पत्रकार को चाय दी औऱ ख़ुद भी चाय के घूँट भीतर उतारने लगी।

पत्रकार को लगा यह स्त्री इंटरव्यू के बीच में से उठ जाएगी लेकिन स्त्री ने एक क्षण रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी। पत्रकार चुपचाप उस अजीब स्त्री को देखता रहा, चाय के एक-एक घूँट के साथ उसकी वितृष्णा कम होती गयी। जल्द सहज होते हुए वह बोली, “सॉरी”, फिर उसने एक अजीब सी स्माइल दी।

“जिन लोगों को आप रसूखदार कह रहे हैं दरअसल वे रसूखदार नहीं होते। ये रसूखदार आदमी तमाम सृष्टि का उपभोग कर लेने की वृत्ति के साथ ऊपर तक भरे हैं। उन्हे ज़िंदगी में सब संगमरमर का चाहिए खुद वे बेशक उबड़ खाबड़ खुरदुरा पत्थर हों।

आप हैरान होंगे कि तमाम रसूखदार लोगों की चाह मैं नहीं थी। मेरा जिस्म थी। मुझे पुरुष की वृत्ती मालूम थी। पुरुष ने जिस्म मांगा, मैंने दिया, मैंने वही तो दिया जो उसने मांगा। लेकिन जिस्म भोगने के बाद मैं चरित्रहीन थी, वह चरित्रवान।

मुझे पुरूष की रमझ समझ आ गयी थी। मुझे याद नहीं कि कितने पुरूष थे । लेकिन जितने थे सब मेरी देह से प्रेम करने वाले थे, और सब ही मुझे चरित्र का प्रमाण पत्र देकर गए। मुझे हैरानी हुई कि किसी को मैं देह और चरित्र से आगे नज़र ही नहीं आई।

मैंने एक अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी जिसका एक संवाद मेरे ज़हन में अटका रहा कि प्रेम के वहम में ज़्यादा दिन अटके मत रहो। पहले सेक्स करो फिर प्रेम। मुझे हैरानी हुई कि कि प्रेम के लंबे चौड़े दावे करने वाले पुरूष सेक्स के बाद भागते नज़र आए। वे मुझे अफॉर्ड नहीं कर सकते थे शायद, अमीर थे जबकि। अफॉर्ड करना समझते हैं ना आप। स्त्री को अफॉर्ड करना हर पुरूष के वश का नहीं। तमाम पुरुषों के घर में जो स्त्री है ना वह स्त्री नहीं है, स्त्री की चलती फिरती लाश हैं। जिंदा स्त्री अफॉर्ड करना इस मुल्क के पुरूषों के लिए लगभग असंभव है। पति का तो अर्थ ही मालिक है। मालिक या तो गुलाम रखते है या वस्तुएं। पुरुष क्या, ये मुल्क ही ज़िन्दा स्त्री को अफॉर्ड नहीं कर सकता। पूरे मुल्क की चेतना में ही पितृसत्ता भरी है।”

पत्रकार ने रीढ़ सीधी कर ली।

वह आगे बोली, “एक दिन एक असाधारण पुरूष मेरी ज़िंदगी में आया। जब एक रसूखदार पुरूष मुझे अचेतन अवस्था में अपनी बड़ी सी गाड़ी से फेंक कर जाता रहा।

वह असाधारण पुरुष मुझे नहीं जानता था, मेरा जिस्म लहूलुहान था, उसने मुझे उठाया और हॉस्पिटल की ओर दौड़ पड़ा। मेरा मेडिकल हुआ जिसमें रेप की पुष्टि हुई, मेरे चेतना में आने तक वह पुलिस यातना झेल चुका था, उसका बचना मेरे बयान पर टिका था। मैं चेतना में जब आयी तो देखा कि मेरा पूरा जिस्म पट्टियों में जकड़ा है। मुझे बताया गया कि पुलिस ने उसे ही उठा लिया है जो मुझे गोद मे उठाकर यहां लाया, अपनी रिंग और गले की चेन डॉक्टर के पास रख गया कि मैं नही लौटूँ तो इसे बेचकर बिल चुका देना। उसी रिंग और चेन से पुलिस का शक और गहरा हुआ कि यह इन्वॉल्व हो सकता है।

मैंने किसी के खिलाफ शिकायत नहीं लिखवाई। वह असाधारण पुरूष लौट आया, उसने मुझे देखा, मैं तो टूटी-फूटी पट्टियों में बंधी थी। लेकिन उस पुरूष का वह देखना अद्भुत था। हज़ारों खा जाने वाली नज़रों से अलग कोई नज़र थी जो भीतर तक उतरती चली गयी। उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा, उसका स्पर्श अद्भुत था, वह पुलिस थाने से लौटा था लेकिन उसने अपनी व्यथा नहीं गाई, वह धीरे से बोल पाया, ठीक हो?

मेरी आँखें स्वतः बन्द हो गयी। कोई भी संवाद इतना मर्मान्तक नहीं था आजतक जितना कि ये। मेरी आंख से आंसू टपक पड़ा। मैं भी होले से कह पाई , ठीक हूँ। शुक्रिया मुझे बचाने के लिए।

उसने अपनी उंगली के पोर से मेरी आँख का आँसू उठाया औऱ आसमान में उड़ा दिया। मेरे होते मन नहीं भरना, मैं हूं ना। आजतक इतना बड़ा आश्वासन भी कभी नहीं मिला था कि मैं हूँ। मन छोटा नहीं करना।

उसने मुझे सहारा देकर लिटाया, पूछा, आपके घर मेसेज कर दूं, आपका कोई पता नहीं मिला हमें। मैंने कहा मेरे घर कोई नहीं है, मैं अकेली हूँ। जबकि सब हैं लेकिन मेरी प्रयोग धर्मिता से डरे हुए। मैं उन्हें इत्तलाह नहीं करना चाहती थी। वह असाधारण पुरुष बोला, मेरे घर मेरी छोटी बहन है। आप मेरे घर चलना स्वास्थ्य लाभ के लिए।

मैंने पूछा उससे, मेरी मेडिकल रिपोर्ट पढ़ी आपने?
वह थोड़ा रुंआसा हुआ, बोला हां पढ़ी, आपने उन्हें छोड़ क्यो दिया, रिपोर्ट करते उनके खिलाफ।
मुझे दर्द था तेज़, मैंने कहा। मैं निबट लूँगी उनसे।

उस पुरूष ने अगला सवाल नहीं किया। बोला आराम कीजिये। ठीक हो जाइए पहले फिर निबट लेना। मुझे लगा यह मध्यम वर्गीय परिवार का साधारण पुरूष चरित्र प्रमाण पत्र दे ना दे लेकिन ज़हन में ज़रूर तैयार कर लिया होगा। बड़ी सोसाइटी भी जब वहीं अटकी है तो यहां तो चरित्र बड़ा फसाद होगा।

हॉस्पिटल का बिल मैं भर सकती थी लेकिन मैंने नहीं भरा। उसकी रिंग और चेन बिक गईं। वह मुझे अपने घर लिवा लाया। एक साफ सुथरा साधारण घर था वह। करीने से सजे घर में मेरी नज़र एक बड़ी अलमारी पर पड़ी जिसमें अनेकों किताबें थी। पता चला कि वह साधारण पुरूष दरअसल साधरण नहीं है। उसकी अलमारी में एक से एक बेहतरीन किताब रखी थी। मालूम हुआ वह नास्तिक है। आज तक जितने पुरूष मिले वे सब आस्तिक थे। कोई गले में लॉकेट डाले था, कोई उंगली में नग पहने, कोई माथे पर तिलक लगाए। इसमें जो था सब अपना था, दिखावा नहीं था रत्ती भर भी।

उसने मेरे आराम का प्रबंध किया। मेरे पास बैठा रहा घंटों। मेरी पसंद की उसके पास बहुत किताबें थी लेकिन अद्भुत यह था कि उसकी अलमारी में वह किताब भी थी जिस पर बनी फ़िल्म मेरे ज़हन में थी। उस किताब में उसने कुछ वाक्य अंडरलाइन किये हुए थे कि स्त्री प्रेम पाने के लिए सेक्स करती है पुरूष सेक्स पाने के लिए प्रेम लुटाता है। मेरी पूरी ज़िंदगी इसी एक वाक्य में बंधी थी।

एक दूसरा वाक्य जो मेरे ज़हन में अटका था कि प्रेम के भरम में अटके मत रहो, पहले सेक्स करो फिर प्रेम करो। पढ़ने वाले ने उस वाक्य के नीचे लिख दिया था कि ऐसी स्त्री इस मुल्क में नहीं मिलती लेखक महोदय। मुझे हंसी आ गयी। मैं हूं ना, मैंने खुद को आईने में देखा। मैं तो बची ही नहीं थी, जिस देह को मैं ‘मैं’ समझती थी वह तो जगह जगह से चोटिल थी लेकिन भीतर जो कोई और आकार ले रहा था वह मैं थी। मेरा पुनर्जन्म हो रहा था। मैं अब सिर्फ उस पुरूष को पढ़ती। एक साल मैं उसके घर रही। एक साल उसने मेरी देह को नहीं छुआ। हाथ पकड़ कर बहुत बार उसने चूमा, माथा चूमा लेकिन वह एक आत्मीय स्पर्श था।

एक दिन मैंने उसकी रिंग और गले की चैन उसे लौटा दी। वह हैरान हुआ लेकिन मैंने उसे बता दिया कि इसे बिकने नहीं दे सकती थी। अपने पास रखना चाहती थी सहेज कर। कि जब भी महंगे गहने पहनने होंगे तो इन्हे पहनूँगी। बिल के पैसे देकर जाती लेकिन इस गहने से बड़ा गहना मुझे मिल गया है तो यह गहना लौटा रही हूं।

उसे मैंने मेरा इतिहास बताया, मेरे अफेयर बताये। बताया कि मैं देह के तमाम प्रयोग करके आज जहां अटकी हूँ वहाँ देह कहीं है ही नहीं। वह वो किताब उठाकर लाया। उसने अपने हाथ से लिखी एक और पंक्ति दिखाई कि ऐसी कोई स्त्री मिली तो मैं उसके समक्ष विवाह प्रस्ताव अवश्य रखूँगा। उसने पूछा मुझसे। शादी करोगी? मैं सन्न थी। कितने ही प्रस्ताव आये मुझे लेकिन इसने जैसे मुझे बर्फ के पहाड़ में जड़ दिया हो।

उसके पास लिव इन का ऑप्शन भी था। एक साल में पास पड़ोस कितनी बातें करता था लेकिन उसने कभी कान नहीं धरा। वह परम्परावादी आधुनिक इन्सान था। जो अब तक मिले वे आधुनिकता के छद्म भेष में परंपरावादी थे, जो लिव इन में रहना चाहते थे अनगिनत प्रस्तावों के बाद यह प्रस्ताव मुझे भीतर तक भिगो गया। सच में, एक असाधारण आदमी साधारण भेष में ढंका था। वह देह से आगे स्त्री तक पहुंचा। उसने मुझे भी देह से बाहर निकाला। मैं किस्मत वाली रही कि वह मुझे मिल गया।

स्त्री के चेहरे पर गहरा संतोष पसर आया था। कोई अलौकिक तेज उसके चेहरे पर दीप्त होने लगा था। पत्रकार ने आज उस अजीब स्त्री में स्त्री घमासान के नए पक्ष चिन्हित किये।

– वीरेन्दर भाटिया

ओ मारिया : Paulo Coelho की पुस्तक Eleven Minutes की नायिका

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3 thoughts on “वह अजीब स्त्री : ज़िन्दा स्त्री को अफॉर्ड करना हर पुरुष के वश का नहीं”

  1. Minakshi says:

    अद्भुत रूप से यह कहानी (ऐसे कहानी से कहीं ज़्यादा बढ़कर है) अलग है, बेहद नाज़ुक और सुन्दर है यह..
    पढ़ने के बाद, मौन ही मौन है बस .. 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

  2. Ragini srivastava says:

    बेहतरीन ,

  3. मनोज says:

    आनंद…
    अंतर यात्रा को प्रेरित करती…

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