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नायिका – 7 : अरमान तमाम उम्र के सीने में दफ्न हैं, हम चलते-फिरते लोग मज़ारों से कम नहीं

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बहरहाल तो जनाब यहाँ से शुरू होता है नायक का परिचय… ख़ुद नायक की ज़ुबानी… जी हाँ कहा ना मैंने बताना शुरू किया तो कहानी आगे नहीं बढ़ेगी… आप जितना भी नायक के बारे में जानेंगे, जितना भी उसे समझेंगे वो सब नायक के ही शब्दों में होगा….

क्योंकि नायक को ख़ुद के अलावा और कोई न समझ सकता है न परिभाषित कर सकता है… और यूं भी अभी नायक की नायिका से मुलाकात नहीं हुई है… अर्थात रूबरू नहीं मिले हैं… ये तो बस शुरुआती दिनों की बातचीत है …पूरी तरह से अनऔपचारिक.

तो नायक के बारे में जानकर नायिका का जवाब कुछ यूँ जाता है –

कहीं ना कहीं टकरा ही जाते हैं ऐसे लोग… खानाबदोश नहीं होते… उनके विचार खानाबदोश होते हैं एक जगह टिकते ही नहीं… लेकिन ऐसे लोगों में एक अद्भुत धुन सवार होती है, खोज की धुन और मजे की बात ये है कि खुद ही नहीं जानते कि क्या खोज रहे हैं…

संगीत सुना तो मैंने भी बहुत, अब भी सुनती हूँ… हम जैसे लोगों के लिए तो जगजीत सिंह दोस्त की तरह हो जाते हैं.

जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तब खूब लिखा, अब लग रहा है क्या बकवास लिखे जा रही हूँ… धीरे धीरे छूट रहा है, लेकिन आदत की तरह है आसानी से नहीं जाने वाली….

कुछ और खोज रही हूं… पता नहीं क्या…

 

यहाँ से जाता है नायिका की ओर से पहला मोती…. मोती? हाँ वही मोती जो कभी नायिका की तरफ से जाएगा तो कभी नायक की तरफ से. नायिका को किसी चीज़ की तलाश है, प्यास है खोज है… किस चीज़ की ये ख़ुद नायिका नहीं जानती.

लेकिन भई नायक तो नायक ही होता है, फिल्म के हीरो की तरह बहुआयामी व्यक्तित्व और सामान्य से ज़्यादा बौद्धिक क्षमता लिए हुए. तो झट से नायक इस पहले मोती को समय के धागे में पिरो देता है… यहाँ से शुरू होती है वो माला बनना जिसका एक एक मोती नायिका की तड़प, बैचेनी से भरा होगा और बाद में जिसमें नायक की ज़िद भी शामिल हो जाएगी…

यहाँ हमने नायक और नायिका को कोई नाम नहीं दिया इसलिए वे एक दूसरे को नायक और नायिका के नाम से ही पुकारते हैं, माला में पहला मोती जा चुका है. नायक की तरफ से उस खत का क्या जवाब जाता है देखते हैं….

नायक –

फिल्मी गाने आपने भी वही सुने हैं जो मैंने, एक से एक उपशास्त्रीय, सुगम. हर पर दिल से निकले वाह. जिस गाने के बारे मे बताने जा रहा हूँ वो फिल्म सत्यम शिवम सुंदरम का लताजी का गाया शीर्षक गीत है, आपने भी सुना है, एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि कानों में ये गीत पड़े और रोंगटे न खड़े हों, पता नहीं शब्द हैं या सुर?

कुछ समय पहले टीवी पर किसी संगीत प्रतियोगिता में ये गीत सुना, मेरी बात अतिश्योक्ति लग सकती है, पर पहली बार किसी ने ये गीत लताजी से बेहतर गाया. रोंगटे खड़े, स्थायी पूरा होते होते आँखें गीली और पता है “नायिका”, कब रोना शुरु हुआ समझ नहीं सका, गीत पूरा हो गया रोता रहा.

माँ (अम्मा कहता हूँ) साथ में बैठी थी उनके सामने तो कई बार रो चुका हूँ, रोता रहूंगा – वो माँ हैं, पापा (फिल्म शक्ति के दिलीप कुमार और अमिताभ सा रिश्ता है हमारा) बैठे थे, बचपन के बाद पहली बार मुझे रोते देख रहे थे पर आँखें तो उनकी भी नम थी. पत्नी बैठी थी जो पहली बार एक रोता हुआ पागल देख रही थी. अब कभी सुनियेगा ये गीत तो उसे अपने ऊपर काम करने दीजियेगा, फिर होगा जादू.

एक बार किसी धार्मिक जुलूस में शहर का सबसे मशहूर और योग्य बैंड समूह प्रस्तुति देता हुआ जुलूस के साथ चल रहा था, मैं ट्रैफिक जाम में फंसा कसमसा रहा था कि उसने इस गीत की धुन शुरु की, फैसला तुरंत लिया, बाइक वहीं छोड़ी और जीवन भर इन तथाकथित धार्मिक जलसों – जुलूसो से नफरत करने वाला मैं, हो लिया जुलूस के साथ, धुन पूरी होने के बाद का बाइक तक का सफर बहुत लम्बा था.

पत्र लम्बा हो गया क्या?

नायिका का जवाब –

मेरा जीवन खुली किताब सा होकर ब्लॉग में आ गया था. लोगों को लगने लगा था मुझे अमृता प्रीतम नाम की लाइलाज बीमारी है, बहुत बुरा लगा जब लोगों ने उन्हें साइकिक करार देने कोशिश की.

आपकी एक लाइन ने फिर उन्हें सुरक्षित कर दिया ….. “अमृता को पढ़ा नहीं जिया है”. मेरे ख्याल से बहुत कम ऐसे लेखक रहे हैं, जिनका लेखन आपको आपकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ बहाकर ले जाएँ.

नहीं जानती वो ऊपर बैठा कैसे डोरियों को संभाल रहा है और मैं कठपुतली की मानिंद डोल रही हूँ.

कल शाम से सत्यम शिवम सुंदरम ज़ुबान पर है ….. आज सुबह घर से ऑफिस आते समय सोचा था आज इसी पर एक पोस्ट लिखूँगी. आपका मेल पढ़ा तो हर बार की तरह आश्चर्य नहीं हुआ…. ऐसा अब अकसर होने लगा है लोगों से गीतों का रिश्ता हो गया है….

पिछला खत लम्बा नहीं था संगीत की धुन सवार हो जाती है तो ऐसा ही होता है.

19 अप्रैल का जन्म है मेरा…. आपका?

नायक का अगला ख़त-

कल सुबह जागने से ठीक पहले जो सपना देख रहा था, और तो कुछ याद नहीं रहा सिवाय उस बंगाली युवती के जो सफेद साड़ी पहने, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी लगाये सिर्फ एक बार अपनी बड़ी बड़ी उदास आँखों से मुझ पर गहरी निगाह डालती है.

उस अनजान कमरे में उसके पति का सा एहसास मुझे था, कल सुबह नींद खुलने से लेकर अभी तक परेशान हूँ, वजह ये कि मैं उस महिला को जानता हूँ पर याद नहीं आ रहा कि कहाँ मिला हूँ, मिला भी हूँ या सिर्फ देखा भर है.

सोचते सोचते कई बार ऐसा लगा है कि बस अब पहुंच ही गया हूँ उसकी पहचान तक कि दिमाग मे कोई कड़ी टूट जाती है, फिर नये सिरे से सोचना शुरु करता हूँ. सपने में देखी छवियाँ समय के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, पर वो सूरत तो आँखों मे यूँ डोल रही है, मानो अभी अभी ही वो यहाँ से उठ कर गयी हो. देखते हैं ये ख्वाब किस अंजाम तक पहुंचता है!

“अरमान तमाम उम्र के सीने मे दफ्न हैं,
हम चलते-फिरते लोग मज़ारो से कम नहीं”

नौ सितम्बर …. मेरा जन्मदिन…

सूत्रधार –

नायिका जो हमेशा बड़ी बिंदी लगाती है… जिसके लिए लोग उसे बंगाली भी कहते हैं अचंभित थी नायक के इस ख़त पर तो पूछ बैठी –

आपने मुझे देखा है कभी?

नायक की जिज्ञासा बढ़ चुकी थी, हालांकि नायिका के माथे पर शिकन तक नहीं आई, सिर्फ इसलिए क्योंकि नायिका आधुनिक युग की पढ़ी-लिखी कम्प्यूटर युग की है….. अरे नहीं नहीं…. इसका मतलब ये नहीं कि नायक अनपढ़ है………… नायक क्या है कौन है ये तो आपको पता चल ही जाएगा……

………कहा ना यदि नायक के बारे में बताना शुरू किया तो आप पढ़ते-पढ़ते मुग्ध हो जाएँगे और कहानी आगे ही नहीं बढ़ पाएगी. और कहानी का आगे बढ़ना यहाँ बहुत ज़रूरी है क्योंकि अभी तक दोनों सिर्फ ख़तों के ज़रिये एक दूसरे को जानते हैं, दोनों की मुलाकात अभी बाकी है, और उनको कब मिलवाना है ये तो आप ही तय करेंगे….. आखिर 8 रोटी का सवाल है जो सिर्फ आप ही के दर पर मिलेगी.

फिर भी नायक के सपने में बड़ी सी बिंदी वाली उस बंगालन स्त्री का आना ……. क्या नियति दोनों को कोई झलक दिखलाकर लुकाछिपी का खेल खेल रही थी??

तो नायक का जिज्ञासा भरा खत कुछ यूँ है-

प्रश्न है, जिज्ञासा है या कुछ और…. मेरी समझ से बाहर है.

आपका मायका जबलपुर है ये तो आपने कभी ज़ाहिर किया नहीं और मैं इंदौर सिर्फ एक बार, डेढ़ दिन को गया था, नहीं, मैंने आपको नहीं देखा, पर क्यों?

तीन छोटी बहनों में से दूसरी गुजरातियों में ही ब्याही गई है. हम उ.प्र. के हिंदी भाषी ब्राह्मण हैं वैसे पूरे खानदान मे ब्राह्मणत्व सिर्फ खुद में और छोटी बहनों में ही पाता हूँ.

तीनो बहनों के दो दो बच्चे हैं और मैं 6 भानजे भानजियों का अकेला मामा. ये सोच कर दूसरी बार लिखने बैठा था कि सपने के बारे मे कुछ कहना था पर ध्यान आपके गुजराती होने पर चला गया और 6 भांजे भांजिया आ गये.

उत्तर आप भी जानती हैं कि नहीं देखा है, नहीं, मैंने आपको नहीं देखा, पर क्यों?

सूत्रधार –

तो आखिर शहर के नाम जान ही गए आप सब… अब धीरे-धीरे पर्दा तो उठाना ही होगा इस रहस्य से…

बहरहाल, नायिका की ओर से जो जवाब गया वो नायक को दूसरी बार अचम्भित करता है, आपको नहीं करेगा क्योंकि आप पुनर्जन्म की काफी फिल्में देख चुके हैं. आपके लिए इस तरह की कहानियाँ बहुत ही आम बात है जिसे आप सिनेमा के रुपहले पर्दे पर देखते हैं और मनोरंजन हो जाने के बाद, कुछ दिनों में भूल जाते हैं.

लेकिन भई हमारे नायक के ख़ुद के जीवन में ऐसा घटित हो रहा है तो उसके लिए हमें थोड़ी-सी सहानुभूति तो रखना होगी ना? तो थोड़ी सी सहानुभूति वाली नज़र हमारे नायक पर ज़रूर रखें क्योंकि नायिका की तरफ से जवाब कुछ यूँ जा रहा है-

हो सकता है वो कोई और हो लेकिन सपनों के बीच से निकलती सुरंगों के रहस्यों में मैं भी अकसर उलझी रहती हूँ ……….. मैं बंगाली तो नहीं हाँ गुजराती हूँ, अकसर बड़ी बिंदी लगाती हूँ, ब्लॉग पर कभी अपना फोटो नहीं लगाया, हो सकता है आप किसी और का ज़िक्र कर रहे हों, लेकिन मैंने सोचा अपने बारे में बता दूँ.

सूत्रधार –

लो भई नायक के आश्चर्य का तो कोई ठिकाना ही नहीं रहा. ज़रा देखिए क्या जवाब दे रहे है हमारी कहानी के हीरो –

जिसको देखा नहीं, जिसको सुना नहीं, जिसको छुआ नहीं, जिसकी कोई छवि नहीं मन में, दिल में, दिमाग में उसको सपने में किसने और कैसे आकृति, रूप दे दिया. अनदेखी जगहों के सपने आते हैं मुझे, जिसमें अकसर नदी, पहाड़, यात्रा, ट्रेन, बाइक और अकेला मैं, बस ये सब ही देखता रहा हूँ, पर अनदेखी शख्सियत का सपना और वो भी सच के इतने करीब!!! कितने करीब??? मुझे आपका close-up देखना है.
देखा, दिल ने अब एक नई बेचैनी पैदा कर ली अपने लिये और मन को दे दी एक उधेड़बुन और दिमाग? दिमाग ही तो काम नहीं कर रहा न….

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

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