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नायिका – 6 : न आया माना हमें cheques पर हस्ताक्षर करना, बड़ी कारीगरी से हम दिलों पर नाम लिखते हैं

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पिछले भाग में आपने पढ़ा कि एक महीने के अंतराल के बाद नायिका नायक के ईमेल का जवाब भेजती है, जिसके जवाब में जनाब लिखते हैं –

बेग़म अख्तर गा रही हैं, शायद सुदर्शन फ़ाकिर का क़लाम है –
ज़िंदगी कुछ भी नहीं फिर भी जिये जाते हैं!
तुझपे ए वक़्त हम एहसान किये जाते हैं!!

आज की तारीख में आपका जवाब आना भी एक संयोग हो गया – ज़रा देखिये मेरा संदेश भी 18वीं तारीख को लिखा गया था, मेरे लिये आपकी कलम, घायल ही सही, फिर भी 18वीं तारीख को ही उठी.

ये सच है कि बीच मे एक महीने का फासला है, पर इतना फासला तो होना ही चाहिये… बशीर बद्र कह रहे थे – ये नये मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!

– नायक

सूत्रधार – यूं तो नायक, नायिका और पाठकों को लग रहा होगा कि यह ईमेल्स आम कहानियों की तरह वे खुद लिख रहे हैं… लेकिन मैं सूत्रधार तो यह जानता हूँ ना कि यह वे खुद नहीं लिख रहे, समय अपने हाथों से उनकी तक़दीर की वसीयत पर हस्ताक्षर कर रही है, तभी तो उस ख़त के जवाब में नायिका लिखती हैं –

या तो आप अच्छा बोलते हैं, या अच्छा लिखते हैं…. शब्दों को पेरेलल सिनेमा की कहानियों की तरह अलग-सा टच देना आता है आपको…. पढ़कर अच्छा लगा.

हाँ ज़रूर नए मिजाज़ का शहर है, तभी तो मिलकर भी फासला है…. आप कहाँ किस शहर में बैठे होंगे… मैं यहाँ इस शहर में ….एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत हूँ, दोस्त नहीं है लेकिन कुछ किताबें हैं मेरे पास, शब्दों से बहुत अजीब रिश्ता है… कभी बचपन की सहेली जैसा, कभी माँ की गोद जैसा, कभी गुरू जैसा…. सारे रिश्ते शब्दों में मिल जाते हैं….
आप कहाँ विराजमान हैं?

सूत्रधार- यहाँ शहर का नाम नहीं दिया जा रहा, ये आप तय करें…. चाहें तो नायिका को झुमरी तलैया में बैठा देते हैं और नायक को गंगटोक में…. क्योंकि………………..

छठा तत्त्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, “मिलन” उनकी नियति” हो जाती है. “मिलन” घटता ही है,….. कहीं भी… किसी भी समय ….इस “मिलन” के लिए “स्थान” अर्थ खो देता है और “काल” भी.

फिर भी नायक को तो खतों पर सवार होकर जैसे नायिका के शहर ही पहुँच जाना था… तो साहब लिखते हैं –

नज़दीक ही हूँ आपके, ट्रेन से आऊं तो तक़रीबन 13 घंटे लगेंगे, करता कुछ भी नहीं हूँ, आशय धनोपार्जन से है. काम, पैसे से मुझे पता नहीं क्यों नफरत सी है. नफरत को भूलते हैं, चलिये एक शे’र सुनिये – “न आया माना हमें cheques पर हस्ताक्षर करना, बड़ी कारीगरी से हम दिलों पर नाम लिखते हैं”
फिर आपने लिखा तो लिखूंगा…

– नायक

सूत्रधार – अब यहाँ नायक क्या लिखने की बात कर रहा है? दिल पर नाम या अगला ख़त? नायक की बात नायक ही जाने….. वो तो हवा है, कहीं भी उड़ सकता है, कहीं भी ठहर सकता है…. तभी तो ख़त की शुरुआत में यह कहने की मजाल कर सकता है “नज़दीक ही हूँ आपके”… अब नजदीकियां बढ़ाने का इससे कारगर उपाय और क्या हो सकता है भला… हम तो ये देखते हैं कि नायिका इन नज़दीकियों को बढ़ा रही हैं या…

तो नायिका कहती है –

पैसों के लिए काम तो मैंने भी कभी नहीं किया – बहुत सारी जगह काम करने के बाद यहाँ मन माफिक काम मिल गया, लेखन और रचनात्मक से जुड़ा हुआ, ऊपर से इंटरनेट की सुविधा, जैसे दुनिया इंटेलिजेंट बक्से के में सिमट गई.

कुछ नहीं करने के बाद भी आप कुछ तो ऐसा करते होंगे जिससे दो जून की रोटी खाने लायक या कुछ शौक पूरे करने लायक पैसा मिल जाता होगा… या पैसा इतना है कि काम करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती?

बहुत गहन चिंतन करने का मन नहीं है थोड़ी सतही बातें लगेगी आपको…. फिर भी…

सूत्रधार – तो जनाब यह प्रश्न कहीं इसलिए अवचेतन मन से तो नहीं जागा कि भाई अचानक से तुम्हारे सर पर टपक पड़ी तो दो समय का खाना और सर पर छत तो दे सकोगे या नहीं… और जब वाकई नायिका टपक पड़ी नायक के शहर तब नायक के क्या हाल हुए थे यह आप में से कई लोग जानते ही हैं… (पढ़िए नायिका -2)

और फिर जैसा कि हमेशा कहता हूँ नायक के बारे में कुछ कहना शुरु किया तो कहानी आगे ही नहीं बढ़ेगी, और हमें कहाँ कुछ कहने की ज़रुरत है ….देखिये नायक खुद ही अपने बारे में न जाने क्या क्या कह रहा है नायिका को…

पढ़ता हूँ और खूब पढ़ता हूँ, पर मांग कर नहीं, अमृता प्रीतम को तो पढ़ा नहीं जिया है. जब सुनता था, तब खूब सुना…. पंडित जसराज और पंडित भीमसेन जोशी, मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और जगजीत सिंह को. खाने का शौक बिल्कुल नहीं, जो चाहे खिला दीजिये, कई दफा तो पता ही नहीं चलता कि खाया क्या – पढ़ते हुये जो खाता हूँ.

पहनने का भी ये ही आलम है, तन ही तो ढंकना है. शराब खूब पी, 7 साल पहले अपने आप से बातें करते हुये छोड़ दी, सिगरेट बेतहाशा पी, याद ही नहीं कब छोड़ी.

अब रहा सवाल दो जून की रोटी का – तो मोहतरमा, दोनों जून मिला कर कुल 8 रोटी चाहिये, उसके साथ जो मिल जाये, अब इतने से के लिये मै काम करूँ और फिर काम से जुड़ी हज़ार झंझटे झेलूँ?

इतना तो, जब भी आपके दरवाज़े खड़ा हो जाऊँगा, मिल जायेगा.

हाँ, शौकिया कर लेता हूँ काम, मसलन 2 साल एक कम्प्यूटर इंस्टिट्यूट में कम्प्यूटर हार्डवेयर पढ़ाया, सिखाया. निरर्थकता समझ में आते ही छोड़ दिया. आजकल एक पीएचडी की थीसिस को हिंदी से अँगरेजी मे अनुवाद कर रहा हूँ, साथ ही कुछ प्रोफेशनल्स को अंग्रेज़ी सिखा भी रहा हूँ. मै कुछ मांगूंगा नहीं, वो दिये बिना नहीं मानेंगे, कुछ और किताबें आ जायेंगी.

कुछ लोगों का कहना है कि मै पैदायशी शिक्षक हूँ. बस यही तो सारे झगड़े की जड़ है कि मै क्या हूँ???

सूत्रधार –ब नायक क्या है इस झगड़े की जड़ में हमें नहीं जाना चाहिए, क्योंकि नायिका कितनी बड़ी झगड़ालू है ये बेचारे नायक को तब पता होता तो…. तो क्या उससे कोई कहानी बदल थोड़ी ना जाती… आखिर उस झगड़े की जड़ से ही तो नायिका के व्यक्तित्व का अंकुर फूटेगा)…

काया विज्ञान कहता है : यह काया पंचतत्वों से मिलकर बनी है- पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश.

लेकिन इन पाँचों तत्त्वों के बीच इतना गहन आकर्षण क्यों है कि इन्हें मिलना पड़ा?

कितने तो भिन्न हैं ये… कितने विपरीत……

कहाँ ठहरा हुआ-सा पृथ्वी तत्व, तरंगित होता जल तत्व,

दहकता हुआ अग्नि तत्व, प्रवाहमान वायु तत्व,

और कहाँ अगोचर आकाश तत्व,

कोई भी तो मेल नहीं दिखता आपस में….

ये कैसे मिल बैठे….? कौन-सा स्वर सध गया इनके मध्य….? निश्चित ही इन्हें इकट्ठा करनेवाला, जोड़नेवाला, मिलानेवाला कोई छठा तत्व भी होना चाहिए….

यह प्रश्न स्पन्दित हुआ ही था कि दशों दिशाएँ मिलकर गुनगुनाईं….”प्रेम”….वह छठा तत्व है, “प्रेम”.

ये सभी तत्व प्रेम में हैं एक-दूसरे के साथ, इसलिए ही इनका मिलन होता है.

यह छठा तत्व जिनके मध्य जन्म ले लेता है, वे मिलते ही हैं फिर, उन्हें मिलना ही होता है, “मिलन” उनकी नियति” हो जाती है.

“मिलन” घटता ही है,….. कहीं भी… किसी भी समय ….इस “मिलन” के लिए “स्थान” अर्थ खो देता है और “काल” भी.

फिर किसी भी सृष्टि में चाहे किसी भी पृथ्वी पर, चाहे फिर पैरों के नीचे “कल्प” दूरी बनकर बिछे हों, निकट आना ही होता है उन्हें……

सूत्रधार – जी हां यह उसी पुस्तक का अंश है, जो हमारी नायिका को जान से भी प्यारी है, और वह खुद से एक पल के लिए भी अलग नहीं कर पाती… पुस्तक में कौन सा रहस्य छुपा है आखिर?

(पुस्तक का यह अंश अमृता प्रीतम की वर्जित बाग़ की गाथा से लिया गया है, जो नायिका के पास हमेशा रहती थी)

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

नायिका -5 : ये नये मिजाज़ का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

नायिका -4 : जादू और शक्ति

नायिका -3 : Introducing सूत्रधार

नायिका -2 : Introducing NAAYIKA

नायिका -1 : Introducing NAYAK

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