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नायिका -3 : Introducing सूत्रधार

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हर फिल्म का एक नायक होता है…………..

और होती है एक नायिका…………………….

फिल्म चाहे पुरानी हो या नई……….

हर फिल्म में एक नायक होता है………….

और होती है एक नायिका……………

बात चाहे नायक की सफलता की हो या असफलता की…………

हर नायक के पीछे होती है एक नायिका………..

बात चाहे प्रेम की हो रही हो या नफरत की……………

हर नायक के मन में होती है एक नायिका…………..

बात चाहे गीत की हो या संगीत की……..

एक होता है नायक………..

एक होती है नायिका…………………

बात चाहे किसी कहानी की हो या उपन्यास की……………

एक होता है नायक………..

एक होती है नायिका…………………

बात चाहे किस्से कहानियों की हो या जीवन के यथार्थ की…………

एक होता है नायक………..

एक होती है नायिका…………………

कहानी चाहे 100 साल पहले की हो, पिछले जन्मों की हो या आज कल के कम्प्यूटर और इंटरनेट के ज़माने की………..

एक होता है नायक………….

और एक होती है उसकी नायिका………….

तो हमारी इस कहानी का भी है एक नायक और एक है नायिका……………

नायक के बारे में अभी से बताना शुरू कर दिया तो कहानी आगे नहीं बढ़ सकेगी………

तो पहले मिलिए नायिका से……………

अच्छा तो आप ये जानने के लिए उत्सुक हैं कि मैं कौन हूँ?

जैसे हर कहानी का एक नायक होता है, और एक नायिका होती है……. वैसे ही उस कहानी की बागडोर संभालने वाला एक सूत्रधार भी तो होता है……………

तो मैं हूँ सूत्रधार……………… बस इतना ही काफी है मेरे बारे में, क्योंकि कहानी के किरदार इतने महत्वपूर्ण है कि सूत्रधार का महत्व शून्य के बराबर है…. लेकिन… किंतु, परंतु………….. हमारी कहानी में सूत्रधार सिर्फ मैं नहीं हमारे पाठक भी होंगे, और इसमें कोई शक़ नहीं कि उनकी भूमिका भी अतिमहत्वपूर्ण है, क्योंकि कहानी को आगे तो आप ही बढाएँगे……….. जहाँ आप रुक गए वहाँ मैं हाजिर लेकिन सिर्फ आपकी मदद के लिए………….

तो नायक कभी कहता है मैं सड़क का आदमी तो कभी कहता है मैं हवा हूँ, कभी कहता है मैं कुछ नहीं, कभी कहता है हर जगह मैं ही तो हूँ, नायिका कहती है मैं तुम्हारी तुम, उसके बाद नायक चुप और नायिका हो जाती है उसका मौन…………….

ना इसका मतलब ये न समझिए कि नायक और नायिका एक दूसरे को जानते हैं…… नहीं, हर फिल्मी कहानी की तरह अभी दोनों की पहली मुलाकात बाकी है……….. और ये पहली मुलाकात कब होती है ये तो खुद सूत्रधार यानि आपको और मुझे भी नहीं पता………..

यदि जानना चाहते हैं तो जुड़े रहिये हमारी इस कहानी से, जो आपको लेकर जाएगी एक जादुई दुनिया में… आखिर नायिका के “जादू” को भी तो देखना है ना!

– सूत्रधार

नायिका पूछ रही है…. कौन हो तुम?

अचम्भित हो कि फिर मेरे मन में ये सवाल क्यूँ आया? मैं भी हूँ… सच कौन हो तुम? ईश्वर की तरफ से कोई नायाब तोहफा? जिस नियति को मैं कोसती रहती हूँ उसकी तरफ से मेरी तपस्या का फल?

उस नियति ने मुझे तुमसे मिलवाया या तुमने मुझे ढूँढ निकाला? अब भी तुम्हारी लीलाओं से अनभिज्ञ हूँ…… जो जानती हूँ वो बस इतना कि जितनी पीड़ा पाई, जितनी तपस्या की, जितने पुण्य मैंने किए हैं उतने किसी न किए होंगे, तुम्हारा मेरे साथ होना इसका जीता जागता सबूत है….

मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं ना समय से, ना नियति से, ना किस्मत से, सारी शिकायतें सारे संशय खत्म हो जाते हैं जब तुम मुझे कभी संजू, कभी संजना कभी संजीवनी, कभी अर्धांगिनी, कभी प्यार, कभी प्रिया, कभी माधवी, तो कभी अपने ही नाम से पुकारते हो…….

अब भी डर जाती हूँ तो तुम्हीं कहते हो ना कोई बहुत पुरानी सी आदत है.. और आदत तो जाते जाते ही जाती है.. लेकिन इस डर के बाद जो तुम मेरा हाथ थामकर अपने दिल पर रख देते हो तो मेरी दुनिया सिमटकर बस “तुम” हो जाती है…

तुम तुम तुम

मेरी पाँच तत्वों से बनी काया के छठे तत्व……………

 

और नायक कहता है –

इस कदर लिपटा हूँ, इस कदर छाया हूँ, ऐसे घेरे हूँ, इतना घुल गया हूँ साँसों में, कि बस किसी ने छेड़ा और मैं तुम में प्रकट…

प्रिया,

ये अदा, अचम्भित होने की छोड़ना भी मत… मैं जो कुछ भी हूँ तुम्हारे ही बूते हूँ… तुममें ज़रा सा भी बदलाव निश्चित ही मुझमें भी परिवर्तन लायेगा… तुम अचम्भित होती रहना, मैं अचम्भित करता रहूंगा.

ये तो मैं भी कहता हूँ कि तुमने बहुत पुण्य किए होगे और कर रही हो… एक मामूली व्यक्ति को महत्वपूर्ण बना देना कम पुण्य का काम है? एक मुरदे को ज़िंदा कर देना क्या पुण्य नहीं?

सृष्टि के नियमानुसार निश्चित ही इन पुण्यों का परिणाम भी प्राप्त होगा… पर हम कब परिणामों को लक्ष्य बना कर कर्म करते थे या हैं? बल्कि हम कर्म करते ही कब हैं, नियति हमे स्वयं ही लिए जा रही है परिणाम तक… यही नहीं है क्या निष्काम कर्म… जो हम कर सकते हैं, किया… कर रहे हैं… करते रहेंगे… परिणाम जो हों सो हों, उस पर हमारा क्या ज़ोर?

किसने किसे ढूंढा, किसे कौन मिला, ये महत्वपूर्ण नहीं… बस ढूंढ लिया, मिल गये, पा लिया… हममें से ही कोई ढूंढने वाला होता तो क्या इतने बरस लगते? पहले क्यों नहीं खोज निकाला? न, कोई और है जिसने ये काम किया, वरना क्या औरों को कभी प्यार नहीं हुआ? फिर हमारा प्यार दुनिया से इतना भिन्न क्यों…. कैसे… कि इस दुनिया का ही न लगे?

ये दो भौतिक शरीरों का प्यार नहीं, हो भी कैसे सकता है, जब आज तक हमने एक दूसरे को देखा ही नहीं, छुआ ही नहीं, मिले ही नहीं… ये प्यार है शुद्ध ऊर्जा का मिलन… सोचो न, आज तक हमारा संपर्क हुआ भी तो कैसे… मात्र विचारों द्वारा… लिख कर या कह कर… सुने होंगे ये शब्द – विचार ‘शक्ति’, लेखन ‘शक्ति’, वाक ‘शक्ति’… क्या है ये शक्ति… पता नहीं लोग कहाँ कहाँ भगवान को ढूंढते हैं… इसी शक्ति की तो सब माया है… यही शक्ति तो विभिन्न रूपों में लीला कर रही है.

शक्ति की उपासना की जाती है नवरात्रि में… ज़रा सोचो कितने साधकों को ये अर्थ पता हैं… बस लकीर पीटी जा रही है… ये ही है हमारे पुण्यों का प्रताप कि हम इतना जानते, समझते और अनुभव करते हैं… भाग्यशाली हो तुम, मैं… इसलिए कैसे संशय, कैसी शिकायतें और किससे? उन लकीर पीटने वालो से? न, वे तो हमारी करुणा और सहानुभूति के पात्र हैं… तो फिर किससे? उससे जो इस शक्ति की, इस शक्ति के कणो की लीला रच रहा है??

नहीं… कहीं कोई स्थान नहीं, संशयो और शिकायतों के लिये… हम सृष्टि के उन चुनिंदा लोगो में से हैं, जो निष्काम कर्म में लीन हैं और निष्काम का अर्थ ही होता है… कामनारहित…. कोई आकांक्षा नही, कोई अपेक्षा नहीं, कोई शिकायत नहीं.

पत्र की शुरुआत तुमने की थी एक प्रश्न से कि कौन हो तुम? एक दिन सब, हम दोनों से इकट्ठे पूछेंगे कि कौन हों तुम?

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

नायिका -1 : Introducing NAYAK

नायिका -2 : Introducing NAAYIKA

नायिका -4 : जादू और शक्ति

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