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नायिका -2 : Introducing NAAYIKA

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बात 2007 की है जब नायिका एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करती थी. तनख्वाह इतनी थी कि उस ज़माने के हिसाब से घर खर्च निकालने के बाद चाहे जितना रूपया खुद पर खर्च कर सकती थी.

बाज़ार गए हैं कोई साड़ी एक नज़र में पसंद आ गई तो बस चाहिए, फिर चाहे वो 100 रुपये की हो या 1000 की… चेहरा हमेशा लिपा पुता… मतलब मेकअप चढ़ा हुआ रहता था अक्सर.

2008 में एक फ़कीर से परिचय हुआ. नायिका भौतिकता में रमी, ग्लैमर की चकाचौंध में डूबी… उसके फकीराना अंदाज़ पर फ़िदा हो गयी… रूबरू नहीं मिले थे तब तक फोन पर बात करते थे… फोन उसका वैसा जैसी उसकी हैसियत थी… सबसे सस्ता… उन दिनों रिलायंस का फोन आता था जिसमें सिम नहीं होती थी (CDMA-WLL)…

नायिका का फोन NOKIA का उस समय का सबसे महंगा वाला… नायिका को फोन पर बात करनी होती थी तो उसे ही फोन लगाना पड़ता था… कई बार फकीर के फोन में बैलेंस डलवाया…. सोचती थी मिला भी तो एक फ़कीर… कोई बात नहीं मुझे तो हमेशा से ही काम करना पसंद था… मैं कमाती हूँ ना.. बहुत है इतना… पाल लूंगी उसे भी…

फिर इश्क़ परवान चढ़ा तो उस फ़कीर की तलाश में निकल पड़ी घर छोड़कर… कपड़े सिर्फ उतने थे जितने तन पर पहने हुए थे… जेब में सिर्फ पांच हज़ार रुपये… बैंक में कभी इतना बचाया ही नहीं क्योंकि सोचा ही नहीं था कि कभी यूं घर से निकलन पड़ेगा एक फ़कीर के पीछे…

नायक के शहर आई… सीधे ओशो आश्रम गयी… पहुँच कर उसको फोन लगाया … मैं आ गयी हूँ… वो मिलने आया… साथ कुछ लाई नहीं थी तो उसको लिस्ट पकड़ा दी… टूथ ब्रश, पेस्ट केवल Pepsodent -G, नहाने के लिए सिंथोल साबुन, और भी छोटी मोटी ज़रूरत की चीज़ें…

बेचारा फ़कीर मरता क्या न करता… जितना उसकी जेब में था सब उस पर लुटा दिया… दो दिन बाद आश्रम छोड़ने की बारी आई तो नायिका ने कहा दे दो रुपये… बोले मेमसाब जितना मेरे पास था वो तो आपके टूथ पेस्ट और साबुन में ही खर्च हो गया… अभी मेरे पास नहीं है…

पहले उसे लगा मज़ाक कर रहा है… खैर उसने आश्रम का शुल्क चुकाया….

कुछ दिन किसी और शहर रहकर वापस नायक के पास लौटना हुआ क्योंकि उसके अपने शहर के सारे रास्ते बंद हो गए थे… फ़कीर ने कहा आ जाओ तुम्हारे लिए एक घर का इंतज़ाम कर दिया है…

नायिका दौड़कर वापस नायक के शहर आई… दिल ख़ुशी से बल्लियों उछल रहा था… वाह फ़कीर का साथ मिलेगा…

नायक रेलवे स्टेशन से आधे किलोमीटर दूर अपनी बाइक छोड़कर पैदल स्टेशन पहुँचता है.

ट्रेन के इंतज़ार में प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचने की जगह बाहर खड़ा होकर समय बिताता है.

ट्रेन के पहुँचने के बाद स्टेशन से बाहर निकलते यात्रियों की भीड़ में उसकी आँखें नायिका को खोजती रहती हैं.

नायिका को देख चेहरा खिल जाता है… पास आने पर उसे गले लगाने को उठे हाथों को यूं पकड़ कर नीचे करता है, जिससे वे एक-दूसरे से हाथ मिलाते से लगें.

मैडम, ये आपका महानगर नहीं, मेरा कस्बा है.

“प्लेटफ़ॉर्म पर क्यों नहीं आए? कितना तलाशा वहाँ…”

‘दस रूपए का जो आता है प्लेटफ़ॉर्म टिकट… अच्छा चलो रात के दस बज रहे हैं’

नायक स्टेशन सीमा से बाहर आने के बाद भी जब पैदल ही आगे बढ़ा, तो वो पूछ बैठी, “8 घंटे के सफ़र से थकी हुई को क्या, पैदल ही घसीटोगे?”

‘बस कुछ दूर, बाइक वहां खड़ी है, उस चाय की दुकान के सामने.’

“यहाँ स्टेशन की पार्किंग में क्यों नहीं खड़ी की?”

‘मैडम, आप सवाल बहुत करती हैं… पैसे नहीं मेरे पास.’

“आपका मतलब खुले पैसे यानी चेंज नहीं…”

‘जी नहीं, मेरा मतलब वही, जो कहा… खुले-बंधे, कैसे भी पैसे मेरे पास नहीं.’

“अरे, ऐसा कैसे?”

‘सुंदरी, ऐसा ऐसे कि कुल 1200 रूपए थे मेरे पास, और वो आपके लिए, लिए गए रूम में आपकी ज़रुरत का सामान लेने में खर्च हो गए, जबकि अभी रूम का भाड़ा देना है.’

स्टेशन से घर आई तो देखकर दंग रह गयी… एक छोटा सा मुर्गी के दड़बे जैसा घर, फर्श में टाइल्स नहीं, छत पर पंखा नहीं… फ़कीर के कपड़ों में चूने की सफेदी लगी हुई थी…. हाथ से पुताई सफाई की हो जैसे उस छोटे से घर की…

खाने का इंतज़ाम नहीं कर पाया था वो तो नायिका ने सफ़र के लिए पांच मेथी के पराठे रखे तो वही मिल बाँट के खा लिए…

रात हुई तो बिस्तर लगाया… वो भी टेंट हाउस से मंगवाया हुआ … उबड़ खाबड़ सा… इतना संकरा था कि एक आदमी को भी छोटा पड़े… फिर भी ज़मीन पर बिस्तर लगा…. कुछ ही देर में मच्छरों ने हमला शुरू कर दिया… फ़कीर को देखा तो उसके मुंह पर पांच मच्छर बैठे थे लेकिन चेहरा ऐसा जैसे कोई पांच साल का शिशु सो रहा हो… बेचारी हाथ से मच्छर भगाती रही… लेकिन गर्मी के कारण खुद पसीने में तरबतर…

क्या करे सूझ नहीं रहा था… तो उसकी सबसे कीमती चीज़ जो उसके पास थी उसने वह उठाई… वो डायरी जिसमें उसके शब्दों का खज़ाना था… जो हमेशा उसके साथ रहती थी… कोई उसे छू भी लेता तो आग बबूला हो जाती… लेकिन वो डायरी भर चुकी थी… खाली पन्ने नहीं थे उसमें… उसने उन्हीं लिखे हुए पन्नों में से दो चार पन्ने फाड़े और उसका पंखा बनाकर फ़कीर को झलने लगी….

रात भर उसकी आंखों में आंसूं थे…. सोचने लगी- ये कैसा इश्क़ है… ये कैसा फ़कीर है… ये कैसा घर है… ये कौन है जिसके लिए उसने मैंने अपने सारे महल छोड़ दिए.. ये मुझे वो ज़िंदगी कैसे देगा जो मैं आज तक जी रही थी…

रोते रोते और पंखा झलते झलते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला…

सुबह हुई नायिका नहा धोकर तैयार हुई… चाय का तो सवाल ही नहीं उठता बर्तन ही नहीं थे….

फ़कीर से पूछा आज खाने का इंतज़ाम कैसे करेंगे… उसने कहा देवी! हम जिस दरवाज़े पर खड़े हो जाएँगे खाना मिल जाएगा….

उसे समझ नहीं आ रहा था… न उसकी बातें… ना उसका जीवन… ऐसा लग रहा था जैसे वह दुनिया से पूरी तरह कट गयी है… जैसे किसी और ही तरह की दुनिया में प्रवेश कर गयी है…

वह नायिका को किसी से मिलवाने ले गया… उसने पूछा हम कहाँ जा रहे हैं… फ़कीर बोला एक मित्र से मिलवाना है आपको… वे मित्र की शॉप पर गए… फ़कीर को देखकर उनका मित्र अपनी कुर्सी से झट से उठा और फ़कीर के पैर छूने लगा… अरे आइये गुरुदेव….

वह आश्चर्य से सबकुछ देख रही थी … फ़कीर ने उससे मिलवाते हुए कहा पहले मेमसाब के लिए कुछ खाने का इंतज़ाम करना है…

मित्र बोला अभी घर फोन लगता हूँ…

उसने कहा – अरे नहीं इतनी तकलीफ करने की आवश्यकता नहीं है यहीं से आसपास से कुछ मंगवा लेते हैं…

मित्र मुस्कुराने लगा… हमारे गुरुदेव केवल घर का खाना खाते हैं…

नायिका बस… जी… कहकर रह गयी…

घर का खाना आया … जी भर कर खाया… फिर जब तक बर्तनों का इंतज़ाम नहीं हो गया.. तब तक किसी न किसी के घर से खाना आता रहा…

जब घर थोड़ा व्यवस्थित हुआ तो एक दिन फ़कीर अपना घर दिखाने ले गया…

घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर जब नायिका ने चारों तरफ नज़रें घुमाई… तो नज़रें रुक ही नहीं रही थी…. तेरह हज़ार स्क्वायर फीट से ज्यादा की ज़मीन पर फैला हुआ घर और आँगन….

फ़कीर ने कहा आइये… देवी गृह प्रवेश कीजिये….

उस फ़कीर के महल नुमा घर में प्रवेश करते ही ही जैसे नायिका का पूरी तरह से रूपांतरण हो गया…. पहले कदम को अन्दर रखते ही… चेहरे पर पुता मेकअप आंसुओं में धुल गया…. दूसरा कदम रखते ही…. कपड़ें और कपड़ें पहनने का तरीका दोनों में बदलाव आ गया…

इस देवी को सच में दैवीय रूप दे दिया इन दस सालों में उस फ़कीर ने…. ना नए कपड़ों का शौक बाकी रहा… न खाने पीने के लिए जीभ में लालच… ना पैसों का मोह…. ज़रूरत के अनुसार कहीं न कहीं से आ जाते हैं… और इससे अधिक की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ती….

हाँ फ़कीर सिर्फ किताबें अपने पैसों से खरीदता है और उसके खज़ाने में आज की तारीख में 6000 किताबें हैं…. महलों का राजकुमार जिसे कमाने की ज़रूरत नहीं, पिता का नाम जुड़ जाता है तो लोग सलाम करते हैं… खुद से जुड़े हुए लोग कभी गुरुदेव, कभी नायक साहब कहकर संबोधित करते हैं….

एक फ़कीर जिसके इश्क़ में नायिका ने दुनिया छोड़ी … और एक नई जादुई दुनिया में प्रवेश पाया… वह कोई आम इंसान नहीं हो सकता… नायिका के लिए परमात्मा ने नायक बनाकर भेजा जो जीवन साथे हुआ और गुरु भी…

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

नायिका -1 : Introducing NAYAK

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4 thoughts on “नायिका -2 : Introducing NAAYIKA”

  1. Ragini srivastava says:

    Ye aapki hi kahani hai n shaifali

    1. Making India Desk says:

      जी 🙂

  2. Garima mishra says:

    Maa..or babba…prem bhara pranam

    1. Making India Desk says:

      _/\_

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