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नायिका -15 : किताबें पढ़ी ही नहीं, सुनी भी जाती हैं!

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नायिका –

ये 8 रोटी वाली बात समझ नहीं आई…. समझा कर रखना कल आकर पढ़ूँगी… कहा था… कुछ याद है?

विनायक –

हम भी सारे जहान का बोझ उठाए फिरते हैं पर इतनी कमज़ोर तो नहीं हमारी याददाश्त जितनी लोगों की….

आपने जब पूछा था कि कुछ तो काम करते होंगे…. तो लंबी चौड़ी हांकने के बाद मैंने कहा था कि कुल 8 रोटियों, 4 दिन में और 4 रात में का सवाल है, उतना तो आपके दरवाज़े पर खड़ा हो जाऊँगा तो मिल जायेगा. अब आज आपने बताया कि खाना तो cook बनाती है तो मायूसी के साथ मैंने कहा था कि वो 8 रोटियाँ भी आपके हाथ की नहीं मिलेंगी!

अब समझ में आया, समझदार?

नायिका –

जी नहीं इतने भी आराम तलब नहीं हैं हम, घर आए मेहमान को अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाती हूँ, कुशल गृहणी के सारे गुण हैं मुझमें…  नॉनवेज खाते हो?

विनायक –

अब नहीं खाता, गोआ मे खूब मछलियाँ और हैदराबाद की बिरयानी,  जबलपुर मे भी कबाब बनाने वाले ढूंढ कर, बनवाये, खिलाये और खाये……
फिर एक दिन नहीं खाया तो आज तक नहीं खाया.

नायिका –

आपको नहीं लगता इतने सारे ख़त का जवाब देना ब्लॉग लिखने से ज़्यादा भारी काम है?

विनायक –

नहीं बल्कि उल्टा है. ये सारा सिलसिला बातचीत सा लगता है और मुझे पसंद है. ब्लॉग लिखने में अगर सिर्फ़ आपसे बात करते हुए लिखूँ तो बहुत व्यक्तिगत हो जाता है और अगर आपको सुलाकर लिखूँ तो ऐसा लगता है कि दीवारों से बात कर रहा हूँ.

नायिका –

बस एक आखिरी सवाल….  आपने किसी ख़त में लिखा था …

विनायक –

विस्तृत उसी फुरसत में जब आप मुझसे किताबें सुनेंगी………

नायिका –

सुनेंगी मतलब?

विनायक –

अभी तो बहुत जीना है आपको और मुझे, आपके आखिरी सवाल का जवाब पता नहीं कब लिखूँगा…

या कई सारे भ्रमों में से ही हो और किसी सुहानी सुबह, या चटकती दोपहर या धुंधलाती शाम या गुनगुनाती रात आपसे सामना हो जाए और लोग कहे कि हुआ करता था…..

सुनेंगी मतलब मैं पढूँगा और आप सुनेंगी… फिर बात आत्ममुग्धता-सी लगेगी… अच्छा लेखक नहीं हूँ लेकिन अच्छा श्रोता होने के साथ-साथ अच्छा Orator हूँ.

नायिका –

कुछ लोग हुआ करते थे की श्रेणी में नहीं आते….

विनायक –

जैसे? एक-आध का नाम लीजिए और क्यूँ?

नायिका –

जैसे अमृता प्रीतम…… आज भी इमरोज़ की सांसों में ज़िंदा है और मेरे ब्लॉग में… कुछ लोगों की बुरी नज़र से बचाने के लिए बहुत दिनों से उनका ज़िक्र नहीं किया है अपने ब्लॉग में…

बस उन्हीं लोगों से थोड़ी-सी तनातनी हो गई है … ख़ैर, झगड़ालू तो हूँ लेकिन सिर्फ़ कुछ लोगों के साथ…. झगड़ने के बाद मन ख़राब हो जाता है …. बस ख़राब मन लेकर बैठी हूँ आपके सामने ….

कोई ऐसा गीत लगा दीजिए अपने ब्लॉग में कि थोड़ा सुकून आए……

विनायक –

कुछ नाम लीजिए अपनी पसंद का…

नायिका –

अपनी पसंद का नाम दिया तो है तुमको…..विनायक

हाँ गाना मेरी पसंद का नहीं आपकी पसंद का सुनूँगी, आपकी पसंद अच्छी है….

विनायक –

अरे यार कभी तो समझ जाया करो, मैं नाम की नहीं गाने की पसंद का नाम लेने की बात कर रहा था, “समझदार”… सुन लीजिए…

नायिका –

मुझसे ज़्यादा बुद्धू तो तुम हो… विनायक तो अपनी पसंद का नाम बताया था…

उसके बाद लिखा भी तो था गाने तुम्हारी पसंद के ही सुनूँगी… प्यारे बुद्धू…

विनायक –

वाकई अब पहचानने लगी हैं आप मुझे. समझदार तो आप हैं, कल शाम अपनी पिछली बेचैनी वाली रात कब धीरे से मुझे थमा गई पता ही नहीं चला, जब रात के 1 बज गए, लाइट बंद की, और हर करवट पर आँख खुली… बुद्धू हूँ ना सो आपकी तरह बेचैनी का कारण नहीं बता सकता…

नायिका –

कुछ नहीं, बातें पेट में हजम नहीं हो रही, अपनी उम्र भर के किस्से एक ही बार में सुना देने की बेचैनी है ये…

अच्छा ही हुआ जो आपका फोन नंबर नहीं माँगा वरना दो बातूनी लोग मिलकर पता नहीं बातों की कौन सी रेसिपी तैयार कर देते और फिर झगड़ा, रूठना, मनाना… अब ये सब मुझसे नहीं होता भई….

आपके ब्लॉग पर वो दोनों गाने सुने… उस “हरजाई” के लिए थैंक्स

विनायक –

आप सचमुच संसार से निराली है जो हरजाई के लिए थैंक्स बोल रही हैं.

नायिका –

आज जो भी हूँ हरजाई के कारण ही तो हूँ…. मुकम्मल दिल से कहाँ आह निकलती है, टीस तो वहीं से उठती है जहाँ दिल के हज़ारों टुकड़े किये हो हरजाई ने….

विनायक –

अब मैं जाऊँ?

नायिका –

ना कहने के बाद भी कोई नहीं रुकता…. तुम ठहरे समय….. जाओ….

विनायक –

उम्मीद कर रहा हूँ कि जब लौट के आऊँगा तो मेरी उम्मीद से कहीं बड़ा ख़त मेरे लिए मचल रहा होगा!! होगा ना? बाय नायिका…

सूत्रधार –

जी, कहीं मुझे तो हुआ करता था की श्रेणी में नहीं रख दिया ना आपने?? चलिए जो दिल चाहे… हमारी कहानी के पात्र हैं ही इतने दिलचस्प कि किसी का भी दिल आ जाए…

लेकिन आप ये किन सवालों में उलझ गए??? नायक चाहे जबलपुर का हो या गंगटोक का… नायिका चाहे झुमरी तलैया की हो या इन्दौर की… क्या फर्क पड़ता है?

बकौल नायिका- “अब जी लो चाहो तो इसे इसी लोक में
या अलौकिक कहकर ब्रह्माण्ड में घूम आओ
सारी सृष्टि तुम्हारी है, पूरी कायनात को तुमने पाया

सिर्फ तुमने, सिर्फ मैंने, सिर्फ हमने……………….”

क्या कहा नायिका की यह कविता नहीं पढ़ी तो अब पड़ लीजिये, मैं किस मर्ज़ की दवा हूँ…

ये जादू ही तो है
कि बचपन का कोई खेल
जो मन के साथ खेलती आई
वो जीवन में उतर आया….

छुटपन की खिलखिलाहट
और लड़कपन का उन्माद
धीर गंभीर मुस्कराहट पर
होले से लुढ़क आया….

आँखों की भाषा
सुनने लगा कोई
ज़ुबां की खामोशी को
किसी ने गले लगाया…..

हाँ वो बचपन का ही तो
कोई खेल था….
जब आँख मिचौली के खेल में
आँखों पर पट्टी बंधी रहती
और आसपास होती सरसराहट की ओर दौड़ जाती
और पकड़ने की कोशिश करती थी
हाथों से बच निकलने वाले सायों को…

कौन जानता था
आज वही खेल दोबारा खेलूंगी
खुली आँखों से कोई सपना बुनूँगी..
सपने की कोई छवि मन में गढ़ूँगी
और उसे छूने के लिए हाथ बढ़ाऊंगी
और सपने का स्पर्श पा सकूंगी..

एक स्पर्श…..
जो मुझे मुक्त कर जाए
जीवन की दृश्य सीमाओं से
और एक अदृश्य और असीमित लोक में
स्थान दिला दें
जिसे कोई कहता है स्वर्ग
कोई कहता है अलौकिक स्थल
और मैं कहती हूँ जादू……

जो मेरे बाल मन की कोमल कल्पनाओं में उतर आया…
मेरे बचपन ने खेला कोई खेल
और लड़कपन ने गले लगाया
खोजती रही आँखें उस अदृश्य से सपने को
और सपने ने खुद मुझे ये किस्सा सुनाया

कि वो कोई खेल नहीं था
जो तुम खेल रही थी
वो तो उसी सपने की डोर थी
जो तुम बुन रही थी
सपने ने स्वरूप पा लिया
सरसराहट की ओर दौड़ पड़ो
और दबोच लो उसे….

आज ये खेल पूरा हुआ
उतार फेंको आँखों से इस लोक की पट्टी
देखो तुम्हारी कल्पना ने कितना सुन्दर रूप है पाया

अब तुम जादू कहो या कहो सपना
तुम्हारी प्यास ने आज है ये रंग दिखलाया
कि पूरी हुई तलाश
और तुमने सपने का स्पर्श पाया………

अब जी लो चाहो तो इसे इसी लोक में
या अलौकिक कहकर ब्रह्माण्ड में घूम आओ
सारी सृष्टि ही तुम्हारी है
पूरी कायनात को तुमने पाया
सिर्फ तुमने
सिर्फ मैंने
सिर्फ हमने…..

  • प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

नायिका – 14 : पहले आप… कहा ना पहले आप… नहीं पहले आप…

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