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नायिका – 13 : विनय + नायक = विनायक

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नायिका –

डर तो अब भी है… एक औरत होने का……….

डर अब भी है ……… रिश्तों और बातों में पारदर्शिता का

डर अब भी है………………… शनिवार की रात के सपने का और रविवार की रात की बैचेनी का ..

सपनों वाली रात …..एक अदृश्य सा व्यक्ति मेरे साथ घूम रहा है….. मैं खाना खा रही हूँ, जो भी मुझे देखता है उसे वो अदृश्य आदमी दिखाई देने लगता है जिसके आर पार देखा जा सकता है… और वो डर कर मुझसे दूर हो जाते हैं, उसके बाद वो अदृश्य सा आदमी सबको दिखाई देने लगता है मेरे साथ, अब भी उतना ही पारदर्शी है…..

रविवार की रात अजीब बैचेनी रही क्यों उस पारदर्शी इंसान को मुकम्मल क्यों नहीं बना पा रही? शायद रिश्ते को नाम न देने की बचपन की ज़िद धुंधला रही थी, फिर आपका ख़त याद आया…. लिखा था – आपको मेरा पति, भाई या आसपास ही होना था………….

सबसे पहली बात विवाह जैसी परम्परा को मैं नहीं मानती, जिसे साथ रहना होगा वो तो बिना विवाह के भी ताउम्र एक-दूसरे के साथ खुशी-खुशी रह सकते हैं और जिनको नहीं रहना होगा वो चाहे कोर्ट मैरिज कर लें, आर्य समाज से शादी कर लें, निकाह कर लें, किसी भी तरह साथ में जीवन व्यतीत नहीं कर सकेंगे.

रिश्ते में गहराई होगी तो बिना किसी नाम के भी वो सम्मान से देखा जाएगा. और यदि रिश्ते में प्रगाढ़ता और अपनापन नहीं होगा तो किसी भी नाम से पुकार लो, वह उतना सम्मान नहीं पा सकेगा.

आसपास कई लोग है ….समझ सकते हो तुम, बहुत भीड़ है वहाँ पिछले ख़त में उनका ज़िक्र भी किया था…. तुमको उनमें शामिल करना सीरत के मग़रूर इंसान की तौहीन है….

तीन बड़े भाई ज़रूर हैं लेकिन उन्हें देश से ज़्यादा विदेश की मिट्टी से लगाव है सो दो विदेश में रहते हैं. एक छोटे भाई की पोस्ट ज़रूर खाली है (जानती हूँ निहायत ही डरावना प्रस्ताव है, असुरक्षा की भावना से भरा खासकर आपके इस खत के बाद)

यकीन कर सको तो इतना ही कहूँगी ये प्रस्ताव उस डर से नहीं निकला … उस अदृश्य इंसान को एक काया देना चाहती हूँ, जिसके साथ मुझे हाथ पकड़कर चलने में भी कोई डर न लगे….

उम्र में बड़े होंगे अपने घर, मेरा कोई छोटा भाई नहीं जिसे मोटू या गट्टू कह सकूँ, एक कारण और है रिश्ते को नाम नहीं दूँगी तो अपनी ही सोच में भटकती रहूँगी. जीवन में किसी से बात करने के बाद इतनी बैचेनी कभी महसूस नहीं हुई.

जीवन को हमेशा अपने हिसाब से जिया है आज लग रहा है जीवन पहली बार मुझसे उसके हिसाब से जीने की दरख्वास्त कर रहा है, सच पहली बार किसी रिश्ते को मुकम्मल नाम देने का मन कर रहा है…….

समझ सके तो आज से तुम मेरे छोटे से मोटू, वर्ना आप नायक तो हमेशा रहेंगे…… जो मुझसे उम्र में बड़े हैं और मैं बड़ों का आदर करना जानती हूँ…

और आज एक नया नाम दे रही हूँ –

विनय + नायक = विनायक

नायक से विनायक बनकर आया यह जवाब –

डर कैसा?
पारदर्शी इंसान ही तो था.

“..बहुत भीड़ है वहाँ…. तुमको उनमें शामिल करना सीरत के मग़रूर इंसान की तौहीन है…”
आप का ख्याल है ऐसा, वरना मैने तो लिखा था, ‘सीरत से मजबूर हूँ, मग़रूर नहीं’

एक छोटे भाई की पोस्ट…”
मैं कई बार बता चुका हूँ कि मेरी तीन छोटी बहने हैं, अब इस संयोग को देखिये कि तीन बड़े भाइयों की छोटी बहन, तीन छोटी बहनों के बड़े भाई को अपना मोटू बनने को कह रही है.

एक बात पर अंधविश्वास की तरह यकीन करता हूँ कि इस जन्म मे जिनसे भी मेरा परिचय हुआ, हो रहा है और होगा, वो सभी मेरे पिछले जन्मों के परिचित, मित्र या नातेदार हैं और एक दिन ऐसा कोई मिलेगा जिसे देखते या बात करते ही सब कुछ याद आ जायेगा और सारी कड़ियाँ जुड़ जायेंगी.

एक बात का ज़रूर होश सम्भालते से ही अफसोस रहा है कि मेरा कोई भाई नहीं और नियति पर क्रोध भी आता है कि क्यों मेरे बड़े भाई को सिर्फ 11 महिने की उम्र अता की.

“यकीन कर सको तो इतना ही कहूँगी ये प्रस्ताव उस डर से नहीं निकला….”
जीवन भर और किया क्या है? मैंने औरों पर और औरों ने मुझ पर भरपूर यकीन किया. ऐसा नहीं कि फरेब न खाया हो पर अभी अपने पर से यकीन नहीं टूटा सो यकीन करना भी नहीं छूटा.

“एक कारण और है रिश्ते को नाम नहीं दूँगी तो अपनी ही सोच में भटकती रहूँगी, जीवन में किसी से बात करने…”
जब अभी आपसे बातें नहीं होती थी, सिर्फ आपका ब्लॉग पढ़ा करता था, तब एक दिन आपने एक सवाल ब्लॉग पर लिखा था कि, “….किसी एक रिश्ते को नाम देना हो तो क्या नाम देंगे…..” और कई जवाब आये थे और मैने एक गीत की पंक्तियाँ लिखी थी, ‘हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू…’

मुझे हर उस बातमें खुशी होगी जिस से आपको खुशी मिले. माँ बाप ने सिर्फ तीन बहने दी पर कुल बहनो की संख्या तो मुझे भी नहीं मालूम, पर हर रक्षा बंधन पर ……….. चलिये ये रामलाल की कहानी भी किसी दिन ब्लॉग पर ही बताऊँगा.
ठीक?
एक ज़रूरी बात –
हाथ पकड़ कर सिर्फ भाई बहन ही नहीं चला करते.

दूसरी ज़रूरी बात –

माना आप ब्लॉग की दुनिया के मेरे अमिताभ बच्चन है, लेकिन एक नज़र इस मोटू के ब्लॉग पर भी डालें, आपका फ़रमान सर आँखों पर…

– आपका मोटू

सूत्रधार

देखा!!!! क्या कहा था मैंने……… एक बार नायक ने बोलना शुरू किया नहीं कि आप तो मुझे भूल ही गए!!!! हाँ नहीं तो…. अरे भई, आप भूल गए कि वो मैं ही था जिसने आपको नायक और नायिका से मिलवाया था. देखिए तो जनाब नायक से विनायक बन गए तो मेरा पत्ता ही साफ कर दिया. हुंह!!

–  प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

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