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नायिका – 10 : उनका फरमान!!!

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भला लिखना भी मजबूरी में हो सकता है क्या?

न दिमाग में कोई विचार हो, न मन में कोई उमंग, कलम उठाते ही हाथ में दर्द शुरु हो जाये, न लिखने के दसियों बहाने सूझे, पर नहीं साहब, लिखना तो पड़ेगा! पर क्यों? ऐसी भी क्या विवशता है?

है न, उनका फरमान!!!

पहले फतवा दे दिया कि तुम बहुत अच्छे वक्ता हो, मैंने अस्वीकार कर दिया. फिर दूसरा जारी हुआ, लेखक बहुत अच्छे हो, मैंने फिर नकारा.
अरे भाई, कैसे स्वीकार कर लूँ?

पाठक हूँ, अच्छा या बुरा, नहीं जानता; श्रोता हूँ, जो भी सुनाया जाये, बिना प्रतिवाद सुन लेता हूँ, फिर वो संगीत हो, नेताओं के भाषण हों, धर्मगुरुओं के प्रवचन हों, किसी निकटस्थ की प्रेम पगी वज़नदार गाली हो या किसी खास की नफरत से लबरेज़.

अब अच्छा पाठक या श्रोता होना, अच्छा लेखक, गायक या वक्ता होने की अर्हता तो है नहीं, पर नहीं, “तुम्हें लिखना होगा” “चलो ब्लॉग बनाओ”, ठीक है मालिक, सबकी सुनने वाला, आपकी न सुने ऐसा कहीं हो सकता है?

लीजिये बन गया ब्लॉग और आप ही का पसंद किया हुआ नाम भी दे दिया, पर ये तो बता दीजिये कि लिखूँ क्या?

समाधान कुछ भी नहीं, बस एक ही रट, “लिखो”.

मरता क्या न करता के अंदाज़ में डायरी के कुछ साफ सुथरे पन्नों को लाल किया. अपने को कोई बैंक के चैक्स तो साइन करने नहीं कि नीली या काली स्याही इस्तमाल करूँ, सो लाल स्याही की कलम ही रखता हूँ.

जिस जगह मेरी बैठक अपरान्ह तीन – साढ़े तीन बजे से रात साढ़े सात – आठ बजे तक होती है, वही एक मात्र जगह है, जहाँ इस कारनामे को अंजाम दिया जा सकता था. बैठ गये मन के दरिया में जाल डाल कर, लगभग साढ़े चार के आसपास ऐसा लगा कि जाल मे कुछ फंसा.

कलम उठाई, दूसरा वाक्य पूरा हो पाये उसके पहले ही स्वर उभरा, “गुरुदेव प्रणाम”, कोई और मौका होता तो इस सम्बोधन पर गदगद हो, आगंतुक की अभ्यर्थना करता, पर आज तो ऐसा लगा मानो कोई जागीर छीने जा रहा हो. सामने बैठने का इशारा क्या किया, श्रीमन सात बजे तक के लिये कुर्सी से चिपक ही गये. ‘क्षमा करें, बहुत समय ले लिया आपका’, के साथ विदा हुये.

चैन की सांस ली, गनीमत थी कि जाल से फिसल गयी मछली की स्मृति शेष थी, उसके ही सहारे नैया डोली. लंगर उठे ही थे कि फोन गुनगुनाया, “Hello”, सबसे छोटी बहन को आज ही प्यार उमड़ आया था, “हाँ भैया, लो ये सुनो” और फोन के मार्फत जनाब राहत अली खान की आवाज़ कानों मे घुलने लगी, ‘है तुझे भी इजाज़त, कर ले तू भी मोहब्बत……’

इस आवाज़ पर मर मिटने वाला मैं, आज इस आवाज़ से डर गया कि कहीं इस रस की फुहार में मेरी कागज़ की कश्ती डूब न जाये. जैसे ही खान साहब ने विराम लिया और मुझे मौका मिला, “लो अब तुम सुनो”, तब तक जो कुछ भी लिख पाया था, सुना दिया. समझदार है, बोली, ” लिखो लिखो”.

तीनों बहनों में से सबसे ज़्यादा इसी से मेरी पटती है, जब भी बातें होती है, फोन पर या रूबरू, मिनटों में तो समय का हिसाब रखा ही नहीं जा सकता. कई दिनों बाद तो आज फोन आया था, जो भी हो उनका फरमान सर्वोपरि, लिखना तो है ही.

एक बात तो कबूल करना पड़ेगी कि अब जो नैया ने तट छोड़ा तो फिर अविराम ही तैरी और पार लग ही गई. समय देखा तो नौ बज रहे थे यानि बैठक छोड़ने के निर्धारित समय से एक घंटे ऊपर, पर संतोष था.

सड़क चलते दो पुरुषों को बुलाया, पूछा, 15 – 20 मिनट का समय है? दोनों ही मन के रईस रहे होंगे तभी तो हामी भर दी. 15 मिनट में दोनों को अपना पहला लेखन सुनाया. पता नहीं उन्हे लिखा हुआ पसंद आया या सुनाने का ढंग, पर उनके चेहरों से ही समझ आ गया कि चलो ठीक ठाक निपट गया.

अब एक पहाड़ सा काम था, इस चिट्ठे को upload करने का. एक बात और, लिखते वक़्त रचना जितनी अच्छी लग रही थी, दुबारा पढ़ने पर उतनी ही फीकी और नीरस लगी, तिबारा पढ़ने पर इच्छा हो आई कि इसे फाड़ फेंकू और उनसे कह दूँ कि आप है न लिखने के लिये, मुझे कोई भ्रम नहीं कि मेरे लिखने से क्रांति आ जायेगी.

इतने तो लेखक हैं और संसार भर के विषयों पर लिख रहे हैं, मैं भी लिखूँ? अरे बचा क्या है लिखने के लिये, ऊपर से मेरा लिखने का ये ढंग, अब तो लिखे हुये पर शर्म आ रही थी.

अभी तक जिनकी आवाज़ आदेशों के रूप मे कानों में गूंज रही थी, सहसा उनकी छवि आँखों के सामने उभर आई, सब कुछ वही, हूबहू वही, दमकता हुआ भव्य चेहरा, नित्य की तरह माथे पे सिंदूरी सूरज, बस होंठ व्यंगात्मकता मे तनिक टेढ़े, “कहीं मुझे हंसी ना आ जाये तुम्हारा लिखा पढ़ कर, इसी का डर है न मोटू?” अब संसार के किसी भी पैमाने से मुझे मोटा नहीं कहा जा सकता पर यही तो उनकी अदा है.

पर ये शब्द ‘डर’ हमेशा मेरे लिये चुनौती रहा है और ये भ्रम भी अभी तक बरकरार है कि ‘मुझे किसी भी बात का डर नहीं’. शायद इसीलिये उन्होंने जानबूझ कर इस शब्द का इस्तमाल किया. चुनौती काम कर गई, रात को दो बजे अंगडाई ली, लो हो गया upload, अब चाहे हंसो या पछ्ताओ कि क्यों इस गट्टू को लिखने को कहा?

एंटी-क्लायमैक्स : पता नहीं हंसी आई या पछतावा हुआ, अच्छा लगा या बुरा बल्कि पढ़ा भी या नहीं पढ़ा. नहीं ही पढ़ा, वरना कान मरोड़ कर लिखवाने वाले की कोई तो प्रतिक्रिया आई होती.

– नायक

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

(नोट : ये संवाद काल्पनिक नहीं वास्तविक नायक और नायिका के बीच उनके मिलने से पहले हुए ई-मेल का आदान प्रदान है, जिसे बिना किसी संपादन के ज्यों का त्यों रखा गया है)

कहानी को बेहतर समझने के लिए कृपया इसके पहले के सारे भाग अवश्य पढ़ें

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