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नायिका -1 : Introducing NAYAK

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दिक्कत क्या है मेरे साथ जानती हो? मेरे होश नहीं खोते. सच… ऐसा ही हूँ. कुछ चुरा लेने का क्रेडिट तुमसे छीन रहा हूँ. मेरे होते हुए कुछ चुराने की क्या ज़रूरत? हाँ तुमसे शेयर बहुत कुछ किया… होश में किया… और अभी किया ही कितना है? समुद्र से बूँद जितना…

यकीन करो, सारे जीवन के लिए इतनी बातें हैं कि जीवन के छोटे पड़ जाने की आशंका होती है. पहली बार तो बोल रहा हूँ… अभी तक सिर्फ़ सुनता था… लोगों को बोलता दिखता था, उनका भ्रम था… खुद ही सोच के देखो ज़रा, जो कुछ तुमसे कह रहा हूँ और किसी से कह सकता था?

कितनी बार कह चुकी हो तुम मुझे ‘Complete Personality’…. मैं तो नहीं मानता अभी भी… ‘complete’ शब्द बहुत ही कम्पलीट होता है… ‘जहाँ’ मैं हूँ, वहां से अब भी उतनी ही कमी दिखती है, जितनी किसी भी और देखने वाले को दिखती होगी… पर तुम कहती हो तो बहुत अच्छा लगता है और मान लेने को दिल करता है… मानता नहीं, ये अलग बात है… क्योंकि मानने का अर्थ होगा- और ये सोच कर तो तुमने नहीं ही कहा होगा – “मौत”!

Complete होने के बाद क्या शेष रहा, complete का अर्थ सोचो ना… अब कुछ और पाने को, करने को, देखने को, फील करने को, बहुत लम्बी हो जाएगी ये लिस्ट, कुछ भी शेष नहीं रहा, सो दिल के मचलने के बाद भी मानता नहीं… हूँ ना बहुत un-romantic आदमी… क्या करूं, कितनी शराब पी होगी, पर भीतर, ओशो जो होश का दिया जला गए हैं, बुझना तो दूर लिपलिपाता भी नहीं… एक दम अकंप, अहर्निश जलता रहता है और मुझे विवश करता है कहने को कि “मैं डरता नहीं”…

मैं जानता हूँ कि मैं बना ही नहीं इसलिए कि कोई मुझे समझाए, तसल्लियाँ दे… बस वो तो इच्छा होती है कि तनिक मैं भी तो अनुभव करूं कि कैसा लगता होगा औरों को, जब मैं ये सब करता हूँ… अपनी निजी, हर लड़ाई मैंने अकेले ही लड़ी, निहत्थे… बिना रिवाल्वर :), हम अपने पर्सनल मैटर्स खुद ही निपटाते हैं…

कितनी बार ख़याल आया कि मेरा बड़ा भाई होता तो मैं एक अलग ही जीवन जीनेवाला इंसान होता, और तब मैं सक्षम होता तुम्हारे उन दिनों के आर्तनाद को सुनने में जब तुम किसी को पुकार रही थी, लेकिन किसको यह नहीं जानती थी… पर नियति ने कुछ भी तो आसानी से नहीं दिया मुझे…

कितने ही लोगों की ईर्ष्या का विषय हूँ मैं, मुझे पता है… मूर्ख, ये नहीं जानते कि कीमत क्या अदा की है मैंने… अब जब मान चुका था कि ये ही मेरी नियति है और जीवन में एकरसता आ चुकी थी, एक ऐसा ठहराव जिसका अर्थ होता है निश्चित मृत्यु… फिर नियति ने अपनी पोटली में से कुछ मेरी ओर उछाला… मेरी तारीफ़ अगर कोई है तो सिर्फ़ यह कि मैंने नियति की इस भेंट को फिसलने नहीं दिया हाथों से, कस के जकड़ लिया… जिसको मैंने कहा था, ‘कि हम चूके नहीं’. सारा खालीपन, सारा बोझ, सारी एकरसता और पता नहीं क्या क्या, जितनी भी नकारात्मक भावनाएं अपने पंजे फैला रही थी, सब तुमने, पता नहीं कैसे, पर यूं गायब कर दी मानों कभी थी ही नहीं…

मेरी मसीहा, उबार लिया तुमने… ना, चुरा कर खुद को चोर न कहलाओ…. ये सिर्फ़ कृष्ण के बस का काम था… बस सुनती रहो, पीती रहो मुझे… बहुत सी बातें खुद के बारे में पहली बार सुन रहा हूँ मैं, तुमसे! खुद के बारे में बहुत सी बातें पता चल रही हैं, तुमसे!

जब तुम मुझे ज्ञानी कहती हो, उससे कहीं अधिक प्यारा लगता है जब तुम “बुद्धू कहती हो, ज्ञानी कहने वाले बहुत हैं, भला “मोटू” आज तक किसने कहा? तुमने भी तो आजकल “गट्टू” कहना बंद कर दिया है! मुझे बुद्धू, मोटू, गट्टू ही बने रहने दो, मुझमें कोई गुण नहीं, कल ही तो कहा था कि खोखला बांस, ये तुम हो उस खोखलेपन में फूंक मारकर संगीत का सृजन करनेवाली और मुझे बांसुरी बनानेवाली, नहीं तो बांस का टुकड़ा तो सदा से था सदा ही रहता.

तुम्हें बता नहीं सकता कितना चैन मिला आज शाम जब तुमने कहा कि -“बस एक दिन का जादू था यह?” स्थायी कुछ नहीं है इस संसार में सिवाय ‘उसके’, इस जादू और चमत्कारों का इतना ही उपयोग होता है कि यकीन आ जाए, कि अगर बन्दे में ये है, तो बंदा जिसकी रचना है, ‘उसमें’ कितना चमत्कार न होगा!

सुना है ना, ‘तुम्हें देख कर जग वाले पर यकीन नहीं क्यूं कर होगा… जिसकी रचना इतनी सुन्दर, वो कितना सुन्दर होगा…’ कितना ही प्रबल और महान जादूगर क्यूं न हो हमेशा के लिए चमत्कृत नहीं कर सकता, ये सिर्फ़ ‘उसका’ काम है… ये तुम्हारे दरवेश, सूफी, कोई मीरा, कोई चैतन्य, कोई रामकृष्ण… सब उस जादू के मारे हुए हैं, कभी कहीं किसी सौभाग्य के क्षण में देख लिया ‘उसका’ कोई जादू, बस अब संसार की किसी चीज़ में उन्हें जादू नज़र नहीं आता…

तुम्हें जादू ही देखना है तो ‘उसका’ देखो… और कोई प्रयास करने की भी ज़रूरत नहीं… कितने जादू तो दिखाए हमें… गिनाऊँ? याद है ना…. इतने सारे ब्लॉग्स में से सिर्फ़ तुम्हारे ब्लॉग पर ठहरना… ये क्या था…

सारे रास्ते बंद होने और चारों तरफ से घिरे होने के बावजूद हमारा आगे बढ़ते ही चले जाना, ये क्या ‘उसकी’ मर्ज़ी के बिना हो रहा है???

कभी मैंने तुम्हें चाँद साहब का ये मिसरा लिखा था कि –

“उन्हीं की महफ़िल है दुनिया सारी,

इसे वो कब से सजा रहे हैं….

बना रहे हैं मिटा-मिटाकर,

बना बना कर मिटा रहे हैं”

सोचो तो, हम ज़िन्दा रहने के लिए कर ही क्या रहे हैं, सांस हमारी मर्ज़ी से आती जाती है? दिल हमारे कहे धड़कता है? है क्या हमारे बस में? इसी से तो कहता हूँ सिर्फ़ दो ही रास्ते हैं, पूर्ण समर्पण या फिर पूर्ण विरोध, समर्पण से प्रेम मार्ग और विरोध से ध्यान मार्ग निकलता है…

कहने में दोनों एक दूसरे के विपरीत मालूम होते हैं, पर तुम भी जानती हो कि है नहीं, सिर्फ़ एक दूसरे के पूरक हैं जैसे मैं और तुम, प्रेम के बिना ध्यान अधूरा, एक दम शुष्क, रूखा सूखा, नीरस, वहीं ध्यान के बिना प्रेम दिग्भ्रमित, दिशाहीन, भटका हुआ… प्रेम और ध्यान… ध्यान और प्रेम… दोनों मिले तो ही निर्माण होता है पूर्ण का… complete… The complete human… और तुम क्या सोचती थी कि यूं ही तुम्हें प्यार प्यार कहता हूँ!!!

“I love you beyond your most spiritual imagination…” …. आज तक की कही गयी बातों में से सबसे बड़ी बात. रोज़ ही तो कहता हूँ कि लिखो…लिखो…

जब तुम लिखती हो, “तुम्हारी गुड़िया रानी, तुम्हारा प्यार, तुम्हारी पिछले जन्म की यादें, तुम्हारा वर्तमान, तुम्हारा भविष्य, तुम्हारी नायिका, तुम्हारी तुम”…… ये है पूर्ण समर्पण…. मेरे ध्यान में ही कुछ कमी है… बस यूं ही साथ रही तो ये कमी भी पूरी हो जाएगी…

आता हूँ…

– तुम्हारा नायक

(यह 2008 में नायक द्वारा नायिका को वास्तविक रूप में लिखे गए उन बहुत सारे पत्रों में से एक है, जो उन्होंने उनकी पहली मुलाक़ात से पहले मेल से भेजे थे, जब उन्होंने एक दूसरे को देखा तक नहीं था)

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली

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