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माँ की रसोई से : गिलकी की झिलमिल रेसिपी

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माँ मेरी अक्सर पीठ पर एक धोंक जमा देती, ‘नखीत्री’! ससुराल जाकर हमारा नाम ऐसे रोशन करेगी… चने की दाल और तुअर की दाल में फर्क नहीं पता!! तुरई और गिलकी कितनी तो अलग दिखती है… जिसमें कांटे वाले छिलके होते हैं वो तुरई होती…

ऐसे माँ कितना भी मार ले, ससुराल के नाम पर ऐसे बोलती तो मैं चिकने छिलके वाली गिलकी से कांटेदार छिलकों की तुरई सी हो जाती…

लेकिन मजाल की मुंह से एक शब्द भी निकला हो मुंहजोरी में… जवाब देना कभी सीखा ही नहीं… जीवन में कभी किसी को जवाब नहीं दिया…. सारे सवाल इकट्ठे होते गए…

सवाल मस्तिष्क में जमा हो जाए तो इंसान इधर उधर का पढ़कर या देख कर ही जवाब खोज लेता है… लेकिन सवाल हृदय में जमने लगे तो धड़कने भारी होने लगती हैं… धमनियों और शिराओं का काम दोगुना हो जाता है… ज़रा सी चोट भी हृदय को बड़ी पीड़ा दे जाती है…

और जब हृदय में यह सब समाने के लिए जगह नहीं बची तो सारे सवाल ज्वालामुखी से एक साथ फट पड़े, जिसका लावा व्यवहार में भी रिसने लगा…

मेरे जीवन के शुरुआती साल बस इसी लावे के बहने के दिन थे… ज्वालामुखी ने बहुत कुछ नष्ट किया… और अब लावा ठंडा होने के दिन हैं ये… कई नई धातु और आवश्यक खनिज बन गए हैं इस ठंडे लावे से… जिनका सदुपयोग करना ही जीवन का उद्देश्य है…

एक बीस साल की लड़की जिसे चना दाल और तुअर दाल का फर्क नहीं मालूम, जिसे गिलकी और तुरई में अंतर नहीं पता… उसे तो बहुत बाद में पता चलता है कि गिलकी को नेनुआ भी कहते हैं… आज वो चालीस की दहलीज़ पार कर उसी गिलकी की झिलमिल सब्ज़ी बनाना सिखा रही है… जीवन की सादी सी तुअर की दाल में चरपरा तड़का लगाना उसे खूब आ गया है…

चिकने छिलके वाली अपनी प्यारी गिलकियों को गिलकी ही रहने देना…उन्हें कांटेदार छिलकों वाली तुरई बन जाने से रोकना… यही गिलकियां अपने जीवन को झिलमिल कर उसे स्वादिष्ट बनाएंगी और अपनी माँ का नाम भी रोशन करेंगी…

रसोई में चूल्हे की आग हो या जीवन में अनुभवों की, उसका सही उपयोग किया जाए तो वो भूख शांत करने के ही काम आती है… भूख चाहे पेट की हो या आत्मा की…

याद रखना लड़कियों में धरा सा धैर्य होता है तो ज्वालामुखी भी तो इसी धरा से फूटता है ना!

इतनी लम्बी रेसिपी बस इसीलिए बताई है कि आध्यात्मिक यात्रा से मन थक गया हो तो ये सोचिये कि जिन लोगों ने आपको चुना है, आपकी आध्यात्मिक यात्रा भी उनके ही नियंत्रण में है, आपके हाथ में कुछ नहीं… हमारे हाथ में जो है वो बस अपने आस-पास सकारात्मक विचारों से आभामण्डल को मजबूत करना, जो ज़रूरी नहीं बड़ी बड़ी बातों से ही हों, बहुत छोटी छोटी बातें भी जीवन में बड़ा बदलाव लाती है… बस उस पर फोकस करने की ज़रुरत है..

बाकी आपकी ये झिलमिल गिलकी की त्वचा में झिलमिलाहट किसी महंगे फेस क्रीम से नहीं, बच्चों के छोड़े हुए केले के आखरी टुकड़े को चेहरे पर पोत लेने से आई है… You know BEST out of WASTE… 🙂

जीवन की दरारों में बस ऐसे ही लीपापोती करते हुए आगे बढ़िये… जो बातें आपके जीवन में waste की तरह हैं उनका भी सदुपयोग कर उसे BEST बनाइये.. देखिये आपके जीवन में भी कैसे रोज़ खुशियाँ पकती हैं….

– माँ जीवन शैफाली

सीधे रस्ते की ये टेढ़ी सी चाल है…

मैं अपनी ही प्रेमिका हूँ

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