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कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

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सुख-साधन-सत्ता के शिखर पर आरूढ़ व्यक्ति भी जब आत्महत्या जैसे घृणित कार्य को अंजाम देता है तो मेरा मन क्षुब्ध हो उठता है; क्षुब्ध हो उठता है मेरा मन जब मैं अखबारों के पन्नों में आत्महत्या जैसी खबरों को सुर्खियाँ बटोरते पाता हूँ; बहुत क्षोभ होता है तब जब मैं पाता हूँ कि आईआईटी जैसे उच्च संस्थाओं में पढ़ने वाले या पढ़कर निकलने वाले छात्र आत्महत्या जैसे कायरतापूर्ण विकल्प का चयन करते हैं.

क्या हमारी शिक्षा उनमें इतना भी आत्मविश्वास नहीं पैदा कर पाती कि वे जीवन के उतार-चढ़ाव का साहस और धैय के साथ सामना कर सकें?

मेरा मानना है कि आत्महत्या हत्या से भी अधिक कुत्सित और घृणित कृत्य है, क्योंकि हत्या के पीछे निहित स्वार्थ या प्रतिशोध की दुर्भावना काम कर रही होती है, पर यहाँ तो केवल कायरता और पलायनवादिता के अतिरिक्त और कोई ठोस कारण नहीं होता.

हत्या की यंत्रणा जितनी गहरी होती है, आत्महत्या की यंत्रणा उससे भी गहरी होती है, आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपने घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को अनगिनत सवालों से जूझने के लिए छोड़ जाता है, हर आँख उसे संदेह के घेरे में ले रही होती है.

मुझे तो कई बार यह लगता है कि आत्महत्या करने वाले लोग सहानुभूति नहीं घृणा के पात्र अधिक हैं, चाहे उन्होंने कैसी भी मज़बूरी में ऐसा निर्णय क्यों न लिया हो? कोई भी मज़बूरी मनुष्य के मनोबल से बड़ी नहीं हो सकती!

कायर और भगोड़े लोग आत्महत्या करते हैं और समाज को भी पलायन का पाठ पढ़ा जाते हैं. ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं किया जाना चाहिए और इतिहास ऐसे लोगों को माफ़ करता भी नहीं! कोई भी मज़बूरी, कोई भी समस्या, कोई भी चुनौती इतनी बड़ी नहीं कि उससे पार नहीं पाया जा सके.

आप किस सपने के टूटने की बात करते हैं? क्या आपका सपना आपके माता-पिता, घर-परिवार से बड़ा है? आपने तो उन्हें जीते-जी मार दिया? वे आपको याद करते-करते सभी को शक-संदेह से देखने लगते हैं! लोगों पर से उनका सहज विश्वास ही उठ जाता है.

आपसे बढ़कर उनके लिए कोई और सपना नहीं था, आप ही उनके सपनों के जीवित-जाग्रत स्वरूप थे, आपने तो एक नहीं अनेक सपनों का गला घोंट दिया! क्या हुआ कि आपका आईआईटी, मेडिकल, मैनेजमेंट कोर्सेस में चयन नहीं हुआ; क्या हुआ कि आपने अच्छा स्कोर नहीं किया; क्या हुआ कि आपने जीवन से जो चाहा था, वैसा नहीं मिला; क्या हुआ कि आपको अपने भी समझ नहीं पाए; क्या हुआ कि आपको दुनिया ने बहुत कलंकित किया; ये सभी कारण बहुत छोटे हैं, बहाने हैं, बक़वास हैं. जीवन ऐसे असंख्य कारणों से बड़ा है. याद रहे, जीवन का ध्येय केवल जीवन है! जी हाँ, केवल जीवन!!

मानिए कि आपमें हिम्मत की कमी थी; कि आपमें साहस नहीं था; कि ज़िन्दगी ने जब आपको साहस दिखाने का मौका दिया, ठीक उसी वक्त आप ज़िन्दगी से भाग खड़े हुए; क्या आप पहले व्यक्ति थे जिसने इस प्रकार का तनाव और अवसाद झेला; क्या आप पहले व्यक्ति हैं, प्रतिकूलताएँ कदम-कदम पर जिनका रास्ता रोके खड़ी हैं?

झूठे हैं आप, दुनिया की आँखों में धूल झोंक रहे हैं आप, याद रखिए कि दुनिया की आँखों में धूल झोंकना तो बहुत आसान है, पर अपनी आँखों में, शायद असंभव! आपको सोचना चाहिए कि समस्या चाहे कितनी भी बड़ी और अधिक क्यों न हो, आपका होना मात्र समस्याओं से कहीं अधिक बड़ा और आशय भरा है.

याद रखिए, बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्ज़ा करती हैं. शिवाजी ने बहुत छोटी आयु में ही अभेद्य किलों और दुर्गों पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसका एकमात्र कारण यह था कि उनका बचपन संघर्षों और अभावों में बीता था; पिता की छाँह से दूर वे जीवन की तपती धूप में पले-बढ़े थे; प्रताप ने भारत की आन-बान-शान की रक्षा की, अपने शौर्य एवं पराक्रम से वीरता का एक नया अध्याय रचा, क्योंकि उन्होंने महलों का ऐशो-आराम छोड़ बीहड़ों और जंगलों का ख़ाक छानना स्वीकार किया, अपने फूल से बच्चों को भूख से बिलबिलाते और तड़पते देखा; महाभारत में देश के प्रायः अधिकांश वीर कौरवों के पक्ष में थे, फिर भी जीत पांडवों की हुई, क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के ज़ोखिम को पार किया था; ऐसा कौन है इस जगत में जो संघर्षों की आग में तपे-जले बिना चमका-दमका हो, है कोई..?

ज़िन्दगी की दो सूरते हैं! एक तो यह कि आदमी बड़े-से-बड़े मक़सद के लिए कोशिश करे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए, और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अंधियारे का जाल बुन रही हों, तो भी वह पीछे को पाँव न हटाए.

दूसरी सूरत यह है कि उन बेबस, लाचार, ग़रीब आत्माओं के हमजोली बन जाएं जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुःख पाने का ही संयोग है, क्योंकि ऐसी आत्माएँ उस दुनिया में बसती हैं, जहाँ न तो जीत हँसती है, और न कभी हार के रोने की आवाज़ ही सुनाई देती है.

ऐसी दुनिया के लोग बंधे हुए घाट का पानी पीते हैं, वे ज़िन्दगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते!और कौन कहता है कि पूरी ज़िंदगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनन्द नहीं है! अगर रास्ता आगे ही आगे निकल रहा हो तो असली मज़ा तो पाँव बढ़ाते जाने में ही है. जिसने चरैवेति-चरैवेति का मर्म जान लिया, उसने जीना सीख लिया.

साहस सभी गुणों का वाहक है. साहस की ज़िंदगी सबसे बड़ी ज़िन्दगी होती है. ऐसी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि यह बिलकुल निडर, बिलकुल बेख़ौफ़ होती है. साहसी मनुष्य इस बात की चिंता बिलकुल नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोचते और क्या कहते हैं!

जनमत की उपेक्षा करके चलने वाले लोग दुनिया की असली ताक़त हुआ करते हैं, मनुष्यता को प्रकाश भी ऐसे ही लोगों से मिल पाता है. झुंड में चरना और झुंड में चलना भेड़-बकरियों का काम है, सिंह तो अकेला भी मग्न रहता है. यदि आप अड़ोस-पड़ोस की टिप्पणियों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं तो आपमें साहस की कमी है. साहसी मनुष्य उन सपनों में भी रस लेता है, जिसे दुनिया पागलपन समझती है. साहसी मनुष्य सपने उधार नहीं लेता, वह तो अपनी धुनों में रमा हुआ अपनी ही कहानी गढ़ता है, अपनी ही किताब पढ़ता है.

सच तो यह है कि ज़िन्दगी से, अंत में, हम उतना ही पाते हैं जितनी कि उसमें पूँजी लगाते हैं और यह पूँजी लगाना बड़े संकटों का सामना करना है, उसके उस पन्ने को पलटकर पढ़ना है, जिसके सभी अक्षर फूलों से ही नहीं कुछ अंगारों से भी लिखे गए हैं. अंगारों से लिखे गए पृष्ठों को छोड़ जो भाग खड़ा होता है, ज़िन्दगी भी उसे छिटक आगे बढ़ जाती है.

ज़िन्दगी को उसी ने समझा है जो यह मानकर चलता है कि ज़िन्दगी कभी भी न ख़त्म होने वाली चीज़ है. आज दुःख है तो कल सुख भी होगा, हर स्याह-अँधेरे रात की भी सुबह जरूर होती है. इसलिए कभी भी, कैसी भी स्थिति-परिस्थिति में निराश-हताश होकर स्वयं को चोट पहुंचाना मूर्खता है.

ज़िन्दगी को ठीक से जीना हमेशा ही ज़ोखिम झेलना है. जो ज़ोखिम से बचकर सुविधाओं के पीछे दौड़ते-भागते रहते हैं, वे अंततः उसी में कैद होकर मर जाते हैं. महाकवि दिनकर के शब्दों में :-
यह अरण्य झुरमुट जो काटे अपनी राह बना ले
क्रीतदास यह नहीं किसी का जो चाहे अपना ले
जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर जो उससे डरते हैं
वह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं.

इसलिए जो मिला है, उसे स्वीकार कीजिए. वह आपके ही ज्ञात-अज्ञात कर्मों का फल है. यदि नहीं भी है तो द्रष्टा-भाव से स्वीकार करें. मनुज रूप में अवतार लेने वाले अवतारी पुरुषों को भी जीवन के कष्टों-तापों से गुज़रकर ही पूर्णता मिली है, उनके सामने हमारा-आपका अस्तित्व तो नगण्य ही है न!

महाकाल देवता सपासप कोड़े बरसा रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनकी चेतना उर्ध्वगामी है, जो अपने भीतर से जीवन-रस खींच डटे हैं, खड़े हैं, जूझ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा मज़बूत है- वे बचे रहेंगे. अंत में, नीरज की इन पंक्तियों के साथ आपको छोड़े जाता हूँ :-

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों
लौ की आयु घटाने वालों
लाख करे पतझड़ कोशिश
पर उपवन नहीं मरा करता है
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है
जीवन नहीं मरा करता है…!!

– प्रणय कुमार

जीवन की जिजीविषा और मृत्यु की घटनाओं पर ओशो ने एक बहुत सुन्दर कथा कही है…..

महावीर एक गांव के पास से गुजर रहे हैं. और महावीर का एक शिष्य गोशालक उनके साथ है, जो बाद में उनका विरोधी हो गया. एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं.

गोशालक महावीर से कहता है कि सुनिए, यह पौधा लगा हुआ है. क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा? इसमें फूल लगेंगे या नहीं लगेंगे? यह पौधा बचेगा या नहीं बचेगा? इसका भविष्य है या नहीं?

महावीर आंख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं.

गोशालक पूछता है कि कहिए, आंख बंद करने से क्या होगा? टालिए मत.

उसे पता भी नहीं कि महावीर आंख बंद करके क्यों खड़े हो गए हैं. वे एसेंशियल की खोज कर रहे हैं. इस पौधे के बीइंग में उतरना जरूरी है, इस पौधे की आत्मा में उतरना जरूरी है. बिना इसके नहीं कहा जा सकता कि क्या होगा.

आंख खोल कर महावीर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुंचेगा.

गोशालक उनके सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है, और खिलखिला कर हंसता है, क्योंकि इससे ज्यादा और अतर्क्‍य प्रमाण क्या होगा? महावीर के लिए कुछ कहने की अब और जरूरत क्या है? उसने पौधे को उखाड़ कर फेंक दिया, और उसने कहा कि देख लें. वह हंसता है, महावीर मुस्कुराते हैं. और दोनों अपने रास्ते चले आते हैं.

सात दिन बाद वे वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं. जैसे ही महावीर और वे दोनों अपने आश्रम में पहुंचे जहां उन्हें ठहर जाना है, बड़ी भयंकर वर्षा हुई. सात दिन तक मूसलाधार पानी पड़ता रहा. सात दिन तक निकल नहीं सके. फिर लौट रहे हैं. जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए हैं जहां वे सात दिन पहले आंख बंद करके खड़े थे. देखा कि वह पौधा खड़ा है. जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गईं, वह पौधा खड़ा हो गया.
महावीर फिर आंख बंद करके उसके पास खड़े हो गए, गोशालक बहुत परेशान हुआ. उस पौधे को फेंक गए थे. महावीर ने आंख खोली.

गोशालक ने पूछा कि हैरान हूं, आश्चर्य! इस पौधे को हम उखाड़ कर फेंक गए थे, यह तो फिर खड़ा हो गया है!

महावीर ने कहा, यह फूल तक पहुंचेगा. और इसीलिए मैं आंख बंद करके… खड़े होकर इसे देखा! इसकी आंतरिक पोटेंशिएलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है? इसकी भीतर की स्थिति क्या है? तुम इसे बाहर से फेंक दोगे उठा कर तो भी यह अपने पैर जमा कर खड़ा हो सकेगा? यह कहीं आत्मघाती तो नहीं है, सुसाइडल इंस्टिंक्ट तो नहीं है इस पौधे में, कहीं यह मरने को उत्सुक तो नहीं है! अन्यथा तुम्हारा सहारा लेकर मर जाएगा. यह जीने को तत्पर है? अगर यह जीने को तत्पर है तो… मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंक दोगे.

गोशालक ने कहा, आप क्या कहते हैं?

महावीर ने कहा कि जब मैं इस पौधे को देख रहा था तब तुम भी पास खड़े थे और तुम भी दिखाई पड़ रहे थे. और मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़ कर फेंकोगे. इसलिए ठीक से जान लेना जरूरी है कि पौधे की खड़े रहने की आंतरिक क्षमता कितनी है? इसके पास आत्म-बल कितना है? यह कहीं मरने को तो उत्सुक नहीं है कि कोई भी बहाना लेकर मर जाए! तो तुम्हारा बहाना लेकर भी मर सकता है. और अन्यथा तुम्हारा उखाड़ कर फेंका गया पौधा पुनः जड़ें पकड़ सकता है.

गोशालक की दुबारा उस पौधे को उखाड़ कर फेंकने की हिम्मत न पड़ी; डरा.

पिछली बार गोशालक हंसता हुआ गया था, इस बार महावीर हंसते हुए आगे बढ़े.

गोशालक रास्ते में पूछने लगा, आप हंसते क्यों हैं?

महावीर ने कहा कि मैं सोचता था कि देखें, तुम्हारी सामर्थ्य कितनी है! अब तुम दुबारा इसे उखाड़ कर फेंकते हो या नहीं?

गोशालक ने पूछा के आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं.

तब महावीर ने कहा, वह गैर अनिवार्य है. उखाड़ कर फेंक भी सकते हो. अनिवार्य यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था. उसके पूरे प्राण जीना चाहते थे, वह अनिवार्य था. वह एसेंशियल था. यह तो गैर अनिवार्य है, तुम फेंक भी सकते हो, नहीं भी फेंक सकते हो. यह तुम पर निर्भर हे. लेकिन तुम पौधे से कमजोर सिद्ध हुए हो— हार गए.

महावीर से गोशालक के नाराज हो जाने के कुछ कारणों में एक कारण यह पौधा भी था.

जिस ज्‍योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से एसेंशियल से फाउण्‍ड़ेशनल से है. आपकी उत्‍सुकता ज्‍यादा से ज्‍यादा सेमी एसेंशियल तक आती है. पता लगाना चाहते हैं कि कितने दिन जियूंगा, मर तो नहीं जाऊँगा, जीकर क्‍या करूंगा. जी ही लूंगा तो क्‍या करूंगा, आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती.

मरूंगा तो मरने के बाद क्‍या करूंगा. इस तक भी आपकी उत्‍सुकता नहीं पहुँचती. घटनाओं तक पहुँचती है, आत्‍माओं तक नहीं पहुँचती. जब मैं जी रहा हूं तो यह तो घटना है सिर्फ— जीकर मैं क्‍या हूं. वह मेरी आत्‍मा होगी. हम सब मरेंगे. मरने के मामले में सबकी घटना होगी. लेकिन मरते क्षण में मैं क्‍या होऊंगा, क्‍या करूंगा. मरने के क्षण में हमारी स्‍थिति सब से भिन्‍न होगी. कोई मुस्कराते हुए भी मर सकता है.

– ओशो

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