तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो एक दांव लगा ले

हौसलों के पंख होते हैं, पैर नहीं। वो जब ठन जाता है, तो कोई आसमान उसकी पकड़ से बच नहीं सकता। एक ऐसे ही हौसले को मैंने आसमान की बुलंदी को छूते हुए देखा है। एक पैर की मोरनी को मैंने सावन में झूमते हुए देखा है। कोई फर्क नहीं पड़ता वह दिसंबर 1986 में … Continue reading तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो एक दांव लगा ले