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आज की नायिका : जानती नहीं थी माहवारी, बेचती थी सेनेटरी नैपकिन

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घर में सबसे बड़ी बेटी लेकिन उम्र केवल 13 साल, पिता की बीमारी से घर की ज़िम्मेदारी उसके नाज़ुक से कन्धों पर आ गयी. काम क्या करना है जानती नहीं थी. एक परिचित ने कहा सेल्सगर्ल बन जाओ, मैं दिलवाता हूँ काम, तो वो सेल्सगर्ल बन गयी. उसके हाथों में पकड़ा दिए गए सेनेटरी नैपकिन के पैकेट्स.

उसने पूछा ये क्या है? साथ काम कर रही अन्य लड़कियों कहा – कुछ नहीं, तुम बस लोगों के घर जाकर घर की औरतों को मिलना और उनको ये पैकेट्स बताकर कीमत बता देना.

भोली सी सूरत वाली इस लड़की जब लोगों के दरवाज़े पर जाती तो उसके मासूम चेहरे और बोली सुनकर वे उससे पैकेट्स खरीद लेते. दिन भर में बाकी लड़कियों से चार गुना ज़्यादा पैकेट्स बेचकर आती थी. मालिक को शक हुआ तो उसका पीछा करवाया लेकिन सच यही था कि जिस चीज़ के बारे में जानती नहीं थी उसे खरीदने के लिए वो अच्छे से लोगों को आश्वस्त कर देती थी.

13 साल की उम्र में घर की मजबूरियों की वजह से शुरू किया काम सात साल तक करती रही, इस दौरान बीच सड़क पर पैकेट्स बेचते हुए ही उसे माहवारी शुरू हो गयी. साथ वाली लड़कियों की मदद से किसी के घर में जाकर पहली बार उन पैकेट्स का उपयोग जान पाई, जिन्हें इतने समय से बिना उपयोग जाने सबसे ज़्यादा बेचकर आती थी.

एक बार काम शुरू करने के बाद फिर उसकी घर वापसी नहीं हो सकी… लेकिन पढ़ाई के साथ साथ फोटोग्राफी सीखी, शादी पार्टी में कैमरामैन के साथ जाती, साथ में फोटोग्राफी करती, लैब में नेगेटिव से फोटो बनाती. बीकॉम पास किया.

इस दौरान कैमरामैन से प्रेम हो गया, जिस उम्र में जानती नहीं थी शादी क्या होती है, उस उम्र में शादी कर ली, दो बच्चे हो गए.

घर परिवार की ज़िम्मेदारी यहाँ पर भी उसके कन्धों पर रही, घर में पापड़, बड़ी बनाकर बेचती थी..

आजकल ब्यूटी पार्लर खोल लिया है, साथ में एक छोटी सी दुकान भी खोल ली है- साबुन शैम्पू बिंदी बेचती है.

मेरा अक्सर उसकी दुकान पर जाना होता है… उस रोज़ देखा दुकान में एक सिलाई मशीन भी रख ली है, कहने लगी भाभी आजकल ब्लाउज़ भी सिलने लगी हूँ, आपको सिलवाना हो तो बताना..

मैं जानती हूँ वो सुबह पांच बजे उठकर पहले हॉस्टल में रहने वाली दस लड़कियों का टिफिन तैयार करती है, बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजती है, फिर यहाँ आकर दुकान और ब्यूटी पार्लर चलाती है…

मैंने एक दिन पूछ लिया- तुम इतनी मेहनत करती हो, तुम्हारे पति क्या करते हैं?

वो हंसके कहने लगी- आपको नहीं पता? पूरा मोहल्ला जानता है… यहीं आसपास कहीं सड़क पर दारू पीकर कोई पड़ा दिख जाए तो समझना वही है….

मैं उसका मुंह तकती रह गयी… चेहरे पर सुन्दरता के साथ इतना आत्मविश्वास और दबंगता देखकर मैं पूछे बिना नहीं रह सकी…

दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेती?

बच्चों को कौन अपनाएगा? और यदि किस्मत में सुखी शादीशुदा ज़िंदगी लिखी होती तो उसीसे ही न मिल गयी होती, क्या ग्यारंटी कि दूसरा ऐसा नहीं निकलेगा?

मैंने कहा- और तुम्हारा अपना जीवन? तुम्हारे मन के सपने, तन की इच्छाएं?

हंसकर कहती है- वो सब तो कब की मर चुकी…. जैसे भी है उम्मीद रहती है कि किसी दिन ये भी ठीक हो जाएँगे …. मैंने तो समझा समझा कर थक चुकी हूँ…. अब तो बेटा भी बड़ा हो गया है, तो अब मार-पिटाई नहीं करते, बेटा डंडा लेकर खड़ा हो जाता है, खबरदार जो मेरी माँ को छुआ…

दुकान और घर में जहां पैसे रखती हूँ वहां ताला लगाकर रखना पड़ता है, घर आते हैं कभी तो अकेला नहीं छोड़ सकते, वरना शराब खरीदने के लिए पैसे नहीं होते, तो घर के बर्तन बेच आते हैं… ससुराल वाले भी साथ नहीं देते, अच्छे पढ़े लिखे महाराष्ट्रियन परिवार से हैं … कुछ कहती हूँ तो उलटा मेरे पर बरस जाते हैं सब… देखो तो कितनी गज भर लम्बी ज़ुबान है…. और चुप रहो तो कहते हैं… देखो चार पैसे कमाने लगी है तो कितना घमंड आ गया है मुंह से बोल तक नहीं फूटते…. अब आप ही सोचो ऐसे लोगों से क्या उम्मीद रखूँ…

वो और भी बहुत कुछ कहती रही… लेकिन मेरे कान तो जैसे बहरे हो गए थे…. मैं बस उसके चेहरे को तकती रही… अपनी कहानी ऐसे सुना रही थी जैसे किसी पड़ोसन की बात कर रही हो…

मैंने कहा- तुम्हारा फोटो तुम्हारी कहानी के साथ डाल दूं…. तो खिलखिलाकर हंस पड़ी… ले लो भाभी…. अरे ये वाली अच्छी नहीं आई है… दूसरी लो ना … ऐसे खड़ी हो जाती हूँ… हाँ ये वाली ठीक है….

उसकी वो हंसी…. उसकी बातें… उसकी जिजीविषा…

जाते जाते मैंने भी कह दिया… तुमने आखिर ब्यूटी पार्लर के चक्कर फिर शुरू करवा दिए मेरे… अच्छी भली इंसान बनकर रह रही थी इतने साल से… तुमने फिर से मुझे औरत बना दिया…

– माँ जीवन शैफाली

पुनश्च : दो दिन पहले पता चला अपने बेटे में प्रतिभा देख उसे रंगमंच के लिए भेजा था, उस संस्था में ऑडिशन हुआ और उसका बेटा किसी टीवी सीरियल में अभिनय के लिए चयनित हुआ. आज उसकी मेहनत रंग लाई… कल वह बेटे को लेकर मुंबई रवाना होने वाली है….

दिव्यांगना बनी वीरांगना

 

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