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पैसा, प्रेम, परमात्मा : प्रचलित, प्रचलन, प्रचोदयात

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जैसा कि मेरे साथ हमेशा होता है मेरा रचनात्मक संसार मेरे साथ कोई न कोई खेल खेल रहा होता है, अधिकतर अर्ध चैतन्य अवस्था में कोई शब्द मुझे पकड़ा दिया जाता है और कहा जाता है बुनो इसके आसपास ताना बाना।

अरे भाई यहाँ कोई शब्दों और ज्ञान का खज़ाना थोड़ी ना बंट रहा है जो ऐसे शब्द पकड़ा जाते हो जिसका एक से दूसरे का दूर दूर तक कोई नाता नहीं।

पिछली बार तन्मय और तल्लीन में उलझाया था, इस बार उलझाया है – प्रचलित, प्रचलन, प्रचोदयात में।

जीवन में जिसने कभी गायत्री मंत्र का अर्थ न जाना हो, उसे आप प्रचोदयात को विस्तारित करके प्रचलित और प्रचलन से जोड़ने को कहोगे तो उसके पास सिवाय हाथ फैलाने के अलावा कोई चारा नहीं होता.. भाई तुमने शब्द दिए हैं, तुम्ही व्याख्या भी दे दो, हम तो ये बैठे हैं कम्प्यूटर की बोर्ड पर ठक-ठक करते हुए टकटकी लगाए कि देखें अब कौन सा बाना बुना जाएगा जिसके लिए लोग मुझे ताना मारेंगे।

फिर सोचा वो जब लिखा जाएगा तब लिखा जाएगा, तब तक मैं खुद तो प्रचोदयात का अर्थ जान लूं… तो जो अर्थ मुझे मिला उसके अनुसार –

प्रचोदयात् का रहस्य

प्रचोदयात् का अर्थ है- प्रेरणा करना, जोड़ना, बढ़ाना। गायत्री द्वारा उस सविता, वरेण्य, भर्ग का ध्यान करते हैं। यह ध्यान इसलिए करते हैं कि उसमें सद़्बुद्धि की याचना परमात्मा से की गई है पर वह आज की दीन-हीन विधि से नहीं वरन् वैदिक संस्कृति के अनुसार, आत्म गौरव से युक्त भावना से की गई है। दीनता के साथ भिक्षा माँगना भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाता फिर चाहे वह भिक्षा ईश्वर से ही क्यों न माँगी गई हो।

गायत्री मन्त्र में प्रचोदयात् शब्द बहुत ही शानदार है। उसमें आत्मा के गौरव की पूरी तरह रक्षा की गई है। आत्मा शक्तियों का भण्डार है। उसमें वे सब तत्व मौजूद हैं जिसकी सहायता से वह मनचाही स्थितियाँ तथा वस्तुएँ प्राप्त कर सके। उसे किसी वस्तु या स्थिति की याचना करने की आवश्यकता नहीं, केवल ऐसी प्रेरणा की आवश्यकता है जिससे बुद्धि शुद्ध हो जाय, कुबुद्धि का निवारण होकर उसका स्थान सुबुद्धि ग्रहण कर ले। जब सुबुद्धि आ जाएगी तो संसार का कोई भी ऐश्वर्य उसके लिये दुर्लभ न होगा।

गायत्री में ‘सद़्बुद्धि की प्रेरणा, प्रोत्साहन, आशीर्वाद देने की ईश्वर से प्रार्थना की गई है क्योंकि सद़्बुद्धि भी अपने प्रयत्न से ही आती है, इसके लिए संयम, व्रत, उपवास, स्वाध्याय, सत्सङ्ग, सेवा आदि सत्कर्मों का आश्रय लेना पड़ता है, पर उसकी प्रेरणा ईश्वर से ही प्राप्त होती है। अन्तःप्रेरणा न हो तो उपर्युक्त सारे कर्मकाण्ड निरर्थक हैं। आत्म-दर्शन के, ब्रह्म प्राप्ति के, दैवी वरदान के लिये जिस अन्तः प्रेरणा की आवश्यकता है, उसी की परमात्मा से प्रार्थना की याचना की गई है। प्रचोदयात् शब्द इसी प्रेरणा का बोधक है।

सांसारिक रूप से देखा जाए तो संसार में दो ही वस्तुएं हैं जिसके आसपास दुनिया घूमती है, दो ही वस्तुएं हैं जिसके लिए मानव याचक बन जाता है, एक है पैसा, दूसरा प्रेम।

सबसे अधिक प्रचलित है पैसा (रोटी, कपड़ा, मकान, पद, प्रतिष्ठा) और सबसे अधिक प्रचलन में है प्रेम (भावनात्मक संबंध)।

जिस दिन हम इस प्रचलित और प्रचलन को प्रचोदयात से जोड़ना सीख जाएंगे, जिस दिन यह सीख जाएंगे कि दीनता के साथ भिक्षा माँगना भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाता फिर चाहे वह भिक्षा ईश्वर से ही क्यों न माँगी गई हो। जिस दिन जान जाएंगे कि आत्मा शक्तियों का भण्डार है। उसमें वे सब तत्व मौजूद हैं जिसकी सहायता से वह मनचाही स्थितियाँ (प्रेम) तथा वस्तुएँ (पैसा) प्राप्त कर सके। उसे किसी वस्तु या स्थिति की याचना करने की आवश्यकता नहीं, केवल ऐसी प्रेरणा की आवश्यकता है जिससे बुद्धि शुद्ध हो जाय, कुबुद्धि का निवारण होकर उसका स्थान सुबुद्धि ग्रहण कर ले। जब सुबुद्धि आ जाएगी तो संसार का कोई भी ऐश्वर्य उसके लिये दुर्लभ न होगा।

ॐ भूर्भुव स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।

शाब्दिक अर्थ…
ॐ = सर्वरक्षक परमात्मा
भू: = प्राणों से प्यारा
भुव: = दुख विनाशक
स्व: = सुखस्वरूप है
तत् = उस
सवितु: = उत्पादक, प्रकाशक, प्रेरक
वरेण्य = वरने योग्य
भर्ग: = शुद्ध विज्ञान स्वरूप का
देवस्य = देव के
धीमहि = हम ध्यान करें
धियो = बुद्धियों को
य: = जो
न: = हमारी
प्रचोदयात = शुभ कार्यों में प्रेरित करें

उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

– माँ जीवन शैफाली

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