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तब आनंद से जीते थे जब खाने के काम आती थीं ब्लैकबेरी और एप्पल जैसी चीज़े

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नब्बे के दशक में हम आज की तरह सेलेक्टिव नहीं हुआ करते थे… मतलब कि चीजों को खुद के लिए चुनने के इतने विकल्प नहीं थे.

याद कीजिये उन दिनों कितनी बार हम सबके साथ ऐसा होता था कि आप घर से सुबह स्कूल के लिए निकले. स्कूल पहुंचे तो पता चला कि आज तो फलाने नेता जी का आकस्मिक देहांत हो जाने के कारण कारण स्कूल बंद कर दिया गया है…

अब जनाब मोबाइल तो था नहीं कि पहले ही सूचना मिल जाती…. लेकिन इस एकाएक मिलने वाली छुट्टी का अपना अलग आनन्द होता था.. और हम उन दिवंगत नेता जी की आत्मा को दिल से धन्यवाद देते जिनकी वजह से आज स्कूल बंद हुआ…

हममें से जिन्होंने भी नब्बे का वो दौर देखा है या फिर जिया है… असल जीवन उन्होंने ने ही जिया है क्योंकि ये वो समय था जिसे ना तो आप पिछड़ा कह सकते हैं, ना एडवांस्ड….

हम लोगों की लाइफ बड़े सिस्टम से चलती थी… उन दिनों स्कूलों में आज की तरह तामझाम नहीं होते थे…. पढ़ाई के समय सिर्फ पढ़ाई और सिर्फ एक दिन यानी शनिवार को हाफ डे मनाया जाता था.

इस दिन आधे दिन पढ़ाई होती थी और फिर आपको किसी भी प्रकार का मनोरंजन करने की छूट थी…. यानी आप अन्ताक्षरी से लेकर नाटक, गायन, डिबेट किसी भी कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं.

15 अगस्त या 26 जनवरी के दिन हम सभी छात्र खुद स्कूल की साफ़ सफाई करते… इसे श्रम दान कहा जाता था और हम सभी बच्चे, ये काम मन लगा कर करते थे.

कल्पना कीजिये कि अगर आज किसी कॉन्वेंट स्कूल में बच्चों से स्कूल की साफ़ सफाई करवा दी जाय तो भूचाल आ जाएगा… और मीडिया वाले अपना कैमरा लेकर वहां पहुच जाएंगे और इसे बाल मजदूरी या फिर बच्चों का शोषण की हेडिंग से दिखाया जाएगा.

स्कूल से घर आने पर भी ऐसा नहीं था कि हम टीवी से चिपक जाया करते थे… क्योंकि उन दिनों आज की तरह सैकड़ों चैनल नहीं हुआ करते थे…

औरों का तो पता नहीं साहब, पर हमारे घर केवल नेशनल ही आता था… सोमवार को रात में ‘ॐ नम: शिवाय’ और ‘अलिफ़ लैला’ और मंगलवार की रात ‘जय हनुमान’ और हर रविवार को ‘श्री कृष्णा’ जैसे सीरियल ही हमारे पोकेमॉन और डोरेमॉन थे.

भारत सरकार का चैनल था, सो कार्टून्स आने का दिन भी निर्धारित था. शुक्रवार को शाम 4 बजे डक टेल्स या फिर telespin…. फिल्में भी केवल 3 दिन आती थीं, वो भी रात में.

फिर भी ज़िंदगी मज़े में कटती थी… कोई टेंशन नहीं… उन दिनों छुट्टियों का मतलब नाना-नानी का घर या फिर अपना गाँव होता था…. मनाली और नैनीताल नहीं… और बाकायदा 2 महीने हम अपना जीवन यानी जिसे जीना कहते हैं, उसे खुल कर जीते.

97 में जब ‘शक्तिमान’ शुरू हुआ था तब तो शनिवार के दिन हम स्कूल ही नहीं जाते…. बाद में दूरदर्शन वालों को ये सीरियल सन्डे के दिन शुरू करना पड़ा.

आज तो शहर में तमाम शॉपिंग मॉल खुल गए हैं. आपके पास हज़ार विकल्प हैं कपड़े खरीदने के…. ये उलझन और कन्फ्यूज़न भी पैदा करते हैं….

लेकिन उन दिनों हमारी खरीददारी की दुकान निर्धारित रहती थी …और हम मम्मी पापा के साथ जा कर साथ में शॉपिंग करते… जो आज के शॉपिंग करने की प्रक्रिया से ज्यादा आनन्द देती थी…

आज हर चीज़ दूषित हो चुकी है…. सबमें विकार आ गया है… अब स्कूलों में वो अच्छी और व्यवहारिक शिक्षा देने वाली गुणवत्ता नहीं रही….

आज कॉन्वेंट स्कूलों में 300 रुपये की मॉरल साइंस की किताब हमें जबरन खरीद कर अपने बच्चों को देनी पड़ती है जिसमें बच्चों को ये सिखाया जाता है कि हमें अपने माँ बाप का आदर करना चाहिए… क्या मज़ाक है?

अब तो कई स्कूलों में मोबाइल लाने की भी छूट दे दी गयी है…. ये भी बचपन को मारने की एक शुरुआती प्रक्रिया है….

हमारे स्कूली दिनों में स्कूल में दाखिले के लिए सिर्फ हमारा टेस्ट होता था… लेकिन अब तो कई नामी स्कूलों में बच्चों के साथ साथ माँ बाप का भी टेस्ट होता है और अगर माँ बाप उस टेस्ट में फेल हो गए तो एडमिशन भी नहीं मिलता.

इनफार्मेशन और टेक्नोलॉजी ने हमें एडवांस्ड नहीं बनाया, बल्कि हम खुद को एडवांस्ड समझने लगे हैं….

हम तब भी आराम और आनन्द से जीते थे जब ब्लैकबेरी और एप्पल जैसी चीज़े खाने के काम आती थी…. लेकिन अब ये चीजें आपके लिविंग स्टैण्डर्ड का लेवल बताती हैं…

ऐ 21वीं शताब्दी के कूल डूड कहे जाने वाले, टीन एजर्स कहे जाने वाले मासूमों… तुम सच में बड़े दुर्भाग्यशाली हो कि तुमने 21वीं शताब्दी में जन्म लिया और अपना बचपन और वो खुशनुमा 90 के दशक का दौर नहीं देख पाए… ज़िंदगी नहीं जी पाए.

लेकिन हम तो भाग्यशाली है… हम ने तो जी ली अपनी ज़िंदगी… और जी लिए वो कभी ना भूलने वाले पल…

– विराट विक्रम सिंह

प्राथमिकता खुद तय करें : संस्कारी बच्चा या स्मार्टफोन वाला स्मार्ट बच्चा

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