MITTI COOL : घर में लाएं मिट्टी के फ्रिज और बीमारियों को करें विदा

पुराने ज़माने से हम मृदा अर्थात मिट्टी के सुराही, घड़ा, कुल्हड़, आदि देखते आ रहे हैं। अब तो बहुत अधिक प्रचलन में शायद नहीं है जब से आधुनिक फ्रिज वगैरह का आविष्कार हुआ है, और यदि प्रचलन में है भी तो या तो गाँवों में या फिर शहरों में फैशन के तौर पर। इसके अपने लाभ क्या हैं, अमूमन गौर नहीं किया जाता है।

अब आजकल गर्मी के मौसम में कुछ बातें स्वतः ही ध्यान में आ जाती हैं जो शायद सबसे पहले गृहणियों के ज़हन में आता होगा। प्रतिदिन बनने वाले खाद्य सामग्री तथा अन्य चीज़ें जैसे विशेषकर दूध, हरी सब्ज़ियां वगैरह के सही से रखने की चिंता सताने लगती है। और उस चिंता का सबसे आसान उपाय नज़र आता है – फ्रिज।

किन्तु उसमें भी एक छोटी सी समस्या जो अपने आप ही साथ चलती ही रहती है – और वह समस्या है अधिक बिजली खर्च होने की समस्या। क्यूंकि फ्रिज का सामान्य-सा नियम है – आप फ्रिज को सामान से जितना अधिक लादेंगे यह उपकरण उतनी ही बिजली खिंचेगा, कई बार अपने हाथ भी खड़े कर देता है और ख़राब हो जाता है। साथ ही फ्रिज में रखी वस्तुओं से कई तरह की बीमारियों ने मनुष्य के शरीर को अपना घर बना लिया है।

यह तो बात हुई शहरों की, बड़े हों या छोटे। इस जटिल सी दिखने वाली समस्या का निदान समझने के लिए, थोड़ा और आगे पढ़ें।

अब चलिए, थोड़ा गाँव की ओर भी रुख करते हैं जहाँ पर बिजली से चलने वाले फ्रिज अभी भी शायद प्रचलित न हों (कुछ प्रतिशत में अवश्य होंगे)। क्योंकि उन्हें विद्युत् से चलने वाले फ्रिज के नुकसान पता है।

और, ऐसे ही में गुजरात के राजकोट के एक छोटे से गाँव मोरबी (जो मच्छु नदी के किनारे स्थित है), वहाँ के एक अति-साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले – मनसुखभाई प्रजापति का सफर तय होता है मिट्टी के बर्तनों से “मिट्टीकूल” तक के सफर का।

मृतिका पात्र (pottery) बनाना इनके परिवार का परंपरागत व्यवसाय हुआ करता था। किन्तु कारोबार में अधिक नुकसान होने पर उनके पिताजी ने यह व्यवसाय छोड़ दिया, और मनसुखभाई के उज्जवल भविष्य के लिए इनका दाखिला एक स्कूल में करा दिया। मनसुखभाई का स्कूल में मन ना लगा और दसवीं की परीक्षा में उत्तीर्ण न कर सके।

मनसुखभाई का यहाँ से, जीवनयापन हेतु कठिन संघर्ष शुरू हुआ। कुछ समय तक उन्होंने वांकानेर में चाय विक्रेता के रूप में भी काम किया और अपने अन्य परिवारजनों का तिरस्कार भी सहा क्यूंकि वे लोग खिलौना बनाते थे और अच्छी कमाई कर लेते थे, वहीं पर दूसरी ओर मनसुखभाई के काम का मज़ाक बनाते थे।

मनसुखभाई को अभी भी अपना परंपरागत व्यवसाय आकर्षित करता था। आख़िरकार वर्ष 1985 में उन्होंने पॉटरी फैक्ट्री में एक शिक्षार्थी (trainee) के रूप में काम ढूंढ ही लिया और यहाँ से उनके जीवन की पटरी भी कुम्हार के चाक की तरह ही चल पड़ी (संघर्ष रहा किन्तु कोई परिस्थिति इस चाक को रोक न सकी)।

कुछ कर गुज़रने की चाह में उन्होंने कुछ लीक से हटकर सोचा। और 1988 में एक स्थानीय देनदार से 30,000 रूपए उधार लेकर एक छोटा सा व्यवसाय शुरू किया – मिट्टी के तवा / तवड़ी का। उनकी यह नवीन सोच इतनी अधिक सफल रही कि कुछेक दिनों में ही उनके बनाए सारे तवे बिक गए। उनकी फैक्ट्री में एक मशीन लगी थी जिससे 700 तवा प्रतिदिन के दर से उत्पादन होता था। इस मशीन की प्रेरणा उन्हें एक टाइल्स फैक्ट्री के हैंड प्रेस मशीन से मिली जिसके उपयोग से एक ही दिन में कई गुना अधिक उत्पादन करना संभव था जबकि तवों को अगर हाथों द्वारा कुम्हार के चाक पर बनाया जाता तो अधिकतम 100 तवों का निर्माण ही संभव था। अब तो समय और आधुनिकता के साथ इन तवों का नॉन – स्टिक कोटेड मॉडल (तीन साइजों में) भी उपलब्ध है।

सिलसिला चलता रहा और वर्ष 1990 में मनसुखभाई ने अपने कारखाने का रजिट्रेशन करा लिया और कंपनी का नाम दिया “मनसुखभाई राघवभाई प्रजापति”।

इसके बाद भी मनसुखभाई रुके नहीं और इस सफल प्रयोग के बाद 1995 में टेराकोटा के वॉटर फ़िल्टर जिसमें चीनी-मिट्टी के कैंडल लगे हुए होते हैं, भी बनाने लगे। यह विचार और इसकी क्रियान्वयन भी बेहद सफल रही। इसने मार्केट में इतनी जल्दी प्रसिद्धि पाई कि मनसुखभाई इसे पेटेंट भी कराए और यहीं से जन्म हुआ “मिट्टीकूल” (MittiCool) के अद्भुत सफर का।

फिर वर्ष 2001 में गुजरात में एक भयंकर आपदा आई – यह प्रलयकारी भूकंप था। इस विनाशकारी भूकंप ने बहुत कुछ तहस नहस और चहुँ ओर तबाही भी मचाई। इसी में मनसुखभाई के कारोबार का काफी नुकसान भी हुआ, “मिट्टी, मिट्टी में मिल गया”। किन्तु अपना कारोबार का पुनर्निर्माण करने के साथ ही वह स्वयं भी राहत कार्यकर्त्ता के रूप में काम करते रहे।

इसी दौरान उन्हें अहसास हुआ खासकर रसोई में महिलाओं को क्या क्या परेशानियों का सामना करना पड़ता था। सब कुछ संवारने का काम चल ही रहा था कि उन्होंने ने एक दिन स्थानीय अख़बार में देखा कि किसी पत्रकार ने उनके ही बनाए मिट्टी के वॉटर फ़िल्टर का चित्र डालते हुए नीचे लिखा था – ‘broken fridge of poor’ (गरीब का फ्रिज टूट गया)। किन्तु यह पढ़कर भी मनसुखभाई मनोबल टूटा नहीं और इस दौरान इनका संपर्क गुजरात ग्रासरूट इनोवेशन ऑग्मेंटेशन नेटवर्क (GIAN), अहमदाबाद, से हुआ। और यहीं से जन्म हुआ “मिट्टीकूल फ्रिज” के खास उत्पाद का।

मिट्टी के वॉटर फ़िल्टर को ही और भी बेहतरीन बनाते हुए यह आइडिया आया कि क्यों न इसे फ्रिज का आकार दिया जाए। इसके लिए मनसुखभाई ने विभिन्न वैज्ञानिकों से सलाह ली (डिज़ाइन, खास प्रकार के मिट्टी के उपयोग, आदि के लिए)।

वर्ष 2005 में “मिट्टीकूल” फ्रिज तैयार हुआ। इस प्रोडक्ट को काफी सराहा गया, लोगों ने खूब पसंद किया। यह पहला ऐसा फ्रिज था जो बिना “बिजली” के काम करता था और दाम ऐसा रखा गया था जो साधारण से अति-साधारण परिवार भी इसे ले सकता था।

23 किलोग्राम (kg) का यह फ्रिज जो 20 लीटर पानी, 5 kg फल/सब्ज़ी और 5 लीटर दूध रख सकता है, उसकी कुछ और खास बातें इस प्रकार से हैं:

  • सस्ता और पर्यावरण हितैषी उत्पाद है
  • इसे काम करने के लिए बिजली नहीं चाहिए
  • यह पानी, फल, सब्ज़ियां, यहाँ तक की दूध भी रक्षित (preserve) कर सकता है एक तयशुदा टाइम के लिए
  • फल / सब्ज़ी की गुणवत्ता बिन ख़राब किये 2-3 दिन तक रख सकता है
  • सस्ती होने की वजह से, गाँव का अति-साधारण परिवार भी इसे ले सकता है
  • फ्रिज का तापमान – बाहर के तापमान से 5 से 8 °C कम रहता है

मनसुखभाई के यह मृदा से बने उत्पाद इतने अधिकाधिक में सफल रहे कि वर्ष 2008 में जब सात्विक ट्रेडिभान फूड फेस्टिवल में अपने सभी उत्पाद – तवे, हांडी, गिलास, इत्यादि लेकर पहुंचे तो ग्राहकों ने प्रेशर कुकर की भी मांग की। फिर अगले वर्ष तक इसी आयोजन में प्रेशर कुकर भी लेकर पहुँच गए थे हमारे अनोखे मनसुखभाई।

मिट्टी का फ्रिज बनाने की बात भारत सरकार तक भी पहुंची और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने उनके हुनर को सम्मानित भी किया। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी उनकी तारीफ करते हुए उन्हें ग्रामीण भारत का सच्चा वैज्ञानिक कहा था।

इसके अलावा इन्हें और कई और जगहों से भी पुरस्कृत किया गया है:

  • राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान – भारत द्वारा Fifth National Competition for Grassroots Innovations and Traditional Knowledge in 2009
  • Selected by FORBES in 2010 in their list of most powerful seven rural Indian entrepreneurs whose “invention were changing lives” of the people across the country

आज वह सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में अपने उत्पादों को बेच रहे हैं। अभी तक उन्हें अन्य कई अवार्ड, कई जगहों से मान्यता, आदि प्राप्त हो चुके हैं। मनसुखभाई को अब ISO Certification भी प्राप्त है और प्रोडक्ट्स को फ़ूड ग्रेड क्वालिटी कोटिंग भी।

कई उतार-चढ़ाव के साथ उनके इस 30 वर्षों के कारोबार के सफल जीवन-यात्रा को साझा करने के लिए मनसुखभाई को देश-विदेश कई जगहों पर आमंत्रित किया जाता है। इन्हें डिस्कवरी चैनल ने कवर किया है कुछ वर्ष पूर्व।

आज भी उनका उत्साह उतना ही अधिक है और अब वह मिट्टीकूल मकान भी बनाना चाह रहे हैं। इस कार्य में वह राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान की भी मदद लेना चाह रहे हैं।

उनकी यह यात्रा 1988 गुजरात के एक छोटे से गाँव में शुरू हुई थी जिसने आज उनके मेहनत / लगन / निरंतर जूझने की जिजीविषा से पूरे विश्व में विस्तार पा लिया है और भारत का नाम रौशन कर रहा है।

आइए, हम सब भी शहर में रहते हुए अपनी मिट्टी से जुड़ें और बेहतर स्वास्थ्य से उत्तम समाज का निर्माण करते चलें।

वन्दे मातरम !!!

  • मीनाक्षी करण
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