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आख़िरी बार ईश्वर से कब मिले हो?

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-“भगवान को मानते हैं आप?”

-“बिल्कुल मानता हूँ।”

-“तो रोज मंदिर क्यों नहीं जाते?”

-“मेरे भगवान वहाँ नहीं हैं।”

-“अच्छा फिर आप मुस्लिम हैं। आपके भगवान जरूर मस्जिद में रहते होंगे।”

-“नहीं। न मैं मुस्लिम हूँ और न मेरे भगवान मस्जिद में ही रहते हैं।”

-“फिर पक्का आप क्रिश्चन हैं। आपके भगवान गिरिजाघर में रहते होंगे।”

-“नहीं। मैं क्रिश्चन भी नहीं हूँ। मेरे भगवान गिरिजाघर में भी नहीं रहते।”

-“आप के भगवान फिर कहाँ रहते हैं। आप का नाम तो हिन्दू ही लगता है। सूर्यवंशी तो भगवान राम भी थे न।”

-“हाँ। मैं हिंदू ही हूँ और भगवान राम मेरे पूर्वज ही थे।”

-“फिर आपतो रामजी को मानते हैं ना?”

-“बिल्कुल मानता हूँ। अपने बाप दादा को कौन नहीं मानता!”

-“तो वे तो मंदिर में ही रहते हैं ना। जैसे बाकी भगवान रहते हैं।”

-“मैंने कब कहा कि भगवान मंदिर में नहीं रहते। मैंने तो यह कहा कि मेरे वाले भगवान सिर्फ मंदिर में नहीं रहते।”

-“तो आपके भगवान कहाँ रहते हैं फिर।”

-“उनका घर नहीं पता। लेकिन कई बार घूमते मिले हैं मुझे।”

-“कहाँ?”

-“बहुत जगह।”

-“कैसे दिखते हैं?”

-“बिल्कुल हमारी तुम्हारी तरह।”

-“वे धोती पहनते हैं ना? और नंगे बदन? हाथ में धनुष? पीठ पर तरकश?”

-“अरे रे। बस करो। सारा का सारा वर्णन आज ही कर डालोगे? सुनो। बताता हूँ कि मेरे भगवान को मैं कैसे पहचानता हूँ।”

-“बताइये?”

-“पहले यह समझो कि जो फोटो या मूर्ति तुमने मंदिर में देखी है वह तो हजारों साल पहले जो उनको देखा गया था, उस आधार पर है। अब हर हमेशा युद्ध पर तो जाएंगे नहीं जो तीर धनुष हाथ में लिए रहेंगे। आराम से भी तो बैठते होंगे कभी। रही बात धोती और नंगे बदन की तो वो सब त्रेता द्वापर की बातें हैं। जब सब धोती पहनते थे, वे भी पहनते थे। अब सब जो पहनते हैं, वही वे भी पहनते हैं। हमारे बीच हमारे जैसे घूमते हैं।”

-“फिर तो हमारे सामने से गुजर जाएंगे, हम पहचान नहीं पाएंगे।”

-“हाँ। यही तो वे चाहते हैं कि कोई उन्हें पहचान न पाए।”

-“फिर आप उनको कैसे पहचानते हैं?”

-“उनके कामों से।”

-“कैसे?”

-“अच्छा! यह बताओ कि भगवान से तुम क्या चाहते हो?”

-“कोई मुसीबत आये तो मदद करें।”

-“बस ऐसे ही मैं पहचानता हूँ। जब किसी मुसीबत में कोई मदद करता है तो समझ जाता हूँ कि वह भगवान है।”

-“जैसे?”

-“जैसे कि एक बार मैं चलते ट्रैन से उतर रहा था और पैर फिसल गया। एक आदमी ने मेरा हाथ पकड़ कर वापस ट्रैन में खींच लिया। मेरे लिए तो वही भगवान था। फिर उसके बाद वह मुझे ट्रैन में दिखा भी नहीं।”

-“और कोई बताइये।”

-“बहुत सी घटनाएँ हैं। कभी बिल्कुल अनजान सड़क पर किसी ने लिफ्ट दे दी। कभी किसी ने टिकट के कम पड़ रहे तीन रुपये दे दिए। कभी कोई अपनी सीट पर बिठा कर ले गया। किसी ने सड़क पर ट्रक के आगे से खींच लिया। किसी ने साँप पर पैर रखने से रोक दिया।”

-“आपने आखिरी बार भगवान को कब देखा था।”

-“इस बार घर जाते हुए ट्रैन में।”

-“कैसे दिख रहे थे?”

-“गँवार दिख रहे थे।”

-“आपने उन्हें कैसे पहचाना?”

-“मुझे और मेरे साथ वाले पैसेंजर को बहुत भूख लगी थी और खाने के लिए कुछ नहीं था। उन्होंने घर की बनी हुई दालपूरी दी। फिर किसी से बात करते हुए मुझे सुनाकर कहा उन्होंने कि, जिसकी निंदा है वह जिंदा है। मंत्र फूँक कर चले गए।”

-“….”

-“क्या सोच रहे हो?”

-“आप मंदिर कभी नहीं जाते क्या?”

-“कभी कभी जाता हूँ।”

-“क्या करने? आपको तो भगवान मिलते ही रहते हैं न?”

-“जब मिलते हैं तो पहचान नहीं पाता कि भगवान हैं। इसलिए उनकी मूर्ति के सामने जाकर उन्हें धन्यवाद कह आता हूँ। उनकी मूर्ति देखने से एक रूप रहता है जिसको याद कर सकूँ।”

-“अगर मैं किसी की मदद करूँ तो लोग मुझे भी भगवान मानेंगे?”

-“यही तो है, शिवोऽहम्।”

– अभिषेक सूर्यवंशी

मानो या ना मानो : यात्रा एक तांत्रिक मंदिर की

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