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थोड़ा सा रूमानी हो जाए : #NOTYOU नाना, ME TOO

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कभी किसी ने आपको I love you कहा है?… कहा ही होगा… जवाब में आपने क्या कहा था? Me Too…

बस सच इतना ही है… ये इसी सुन्दर प्राकृतिक नैसर्गिक प्रेम के स्वीकार Me Too का घृणित रूप है आधुनिक बालाओं का Me Too…

अब एक बात और बताइये… जब भी आप सजती संवरती थी, वासकसज्जा सी खिड़की से या बालकनी में आकर कपड़े सुखाने के बहाने उसकी खिड़की की तरफ नज़र उठाकर देखी है? … देखी ही होगी… क्यों? होता है ना एक मीठा सा आकर्षण देह का भी कि वो आपको सजा संवरा बस एक बार देख ले… छूना तो बहुत दूर की बात है…

बस उसी सामान्य प्राकृतिक आकर्षण का विकृत रूप है आधुनिकता के बहाने यह बदन के कपड़ों से वक्षों का लुढ़काना, पुरुष की दृष्टि को अपनी ओर आकर्षित करने का भौंडा प्रयास, और आकर्षित हो जाने पर शर्माने का ज़माना तो गया तो #MeToo हो जाने का हल्ला मचाना…

पुरुष और स्त्री के बीच सहज आकर्षण प्रकृति निर्मित है, यदि यह नहीं होगा तो पृथ्वी से जीवन नष्ट हो जाएगा… पुरुष ही क्यों, क्या स्त्री आकर्षित नहीं होती पुरुष की तरफ? क्यों जॉन अब्राहम और मिलिंद सोमन जैसे मॉडल कपड़े उतारकर अपना बलिष्ठ शरीर दिखाते फिरते हैं…

याद कीजिये अलीशा चिनॉय का मेड इन इंडिया गाने में मिलिंद का अर्धनग्न अवस्था में एक जादुई बक्से से निकलना, या ऋतिक रोशन की जोधा अकबर में अकबर के अर्धनग्न अवस्था में युद्ध की तैयारी करते हुए बलिष्ठ बुजाओं और खुली छाती पर कैमरा फोकस करना और जोधा बनी ऐश्वर्या का आकर्षित होना…

आज वही ऐश्वर्या Me Too के बहाने सलमान पर तंज कस रही है… उसे तो अपनी ही फिल्म “हम दिल दे चुके सनम” को याद करना चाहिए जिसमें एक सीन है कि घर की लड़कियां लड़कों की हर बात की नक़ल करने का खेल कर रही होती है और इस बीच सलमान आते हैं और अपनी टी शर्ट उतार देते हैं… और सारी लड़कियां शरमाकर भाग जाती है…

ऐश्वर्या, तुम्हारा एक सम्मानीय परिवार की बहू होने के बाद भी ऐसे ट्वीट करना तुम्हारा स्तर बताता है, तुम्हारी सारी कमज़ोरियों के बावजूद वह परिवार तुम्हें इतना सम्मान दे रहा है, उसकी मर्यादा संभालने के बजाय, तुम उस फिल्म के सीन की तर्ज़ पर शर्माने के बजाय उसकी नक़ल उतारते हुए स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर सिर्फ अपना टी शर्ट नहीं चरित्र उतार रही हो. क्योंकि यह तो तुम्हें याद रहा कि उस “Human” ने तुम्हें पीटा, यह याद नहीं रहा कि क्यों हाथापाई की नौबत आई थी, याद न हो तो विवेक ओबेरॉय से पूछ लेते हैं. लेकिन हमें तुमसे अधिक बच्चन परवार की इज्ज़त प्यारी है जानेमन, इसलिए यह याद मत दिलाओ की सफलता प्राप्त करने के लिए तुमने किस किस को सीढ़ी बनाया.

यही काम तनु श्री दत्ता कर रही है… अपने भरेपूरे दिनों में लगभग पूरी नग्न देह के साथ फिल्मों में लाखों दर्शकों का अपने वक्षों और पृष्ठ भागों का उभार दिखाने में कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन किसी नृत्य मुद्रा में नाना का एक स्पर्श तुम्हें उद्वेलित कर गया… सच तो दो व्यक्ति के बीच ही रहता है, क्या पता तुमने नाना को उकसाया हो और अपने मिजाज़ के अनुरूप उन्होंने अपना क्रोध ज़ाहिर किया हो कि भई जिस उद्देश्य से उकसा रही हो, वो यदि पूरा हो जाए तो कैसा लगेगा…

तनुश्री से बेहतर तो मुझे उस राखी सावंत का स्तर लगता है, जो सच को पूरी तरह से स्वीकार करती है… उसकी अपनी पसंद है वह कैसे खुदको दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है लेकिन कम से कम जो वह है वही दिखलाती है, तनुश्री की तरह प्रसिद्धि पाने की लालसा में दोगला चरित्र नहीं अपनाती… वह आज भी वही है जो पहले दिन थी क्योंकि उसने बॉलीवुड को वह जैसा है वैसा स्वीकार किया है…

तनु श्री, तुमने यदि सीधे सीधे यह बात रखी होती तब भी एक बार तुमसे सहानुभूति होती लेकिन तुमने अध्यात्म का सहारा लेकर जो नाटक तैयार किया वह इतना घिनौना है कि जीसस भी शरमा रहे होंगे, जिनका विज़न देखने का दावा लेकर तुम दोबारा बॉलीवुड में उतरने का सपना लेकर आई हो..

आध्यात्मिक व्यक्ति का आभा मंडल कभी देखा है? देख भी न सकोगी इतना तेज़ होता है, वह इतना सतही नहीं होता, इतना उथला नहीं होता… एक आध्यात्मिक व्यक्ति एक नहीं ऐसे हज़ारों लोगों को सिर्फ इसलिए क्षमा कर सकता है क्योंकि वह माया और संसार का अर्थ जान लेता है, वह जान लेता है कि हर घटना के पीछे कोई न कोई ऐसा कारण होता है जो मनुष्य को उसकी आध्यात्मिक यात्रा में उन्नत करता है…

मेरे जीवन में भी ऐसे कई किस्से हैं, सड़क पर ही नहीं, घर की चार दीवारी के भी, लेकिन आज उन पुरुषों को अपनी बेटियों की सुरक्षा में खड़ा पाती हूँ तो सच में मैं ह्रदय से क्षमा कर देती हूँ, कि कोई बात नहीं, उफान के साथ नुकसान हुआ है तो परिस्थितियों ने उसकी क्षतिपूर्ति कर दी उनके घर में बेटियों को जन्म देकर, चूंकि वे खुद इन कड़वे अनुभवों से गुज़रे हैं तो वे अपनी बेटियों को अधिक सुरक्षा और सीख दे सकेंगे.

मुझे अध्यात्म के बारे में अधिक नहीं पता लेकिन जब एक स्त्री अध्यात्म की राह पर चल पड़ती है तो वह अक्का महादेवी, मायम्मा देवी और ललद्य की तरह हो जाती है कि उसे फिर देह से तुम्हारी तरह कपड़े नहीं उतारने पड़ते, उसके कपड़े स्वत: छूट जाते हैं … ठीक महावीर की तरह…

मुझे अध्यात्म के बारे में अधिक नहीं पता लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि जब स्त्री पर आध्यात्मिक प्रयोग होते हैं, तो वह बड़े बड़े गुनाहगारों को क्षमा कर देती हैं, चाहे वह गुनाहगार उसके अपने सगे संबंधी ही क्यों न हो… क्योंकि उसने देखा होता है पूर्व जन्म के कर्म को अपने सामने तांडव करते हुए और वह शक्ति स्वरूपा सी सारे संसार के पुरुषों की माँ हो जाती है, सबको जीवन देती है, तुम्हारी तरह दस बीस साल पुराने गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ती.

मुझे अध्यात्म के बारे में अधिक नहीं पता लेकिन इतना अवश्य जानती हूँ कि नाना पाटेकर एक फ़ौजी स्वभाव का इंसान है, अनुशासनहीनता उसे कतई पसंद नहीं आती, तो वह उतना ही क्रुद्ध और कठोर हो जाता है जैसे कोई फ़ौजी अफसर अपने सैनिकों की गलती देखकर होता है और उस पर हाथ उठाने से भी नहीं चूकता ताकि आगे से वह अधिक अनुशासन में रहे..

तुमको नाना ने छुआ या नहीं मैं नहीं जानती लेकिन छुआ भी होगा तो अपने नाम के अनुरूप ही नाना बनकर… ताकि तुम आगे से अनुशासन में रहो… जो कि हो न सका…

जीवन में अनुशासन हीनता जब आ जाती है तो स्त्री ऐसी ही विकृत हो जाती है… क्योंकि नियम हर जगह आवश्यक है… पृथ्वी कभी नहीं कहती कि सूर्य को तुम देवता मानकर पूजते हो तो मैं भी उसकी तरह आग उगलूंगी, वह तो फिर भी धैर्यपूर्वक अपनी धुरी पर घुमते हुए भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने के अपने धर्म से कभी विमुख नहीं होती… स्त्री को पृथ्वी की तरह धैर्यावान ऐसे ही नहीं कहा गया, तुमको अभी खुद की ही पहचान नहीं…

जिस देश में धरती को माता, भारत को माता, नदियों को माता और ब्रह्माण्ड संचालित रखने वाली शक्ति को माता स्वरूप पूजा जाता है, वहां तुम बराबरी की अंधी लड़ाई में अपना ही चरित्र भूलती जा रही हो…

अरे बराबरी करना है पुरुष की तो उस नज़र की करो, जो तुम्हें इसलिए देखता है क्योंकि वह सौन्दर्य का पूजक है,
बराबरी करना है पुरुष की तो उसकी उन बातों की करो जो तुम्हारी प्रशंसा में गीत बनकर गूंजती हैं तो तुम अपने पर ही इठला जाती हो…
बराबरी करना है तो अर्धनारीश्वर के उस आधे रूप की करो जो तुम्हारे बिना अधूरा है… और जीवन में घटित होने वाली हर घटना उस रूप के ढाँचे में ढलने की ही है…

लेकिन तुम चाहे जितने प्रयास कर लो तुम कभी पुरुष की बराबरी नहीं कर सकती क्योंकि वह आज भी तुम्हारे स्तनों से चिपका वह नन्हा शिशु है जो कभी उससे निकलते अमृत, उसके आकर्षण और उसके प्रेम से निकल ही नहीं पाया..

ध्यान अध्यात्म तो तुम क्या समझोगी कि स्त्री के स्तनों में ऊर्जा का वह प्रवाह है जब वह किसी पुरुष के प्रेम में होती है तो वह उस एक पुरुष के मार्फ़त सारे संसार के पुरुष को तृप्त करने की ताकत पैदा कर लेती है….

इसलिए उसे इतना भी न उघाड़ो कि किसी की नज़र लग जाए.. और उसका ऊर्जा क्षेत्र क्षीण हो जाए…

और नाना, तुम से तो कुछ कहना ही बेकार है, तुमको तो मैं तब से जानती हूँ जब मैंने बचपन में तुम्हारी फिल्म देखी थी… “थोड़ा सा रूमानी हो जाए” … वह बारिशकर मुझे आज भी याद आता है… प्रेम के अभाव में सूख चुकी डाली पर नेह का पानी बरसाकर तुमने फिल्म में अपना नाम “बारिशकर” सार्थक किया था…

‘नटसम्राट’ नाना, तुम जो हो वही रहना, हम तुम्हें तुम्हारी फिल्मों से अधिक तुम जो हो उसके कारण प्रेम करते हैं. दुनिया चाहे कितना ही तुम पर कीचड़ उछाले, कितना ही तुम्हें गिरा हुआ बताये, तुम्हारे प्रति हमारा प्रेम कभी कम न होगा… तुम बॉलीवुड ही नहीं, भारत की सनातन संस्कृति के पुरोधा हो, हमारा आदर्श हो, हर बहन तुम जैसा भाई, हर प्रेमिका तुम जैसा प्रेमी और और हर माँ तुम जैसा पुत्र पाए, मेरे दिल से तुम्हारे लिए बस यही प्रार्थना निकलती है…

अपने नाम के आगे पीछे सिर्फ “श्री” लगा लेने से शुभता नहीं आती, स्त्री जब अपने स्त्री होने के गौरव और धर्म को बनाये रखती है तब वह लक्ष्मी हो जाती है, अन्नपूर्णा हो जाती है, माँ दुर्गा और काली हो जाती है…

और फिर क्या आपने कभी दिन और रात को आपस में अपने अपने अस्तित्व के लिए लड़ते देखा है? दिन जब पूरी तरह थक कर सो जाता है तो रात जागती रहती है… और रातभर जागकर दिन को सुलाए रखने के बाद सुबह की पहली किरण के साथ दिन की आगोश में छुप जाती है….

दिन के पास सूरज का गर्म उजाला है तो रात के पास ठंडी सी पुरवाई, जहां न जाने कितने रहस्य अँधेरे में मुंह छुपाये पड़े रहते हैं, जिसको खोजते हुए दिन चला आता है…

औरत और मर्द का रिश्ता भी बिलकुल वैसा ही है एक के बिना दूजे का कोई अस्तित्व नहीं… लेकिन इंसान और प्रकृति में यही तो अंतर है …. दोनों के पास अपनी अपनी भाषा है अपने अस्तित्व को परिभाषित करने के लिए…

हमने एक भाषा तो सीख ली है जिससे हम एक दूसरे पर आक्षेप लगाते हुए अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहते हैं… जिस दिन हम प्रकृति की भाषा सीख जाएंगे उस दिन नारीवादी सवाल और बवाल नहीं खड़े करने होंगे, ना महिलाओं को, ना उसके जवाब में मर्दों को…

जिस दिन हम प्रकृति की भाषा सीख जाएंगे उस दिन स्त्री कहेगी तुम दिन की तरह मुझे जीवनदायी उजाला देना और मैं तुम्हारे सामने रात की तरह सारे रहस्य खोल कर रख दूंगी….

इसलिए नाना सिर्फ तुम ही नहीं, मैं भी प्रकृति के इस नैसर्गिक आकर्षण का सम्मान करती हूँ … मैं स्वीकार करती हूँ कि बचपन से लेकर आज तक चाहे कितनी ही बार लोगों द्वारा अनअपेक्षित घृणित स्पर्श पाए हो, लेकिन जब कोई प्रेम से स्पर्श करता है तो वह स्पर्श आत्मा को कई जन्मों तक याद रहता है, और ऐसे स्पर्श की कई कहानियाँ मेरे पास सुरक्षित है, जिसके आगे ये घृणित स्पर्श इतने गौण हैं कि उनका ज़िक्र भी करना उन प्रेम भरे स्पर्श का अपमान होगा…

हम आज से आपके लिए यही हैश टैग चलाएंगे नाना #NOTYOU नाना
और METOO उसी सन्दर्भ में कहेंगे Me Too love you

क्योंकि ये समाज कितना ही Me Too Me Too कहता रहे हम जानते हैं, तुम वह नहीं हो जो ये लोग प्रस्तुत कर रहे हैं… #NOTYOU

– माँ जीवन शैफाली

पुनश्च : और यह अद्भुत संयोग है कि नाना पर यह वाहियात इल्ज़ाम लगने से पहले ही मैंने उन्हें अपनी नायिका श्रृंखला में कुछ दिनों पहले मेरी कहानी का सूत्रधार बना कर प्रस्तुत कर दिया था… अस्तित्व की योजना पर हमेशा अचंभित होती हूँ… वह न जाने क्या क्या करवा जाता है… सूत्रदार इतना ज़ोरदार है तो सोचिये नायक नायिका कैसे होंगे… तो आप भी पढ़ते रहिये एक बार फिर मेरे उपन्यास नायिका के भाग जिनके लिंक नीचे दे रही हूँ..
और साथ दे रही हूँ अपनी दो कविताएं, जिसे हर औरत को अनुभव करना चाहिए….

जीवन के दो भाव : क्षमा और धन्यवाद

क्षमा
*****

औरत जब क्षमा मांगती है
तो फलों से भरी एक डाली झुक जाती है
उन झुके हुए तनों को ताने नहीं लगते फिर
आंगन में खेलते भूखे बच्चे
हाथ बढ़ाकर तोड़ लेते हैं फल
यहीं से मजबूत होना शुरू होती है संस्कारों की जड़ें
और फैलाती है अपना वंश

औरत का क्षमाशील होना बहुत सुना होगा,
क्षमा मांगती औरत के मुंह से कभी सुनना लोरी
जन्मों के जागे कर्म भी सो जाते हैं,
उनका हिसाब नहीं लेता कोई सूदखोर ईश्वर
क्षमा मांगती औरत के आँचल में आ जाता है ढेर सारा प्रेम
वो अकेली नहीं संभाल सकती इतना सारा प्रेम
इसलिए बांटती चलती है क्षमा में चुपड़ी प्रेम की रोटी

इस जन्म में क्षमा मांग ली है मैंने
अपने पिछले सारे जन्मों के कर्मों के लिए
इसलिए मेरे हिस्से में आया है चूल्हे का सुख
मेरा जीवन एक सांझा-चूल्हा है
यहाँ सभी को आने की अनुमति है
अपना सुख-दुख पकाकर
जिसको जैसे जो बनाना आता हो बना जाता है
मेरे आँगन में रोज़ लंगर लगता है
ज़मीन से जुड़े लोग ज़मीन पर बैठकर
तृप्त होकर जाते हैं

इसलिए तृप्त कोख से जब भी कोई शिशु जन्म लेता है
मेरी छाती में उतर आता है दूध

सारे तूफानों को झेलकर
जब भी कोई फूल खिलता है
मेरी माटी महक जाती है धरती की तरह

जब भी कोई कुमारी पड़ती है पहले प्रेम में
मैं उसका प्रेमी हो जाती हूँ

जब भी किसी राज कुंवर को हो जाता है प्रेम
मैं उसकी प्रेमिका सी हो जाती हूँ

उम्र की चालीसवीं दहलीज़ पर
जब भी किसी स्त्री को होता है आभास
कि वो फिर कर सकती है प्रेम
तो मेरी धरती का कोई बंजर टुकड़ा
श्राप से मुक्त हो जाता है

मेरी मुक्ति की यात्रा से जुड़ी है
कइयों की यात्रा
इसलिए जब भी कोई योगी
समाधिस्थ होता है
मैं निर्वाण को प्राप्त होती हूँ…

– जीवन

धन्यवाद

औरत जब धन्यवाद देती है तो
धन्य हो जाता है समय का वो हिस्सा
जो उसकी उम्र जितना लंबा है,

उस धन्यवाद काल में
जब भी कोई उसके नज़दीक आता है
वो धन्य हो जाता है

धन्यवाद मुद्रा में जीती किसी औरत
को कभी गाली नहीं लगती
किसी कुंठित व्यक्ति की कुंठा भी
उसके पास आकर तरल हो जाती है

धन्यवाद एक तापमान है
जो ठोस से ठोस द्रव्य को भी द्रव में बदल सकता है

मैंने उन सारे लोगों को धन्यवाद दे दिया है
जिन्होंने मुझे दुत्कारा
और उस अपमान और कुंठा को
मैंने कीमिया बनाकर
एक नए तत्व की खोज की

धन्यवाद वही तत्व है
जो ठोस को द्रव
और द्रव को वाष्प में बदलकर
चेतना को वाष्पीभूत कर देती है

यदि कभी अस्तित्व से
जादू बरसता दिखाई दे
तो समझना धन्यवाद देती हुई किसी स्त्री का
तुमसे गुज़रना हुआ है

जो सिखा रही है कि
जो गुज़र चुका उसे धन्यवाद दे दो
वो यदि तुमसे न गुज़रा होता
तो तुम वह न होते जो आज हो

इसलिए मैं धन्य होती हूँ
जब कोई मुझे किसी वाद की तरफ खींचता है
और मैं हर बार अपवाद की तरह
उसमें से खुद को बचा ले आती हूँ

आप सभी को जीवन का धन्यवाद

– माँ जीवन शैफाली

नायिका -3 : Introducing सूत्रधार

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2 thoughts on “थोड़ा सा रूमानी हो जाए : #NOTYOU नाना, ME TOO”

  1. Mohit says:

    अतभुद

  2. Mohit says:

    Soch se bhi paree

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