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Me Too : महत्वाकांक्षा की सिद्धि के लिए आरोप-प्रत्यारोप का खेल

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ऐसे विषयों पर लिखना आग से खेलने जैसा है, क्योंकि इन मुद्दों पर छान-बीन से पूर्व निष्कर्ष पर पहुँचने का अतिरिक्त उतावलापन गंभीर-से-गंभीर व्यक्तियों में भी देखने को मिलता है। बल्कि यों कहें कि स्त्री-पुरुष विवाद में स्त्रियों के पक्ष में खड़ा होना फैशन है, उदार और आधुनिक दिखने की तयशुदा गारंटी!

भारतीय चिंतन-पद्धत्ति में स्त्री-पुरुष जीवन रूपी धुरी के दो पहिए माने गए हैं। बुद्धि, भाव और क्रिया तीनों शक्तियों की आधारशिला स्त्री ही मानी गईं। व्यावहारिक अर्थों में भी घर-परिवार की केंद्रबिंदु स्त्रियाँ ही रही हैं। घर-परिवार के सभी प्रमुख मुद्दों पर उनकी राय सर्वोपरि होती है।

कम-से-कम भारत के परिप्रेक्ष्य में मेरा मानना यही है कि स्त्री-पुरुषों की स्थितियों का विभाजन यथार्थ पर आधारित न होकर काल्पनिक व कृत्रिम अधिक है। यह विभाजन या इस प्रकार के स्त्रीवादी आंदोलन पश्चिम-प्रेरित हैं। उनके यहाँ सचमुच उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक स्त्रियों को मतदान तक का अधिकार नहीं था।

हमारे यहाँ स्त्रियों पर बंदिशों के जो फ़ौरी मिसालें दिखती भी हैं, वे परिस्थिति जन्य एवं आपद्धर्म के रूप में प्रचलित हुईं। वे बंदिशें काल-विशेष की जरूरतों के रूप में प्रचलित हुईं और समय के साथ समाज द्वारा स्वतः ही ख़ारिज भी कर दी गईं, वे हमारे तर्कशुद्ध चिंतन का निष्कर्ष कभी नहीं मानी गईं।

हमारे यहाँ मनुष्य पाप की उपज नहीं माना गया। स्त्री-पुरुष संबंध हमारी संस्कृति में शैतान की प्रेरणा से नहीं पनपे, वे सहज मानवी क्रियाकलाप के रूप में विकसित हुए, हमारी चेतना के विकास-क्रम में प्रस्फुटित हुए, संततियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रगाढ़ हुए, एक मिली-जुली ज़िम्मेदारी के रूप में पोषित हुए। एक के बिना दूजे के अस्तित्व को हमने स्वीकार ही नहीं किया, काम-भावना को हमने चार मुख्य पुरुषार्थों में स्थान दिया।

इसलिए जितनी संपूर्णता से हमने स्त्री-पुरुष संबंधों पर विचार किया वैसा अन्यत्र किसी संस्कृति में देखने को नहीं मिलता। फिर भी गाहे-बेगाहे घटनाएँ-दुर्घटनाएँ, स्त्रियों के विरुद्ध यौन-हिंसा आदि देखने को मिलती हैं और ये घोर निंदनीय भी हैं। परंतु हर मुद्दे पर रीडक्सनिस्ट एप्रोच के साथ विश्लेषण करना, समाज को खंड-खंड कर चिंतन करना, हर मामले में वर्गों के संघर्ष की तमाम संभावनाएँ तलाश लेना वामी चिंतन की विशेषता रही हैं, भारतीय चिंतन की नहीं। हम चीजों को संपूर्णता में देखने के अभ्यस्त रहे हैं। और इसलिए स्त्रियों पर हो रहे हमले पर संपूर्ण पुरुष समाज को ही कटघरे में खड़ा कर देना सर्वथा अनुचित होगा।

पश्चिम के हर कूड़े-कचरे को हम गले लगाते रहे हैं। मी टू अभियान के साथ भी भारत में वही चिर-परिचित कहानी दुहराई गई। हमारी मीडिया से लेकर कथित आभिजात्य समाज इसे ले उड़ा। बिना उसके परिणामों की चिंता किए। इस अभियान ने परस्पर विश्वास को कमज़ोर किया है। स्त्री-पुरुष परस्पर सहज नहीं रह गए हैं। महत्वाकांक्षा की सिद्धि के लिए आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया है।

आगे बढ़ने के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। पुरुष अधिकारी महिलाओं को काम सौंपते हुए, निर्देश देते हुए, उनसे अकेले में बातचीत करते हुए डरने लगे हैं।बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मी टू की आड़ में कर्मचारियों की छँटनी की साज़िश रच रही हैं।इस आरोप के बाद स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना इतना कठिन हो जाता है कि तमाम नौजवानों को संघर्ष की बजाय आत्महत्या आसान विकल्प लगता है।

वे करें भी तो क्या करें, क्योंकि आरोप लगते ही कंपनियाँ, सहकर्मी, दोस्त, नाते-रिश्तेदार उन्हें दोषी जो मानने लगते हैं। वे उनसे उपेक्षापूर्ण और अमानवीय व्यवहार करने लगते हैं, हर निगाह उसे संशय से देख रही होती है, अपने पल में पराए हो उठते हैं, पूरे समाज की यह मानसिकता होती है कि इतना बड़ा आरोप कोई युवती/स्त्री यों ही तो नहीं लगा देगी।

जबकि आज ऐसी स्त्रियाँ हैं जो शरीर को ताक़त के रूप में इस्तेमाल करती हैं, आज ऐसी स्त्रियाँ हैं जो रूप के पाँसे फेंक सफलता की सीढियाँ चढ़ती हैं, आज ऐसी स्त्रियाँ हैं जो धीरता-गंभीरता-बुद्धिमत्ता-सहजता की बजाय रिझाती-लुभाती कृत्रिम अदाओं को प्रश्रय देती हैं। कौन कहता है कि बददिमागी केवल पुरुषों का शगल है, इतिहास उठाकर देख लें तमाम साजिशों-कलहों को अंजाम देने में स्त्रियों का दिमाग पुरुषों से कम शातिराना नहीं रहा, स्पर्द्धा की अंधी दौड़ या सुविधा की उत्कट पिपासा में वे पुरुषों से दो क़दम आगे ही होंगीं, पीछे नहीं।

इसलिए मेरा निवेदन है कि बहुत हुआ मी टू। कौआ कान लेकर उड़ा के शोर के बीच पहले कान का निरीक्षण-परीक्षण ज़रूरी है। अन्यथा तमाम स्वरूपराज (एक मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसीडेंट, जिसने अपनी ही जूनियर दो सहकर्मियों द्वारा सेक्सुअल हरैशमेंट का आरोप लगाए जाने के बाद विगत 19 दिसंबर को खुदकुशी कर ली) असमय ही काल-कवलित होते रहेंगे।

क्या यह अच्छा नहीं होगा कि ऐसे आरोपों के बाद आरोपी की चारित्रिक पृष्ठभूमि, उसका दैनिक व्यवहार, उसके मित्रों-सहकर्मियों-स्वजनों की उसके बारे में धारणा आदि का अध्ययन करना चाहिए, बल्कि आरोप लगाने वाली की नीयत और चारित्रिक पृष्ठभूमि पर भी दृष्टि डालनी चाहिए? न्याय की दृष्टि में स्त्री-पुरुष दोनों को समान होना चाहिए।

और हाँ, मी टू का अभियान स्त्रियों को अंततः कमज़ोर ही साबित करता है, सचमुच की साहसी स्त्रियाँ तो उधार रखती ही नहीं, तत्क्षण सूद समेत वापस करती हैं, चाहे सामने कोई बहुत बड़ा ‘तोप’ ही क्यों न हो!!

– प्रणय कुमार

थोड़ा सा रूमानी हो जाए : #NOTYOU नाना, ME TOO

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