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मानो या न मानो : मृत्यु पश्चात भी लक्ष्मण बन करता रहा बड़े भाई की रक्षा

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कहानी है ये उस लोक के चमत्कार की, कहने वाले उसको छठी इन्द्री हैं, कोई भ्रम पर जो जानते हैं, वो मानते हैं कि वो लोक है। मेरे जीवन में अनेक घटनाएं है उस दुनिया की। पर ये घटना घटी थी मेरे पिता के जीवन में।

मेरे दादा आर्थिक स्थिति में निम्न वर्ग में आते थे, उस ओर संयुक्त परिवार। फिर भी जैसे तैसे कर्जा करके उन्होंने अपने तीन पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र ( मेरे पिता ) को इंजीनियरिंग करने जोधपुर भेज दिया क्योंकि पिता उस समय पूरे अलवर जिले में प्रथम आये थे, तो अध्यापकों ने भी बहुत समझाया था दादा जी को… ” शास्त्री जी महावीर कुछ बन जायेगा तो घर को तार देगा” इसलिए कर्जा करके पिताजी को भेज दिया गया।

पिताजी के छोटे भाई जिनका नाम महेश था, वो तब दसवीं क्लास में थे पढ़ने में बहुत तेज थे वो भी। तो गांव के ही एक अमीर ठाकुर के बेटे से शर्त हो गयी उनकी ( महेश चाचाजी ) की कि वो ही प्रथम आएंगे। अब जिस दिन परीक्षा शुरू होनी थी उस से एक दिन पहले ठाकुर के बेटे ने उन्हें प्रसाद खाने को दिया, ब्राह्मण पुत्र होने के कारण महेश चाचा ने प्रसाद को इनकार नहीं किया और घर पहुँचते ही साँस उखड़ने लगी, ज़हर ने अपना असर दिखाया।

अंतिम शब्द जो महेश चाचा के मुँह से निकले … “मेरे भाई यहां होते तो मुझे बचा लेते” और दम निकल गया।

दादाजी ने चाचा का अंतिम संस्कार किया चूंकि अलवर से जोधपुर की दूरी बहुत थी और ना संचार के साधन थे ना आवागमन के इतने साधन। ना आर्थिक स्तिथि, तो मेरे पिता को जोधपुर में सूचित ही नहीं किया कि चाचा का प्राणान्त हो गया है। पापा को चार महीने बाद दादाजी जब मिलने गए तब सूचना दी गयी। परन्तु पापा को सपने में हर दूसरे दिन महेश चाचा दिखाई देते थे। पापा सोचते दोनों भाइयो में बहुत प्रेम था इसलिए दिखता है।

खैर इंजीनियरिंग पूरी हुई और पापा जब घर लौट कर आये उनका विवाह हुआ मेरी माँ से और कुछ समय बाद पापा बीमार पड़े। डॉक्टरों को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था तो हमारी दादी पंडितों के चक्कर लगाने शुरू हुई। सब जगह बूझा निकलवाने ( गेंहू देख कर परेशानी बताना) पर यही आता कि महेश चाचा का स्नेह पापा पर बहुत था तो वो सोने की पातड़ी ( प्रतीक चिन्ह) में गले मे बैठेंगे।

दादी ने जैसे ही वो किया पापा ठीक हो गए। अब पापा का नियम था हर अमावस को महेश चाचा के निमित्त अग्नि में भोग लगाना। और रोज जो भी कुछ खाते पीते पहले गले में पहने हुए उस प्रतीक को भोग लगाते।
उन्होंने कई बार आभास दिया अपने होने का…
सबसे बड़ी घटना जो घटी वो ये थी कि…

मेरे पिता ऑफिस के किसी काम से 5 लाख रुपये लेकर जयपुर से अजमेर जा रहे थे उस जमाने मे नब्वे के दशक में 5 लाख बहुत बड़ी रकम थी । एक बैग में वो रुपये थे पापा बस में चढ़े तो उनको ड्राईवर के पीछे की सीट मिली बैठने को । अचानक उनके कान में आवाज़ आयी… भाई ! यहां से उठ जा कहीं और बैठ।
स्वर पहचाना हुआ था सो आदेश का पालन किया और उठ गए, पीछे 2 सीट पीछे बैठे एक लड़के से कहा भाई आप मेरी जगह बैठ जाओ मैं यहां बैठ जाता हूँ। उसने मना कर दिया। इस तरह 3, 4 जगह बदलने के बाद एक आदमी ने कहा आप यहां बैठ जाइए मुझे तो बस थोड़ी दूर जाना है।

पापा वहां बैठ गए जयपुर से 50 km दूर जाते ही बस का एक्सीडेंट हुआ ट्रक से। जिन जिन जगह बैठने की सोची थी और पापा को जिन्होंने में मना कर दिया गया था उन सबकी मृत्यु हो गयी।

पापा के बस हाथ मे खरोंच आयी और जब पापा लौट कर आये तो हम सबको ये बताया। जहां ड्राइवर के पीछे की सीट पर सबसे पहले बैठने वाले थे उस आदमी के दोनों पैर कट के मृत्यु हुई।

और ऐसे समय भी लोग मदद की जगह सामान लूट रहे थे लेकिन पापा के बैग को किसी ने हाथ नहीं लगाया।।
किसकी थी वो आवाज़….
वो थी मेरे महेश चाचा की आवाज़…
जो अपने भाई के साथ हमेशा रहते थे।
आप क्या कहते हैं??

– शालिनी गौड़

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