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मानो या ना मानो : खजाने के रखवाले या मार्गदर्शक तीन बाबा

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ये हैं सुशील जी उर्फ पिल्लू और उनके सुपुत्र रोहित. ये दोनों घरों में पुताई का काम करते हैं, जब मेरे बच्चों ने दीवारों पर जी भर कर चित्रकारी कर ली तब दादाजी ने इन दोनों को बुलाया और पूरे घर भर की पुताई करवाई.

अब आप सोच रहे होंगे इन दोनों में ऐसी क्या ख़ास बात है जो मैं आपको इनसे मिलवा रही हूँ. इनकी यह फोटो मैंने तीन साढ़े तीन साल पहले खींची थी जब यह एक ऐसा किस्सा सुना रहे थे जब मेरे लिए यह सब बातें बहुत भयानक और असामान्य हुआ करती थीं और सुनते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे. उसके बाद तो मैंने ऐसे ऐसे किस्से आँखों से देखे हैं कि इनके साथ हुई घटना बहुत मामूली सी लगती है.

और सबसे बड़ी बात यह किस्सा भी मैंने उसी समय तीन साढ़े तीन साल पहले ही अपनी डायरी में लिख लिया था. उसके बाद इतने लेख लिखे लेकिन यह किस्सा कभी प्रकाशित नहीं कर पाई. कई बार ख्याल भी आया लेकिन जैसे ही ऐसा ख़याल आता तो कभी यह ध्यान नहीं आता इतनी सारी डायरी में से कौन सी डायरी में यह किस्सा लिखा है, और कभी डायरी मिल जाती तो यह फोटो नहीं मिलती.

ऐसा लग रहा था जैसे मानो या ना मानो श्रृंखला के लिए यह किस्सा अप्रकाशित रहा इतने सालों तक और जब इसे प्रकाशित करने का मौका आया तो दोनों चीज़ें स्वत: ही मेरे सामने प्रकट हो गयी.

ध्यान बाबा इन्हें बचपन से जानते हैं, और सुशील जी से मिलने से पहले मुझे इनके कई किस्से सुना चुके थे. इसलिए एक दिन इनको विशेष रूप से वो सारी घटनाएं मुझे सुनवाने के लिए बुलवाया गया.

सुशील जी ने किस्सा सुनाना शुरू किया –

[इसे भी पढ़ें- क्या मार्गदर्शन करती हैं आत्माएं?]

एक रात यह अपनी साइकिल पर सवार हो घर को लौट रहे थे तो रास्ते में लम्बी दाढ़ी वाले तीन बाबा मिले और एक हवेली नुमा घर के सामने इनको रोककर अन्दर हवेली में आने को कहा.

पहले तो सुशील इन तीन सफ़ेद वस्त्रधारी और घुटनों तक की लम्बी सफ़ेद दाढ़ी देखकर घबराए और उनको टालने के लिए कहा मेरी साइकिल मैं यूं ही बाहर नहीं छोड़ सकता मैं गरीब आदमी हूँ, पहले भी एक साइकिल खो चुका हूँ, ये भी चली गयी तो काम पर आने जाने में परेशानी होगी.

बाबाओं ने आश्वासन दिया कि तुम्हारी साइकिल को कुछ न होगा. पता नहीं सुशील का खुद का फैसला था या तीनों बाबाओं का सम्मोहन कि वह अपनी साइकिल वहीं बाहर छोड़ बाबाओं के पीछे हवेली में प्रवेश कर जाते हैं.

अन्दर प्रवेश करते ही सुशील की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं, जब वे देखते हैं कि हवेली में चारों तरफ सोना चांदी और हीरे जवाहरात बिखरे पड़े हैं.

बाबा लोग सुशील से कहते हैं – इनमें से जितना खज़ाना चाहिए ले लो… सुशील उलझन में पड़ जाते हैं कि यह कोई मायाजाल है या ईश्वर उसकी कोई परीक्षा ले रहे हैं. वो कभी खजाने की चमक को देखते कभी बाबाओं के चेहरे से उठती चमक को.

फिर देखा उस खजाने के चारों तरफ अपना फन उठाए बड़े बड़े सांप भी मंडरा रहे हैं… सुशील के कहने के अंदाज़ से यह बिलकुल नहीं लग रहा था कि वे कोई मनगढ़त किस्सा सुना रहे हैं, क्योंकि उन्होंने बताया आँखों के सामने यह नज़ारा देखकर उनकी पतलून गीली हो गयी और उन्होंने हाथ जोड़कर उन बाबाओं से कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आप मेरी साइकिल मुझे लौटा दीजिये ताकि मैं घर चला जाऊं.

बाबाओं ने कहा ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी और सुशील बताते हैं उन्हें साइकिल चलाकर घर नहीं जाना पड़ा क्योंकि पलक झपकते ही वे साइकिल समेत अपने घर में थे.

सुशील बहुत मृदुभाषी निर्मल स्वभाव के व्यक्ति हैं वे बहुत सहजता से किस्से सुना रहे थे और मैं दांतों तले उंगलियाँ दबा के बैठी सुन रही थी. वे आगे बताते गए कि वे लोग पहले जिस घर में रहते थे वह बड़ा अजीब सा था. वहां जो भी रहा बर्बाद होकर ही निकला.

वे आगे बताते हैं कि मैं रोज़ शाम को घर पहुँचता और ऐसा लगता था कि मैं नहीं चाहता लेकिन कोई है जो मुझे शराब पीने को मजबूर करता था. जब मैं उस घर में रहता था तब इतनी शराब पीता था और इतना खाना खाता था कि एक अकेले आदमी के इतना खाने और पीने की आप कल्पना तक नहीं कर सकते.

उन्होंने बताया हमेशा की तरह उन्होंने एक शाम घर में शराब के 20 क्वार्टर, दो दर्जन अंडे और कुकर में पांच किलो चावल पका कर रखे. मैंने पूछा क्या उस दिन घर में कोई पार्टी थी?
बोले नहीं यह सब मेरे अकेले का एक समय का भोजन था, मैं अकेले ही इतना खा और पी लेता था.
मैं अचंभित… इतना!!!

कहने लगे ये तो उनका रोज़ का कार्यक्रम था लेकिन वह दिन अंतिम था जब वे तीन बाबा उसे मिले थे.

मैंने पूछा उसके बाद?

उन्होंने बताया… उस दिन बाबाओं से मिलके बाद जब ये सारा कुछ तैयार करके बैठने ही वाले थे कि पूरा खाना और शराब पल भर में गायब हो गयी. यानी अब तक जो भी मैं खाता पीता था इन तीनों द्वारा ही करवाया जाता था. और जिस दिन मैंने उस खजाने को छूने से मना कर दिया तो उस दिन उनके हिस्से का खाना और शराब मेरे छुए बिना उन तक पहुँच गया. वह दिन मेरे जीवन रूपांतरण का दिन था. वह दिन और आज का दिन जीवन में फिर कभी शराब छूने का मन नहीं हुआ और उस दिन के बाद मेरा भोजन भी आम मनुष्य की तरह सामान्य हो गया.

उस दिन से रोज़ सुबह भगवान को अगरबत्ती लगाकर ही घर से काम के लिए निकलता हूँ. सुशील बताते हैं विवाह के बाद उन्होंने वह घर बदल दिया. वे बताते हैं कि आज भी रात बे रात अपने बेटे रोहित के साथ काम से घर लौट रहे होते हैं तो कोई न कोई उनके साथ चलता उन्हें अनुभव होता है. कभी स्त्री के रूप में कभी किसी पुरुष के रूप में. लेकिन उन्होंने अपने बेटे को हिदायत देकर रखी है ऐसा कुछ दिखने पर उस ओर बिलकुल ध्यान मत देना. यदि हम उन लोगों को कोई प्रतिक्रिया न दें तो वे हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाते.

बड़े याचक भाव से कहने लगे.. भाभीजी हम इन सब के बारे में जब कुछ जानते ही नहीं तो क्यों ऐसे लफड़ों में पड़ना… उनकी मर्जी है खुश होते हैं तो समृद्धि लाते हैं, हमारे मन में कोई खोट आ जाती है तो नुकसान कर जाते हैं, हम तो बस इतना जानते हैं ईश्वर ने सही जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन के लिए भेजा है ताकि हम गलती से भी किसी के लिए कुछ गलत न सोचें.

सुशील के बेटे रोहित ने भी ऐसे कई छोटे मोटे किस्से सुनाये जो उनके साथ अक्सर घटित होते रहते हैं. मैं एक बार फिर अच्चम्भित थी प्रकृति के रहस्यों पर.

अस्तित्व ने सबके लिए किसी न किसी को मार्गदर्शन के लिए भेज रखा है… निर्मल और निश्छल ह्रदय वालों को इनका अनुभव होता है और वो मार्ग दर्शन लेते हुए जीवन को और सहज और निर्मल करते चले जाते हैं… जिन लोगों को इन बातों पर विश्वास नहीं या अपने ही व्यवहार का ज्ञान नहीं वे अक्सर जीवन की दुर्घटनाओं पर यही सोचते हैं मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है जो मेरे साथ ऐसा हुआ.

यदि आपके जीवन में कुछ ऐसा अकस्मात घटित हो रहा है जो आपको नुकसान पहुंचा रहा है तो एक बार बहुत गौर से मनन कीजिएगा कहीं जाने अनजाने आप किसी के लिए बुरा तो नहीं सोच रहे.
ध्यान बाबा से मिलने से पहले कोई इस तरह के किस्से मुझे सुनाता तो मैं तरह तरह के वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ उसका खूब मज़ाक बनाती थी… आज वही सब बातें मेरे सामने अपने नग्न रूप में खड़ी हैं… बिना किसी आवरण के… मेरे खुद के ऐसे कई अनुभव हैं जिसे मैं किसी को बता भी नहीं सकती… तब लगता है… इस ब्रह्माण्ड में न जाने कितनी ऐसी बातें हैं जहाँ तक विज्ञान कभी नहीं पहुँच सकता… मुझे तो इन सब बातों पर पूरा यकीन है… आप चाहे मानो या ना मानो…

लेकिन एक किस्सा मेरे अपने करीबी रिश्तेदार का है, जिस पर ऐसे ही किसी प्रेत आत्मा का प्रकोप था… जिसने उसे कई बार शारीरिक प्रताड़ना भी दी और उसके हाथ पर काटे के निशान मैंने अपनी आँखों से देखे… और जब ध्यान बाबा के पास वो आये और ध्यान बाबा ने जो भी उपाय बताये, उसके बाद उसने उस प्रेतात्मा को खुद अपनी आँखों से उससे दूर जाते देखा और फिर वो कभी उसके पास लौटकर नहीं आया…

बस हम लोग जब गाड़ी से कहीं से लौट रहे थे तब उन्होंने मुझे वह स्थान बताया था… उस प्रेतात्मा को इस मंदिर के बाहर इस स्थान पर आखरी बार देखा था… वो वहीं छूट गया था फिर कभी लौटकर नहीं आया… ध्यान बाबा ने इजाज़त दी तो इस पर विस्तार से लिखूँगी… वर्ना इसे इतना ही समझ लीजिये… मानना न मानना आपकी मर्ज़ी…

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

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