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मानो या न मानो : सिर्फ़ सोचने भर से सब हो जाता है

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Pareidolia का अर्थ खोजने जाएंगे तो वो कहेंगे Pareidolia is a psychological phenomenon in which the mind responds to a stimulus, usually an image or a sound, by perceiving a familiar pattern where none exists.

उनके हिसाब से ऐसी कोई वस्तु वास्तविक रूप से नहीं होती बस यह आँखों का भ्रम या आप इसे Illusion कह सकते हैं.

लेकिन मेरा अपना अनुभव कहता है, इस तरह के प्रतिबिम्ब पर आप लगातार ध्यान केन्द्रित करें, तो एक ही सूरत आपको हर बार अलग अलग स्थान पर नज़र आ सकती है. या भविष्य के किसी संकेत के रूप में कोई छवि नज़र आ सकती है. ऐसा ही किसी विशेष ध्वनि के साथ भी है, यदि आपको कोई ध्वनि लगातार सुनाई देती है, फिर चाहे वो कोई गीत हो, मंदिर की घंटी हो, ढोलक की आवाज़ हो, किसी जानवर का एक ही तरह से चिल्लाना या कोई भी ध्वनि… उसके सूक्ष्म सन्देश को ग्रहण करेंगे तो वो यकीनन आपको आगे का मार्ग देने के लिए ही संकेत रूप में प्रकट होती हैं.

मेरे साथ यह जादू हुआ था जिन दिनों “रंग दे तू मोहे गेरुआ” गीत आया था, और ढोलक की थाप तो मुझे अक्सर हर जगह मिल जाती है, फिर चाहे में किसी शहर से ट्रेन से ही क्यों न लौट रही हूँ… स्टेशन तक पर मेरे लिए पूरा बैंड तैयार मिला है…

और Pareidolia मैंने सबसे पहले 2008 में जबलपुर आने पर अनुभव किया था, अपनी पुरानी ज़िंदगी छोड़कर अकेले एक कमरे में रहना बहुत बड़ा कदम था, मैं जीवन में कभी अकेले नहीं रही. तो थोड़ा भय भी लगता था. तब ध्यान बाबा ने अपने घर लौटते हुए कहा था… चिंता मत करो मैं यहीं हूँ…

और उनके घर लौट जाने के बाद मैंने उनका चेहरा सामने की दीवार पर देखा था… वो चेहरा फिर हमेशा वहां बना रहा जब तक मैं वहां रही… वह हाजीबाबा का घर कहलाता था… तब ध्यान बाबा ने यह भी आश्वासन दिया था, आप बिलकुल भयभीत मत हुआ कीजिये आपकी सुरक्षा में बहुत सारे लोग हैं…

और फिर मैं वहीं ज़मीन पर लगे बिस्तर पर लेटे-लेटे सामने की दीवारों पर चेहरे बुना करती और उनसे बात किया करती थी…

ऐसे ही बेटियों के विरह के दिनों में अत्यधिक पीड़ा में बब्बा (ओशो) की किताब हाथ में लिए रो रही थी और सामने ज़मीन पर बब्बा की वही तस्वीर स्पष्ट रूप से उभर कर आई जो उस पुस्तक के मुख पृष्ठ पर थी… यह गुरुओं की तरफ से आश्वासन, प्रेम और शुभ भविष्य के लिए संकेत होता है.

फिर तो जैसे यह जीवन का हिस्सा ही हो गया, अब तो कई चेहरे ऐसे ही स्पष्ट रूप से जब तब दिख जाते हैं… लेकिन इस सूक्ष्म संदेशों को ग्रहण करने के लिए आपको दृष्टि भी सूक्ष्म रखना होती है, और सबसे बड़ी बात आपको अन्धविश्वासी होने का ताना सुनने जितना धैर्य भी रखना होता है… लेकिन मेरा शुरू से मानना है यदि कोई अंध श्रद्धा आपको सकारात्मक ऊर्जा देती है, आपको सही मार्गदर्शन देती है तो आँख बंदकर के मैं उस विश्वास को बनाए रखना चाहूंगी.

तो इस हफ्ते फेसबुक पर अपनी यह फोटो लगाई… मेरा एक मित्र मेरी ही तरह Pareidolia देखने में माहिर है, मेरी हर तस्वीर में कोई न कोई आकृति खोज लेता है. इस फोटो को देखकर उसने तुरंत कहा आपकी एक आँख की पुतली बहुत चमक रही है.

मैंने कहा – हां मेरा भी ध्यान गया था इस बात पर, मुझे तो किसी की सूरत भी नज़र आ रही है उसमें लेकिन बहुत ज़्यादा enlarge करना पड़ेगा इसलिए रहने दो.

लेकिन वह नहीं माना और जब उसने तस्वीर enlarge की तो उसमें किसी ऋषि का चेहरा दिखा…

मैं देखकर अचंभित थी, आजकल जिस ऋषि स्वरूप व्यक्ति को दिन रात देख सुन रही हूँ मुझे लगा जैसे उन्हीं का चेहरा है ये. बस एक क्षण लगता है किसी सच्चे योगी को पहचानने में और मैं समर्पित हो जाती हूँ.

यह समर्पण का भाव ही है जो मुझे हर ओर से संकेत रूप में समर्थन देता है कि मैं सही राह पर आगे बढ़ रही हूँ.

एक बार फिर कहूंगी आप इसे मेरा अन्धविश्वास कहकर सिरे से ख़ारिज कर दीजिये, लेकिन मैं अपनी आस्था को कैसे खारिज कर दूं जो मुझे दिन ब दिन ब्रह्माण्ड के जादू से परिचित करवा रहा है.

पिछले दो हफ़्तों से मैं रोगहारिणी शक्ति के चमत्कारों के बारे में आपको बता रही हूँ, कि कैसे वायरल इन्फेक्शन से गुज़रते हुए मैंने इस शक्ति को अपने अन्दर जागृत किया, जिसके फस्वरूप कई शारीरिक और आध्यात्मिक परिवर्तन हो रहे हैं. हर बात लिखना यहाँ संभव नहीं है, लेकिन इतना अवश्य कहूंगी इसी शक्ति के माध्यम से अब मुझ तक उन सारी चीजों और व्यक्तियों को पहुँचाया जा रहा है (आकर्षण का नियम) जो इस शक्ति का जनकल्याण के लिए उपयोग कर रहे हैं.

जैसा कि मैंने पहले भी स्वामी राम की पुस्तक का अंश प्रस्तुत करते हुए बताया था कि यह शक्ति आप पर अतिरिक्त कृपा भी बरसाती है जब आप निश्छल मन से मात्र मानव सेवा के उद्देश्य से इसका प्रसार करते हैं.

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तो ऐसे में एक पुत्र स्वरूप मित्र के माध्यम से आचार्य राजेश कपूर का एक वीडियो प्राप्त हुआ, आपको बता दूं यह वही मित्र है जिनके माध्यम से सद्गुरु की पुस्तक “युगन युगन योगी” प्राप्त हुई थी और उन्हें इस बात की शिकायत रहती है कि आप मेरे लिए मित्र की जगह पुत्र का संबोधन क्यों नहीं रखती.

कृपया मेरे लेख में विषय की तारतम्यता होने की अपेक्षा न रखें मेरी हर एक बात दूसरी किसी अलहदा बात से बहुत महीन धागे से जुड़ी होती है, जिसका ज़िक्र बहुत आवश्यक होता है वर्ना पूरा लेख एक ही विषय पर लिखना बहुत व्यावसायिक सा लगता है, और मैंने जीवन में कभी भी व्यावसायिक रूप से कुछ नहीं लिखा.

तो बात हम आचार्य राजेश कपूर की कर रहे हैं… उनको जब पहली बार देखा तो देखते से ही इनकी सूरत किसी योगी जैसी नज़र आई, देखते ही समझ गयी थी कि इन्हें किस शक्ति ने मेरे पास भेजा है… फिर एक एक करके इनके बहुत सारे वीडियो देखे….

इनके माथे पर उभरती लकीरें तो बहुत कुछ कहती ही हैं, लेकिन इनकी आवाज़ में गज़ब का सम्मोहन है, आप बस आँख बंद करके इन्हें सुनेंगे तो यह जो कह रहे हैं उसका पालन नहीं भी करेंगे तब भी आप इनकी आवाज़ मात्र से खुद में एक विशेष ऊर्जा अनुभव करेंगे…

रोग हारिणी शक्ति, अस्तित्व की ऊर्जा का जादू, आधुनिक जीवन में हमारे द्वारा उपयोग में लाई जा रही चीज़ों का दुष्परिणाम, ध्यान का महत्व, जीवन शैली में प्रकृति का जुड़ाव, उनके वीडियो में ऐसी कोई बात नहीं छूटी है जिनका एक दूसरे से सम्बन्ध न हो… जिनके बारे में आगे विस्तार से लिखूँगी कि कैसे हम आधुनिक जीवन शैली के गर्त में गिरते हुए खुद को मृत्यु के मुंह में धकेल रहे हैं, जबकि हमारी प्राचीन जीवन शैली हमें सामान्य जीवन जीते हुए भी आध्यात्मिक यात्रा की ओर उन्मुख करे रहती है.

आचार्य राजेश कपूर फेसबुक पर भी उपलब्ध है, मैंने मित्रता निवेदन भेजा है, देखना बस यह है कब उनकी कृपा दृष्टि मुझ पर पड़ती है, हमेशा की तरह बिना किसी परीक्षा के कहाँ मुझे कुछ प्राप्त होता है…

मेरे प्राचीन जीवन शैली के पक्ष में लिखी बातों पर ताना मारते हुए कई लोग कहते हैं, सनातन जीवन शैली अपनाइए फिर तो इन्टरनेट का उपयोग भी बंद कर दीजिये. तो उन लोगों से बस इतना ही कहूंगी, विज्ञान हमारा दुश्मन नहीं है, लेकिन अज्ञानी अवश्य है, किसी अच्छी वस्तु का सदुपयोग मानव सेवा के लिए किया जा रहा है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका आविष्कार किस देश में हुआ है, समय के साथ चलना आवश्यक है लेकिन सिर्फ़ अपनी सुविधा और त्वरित लाभ के लिए अपने ही जीवन से खिलवाड़ करते हुए विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ की समझदारी है. और वह भी तब जब हमारे पास प्राकृतिक विकल्प उपस्थित है.

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अब तो विदेशी लोग भी हमारी प्राचीन जीवन शैली की ओर उन्मुख हो चुके हैं, फिर चाहे योग हो, जैविक उत्पादन हो खान पान हो, आयुर्वेद हो… सबकुछ. वे लोग यह नहीं सोचते कि यह तो पूर्व की जीवन शैली है हम क्यों अपनाएं, नहीं जब बात हम मानव स्तर की करते हैं तो देश की सीमाएं टूट जाती हैं, फिर हम सिर्फ़ और सिर्फ़ मानव की बात कर रहे हैं, फिर वह किसी भी देश का क्यों न हो.

और फिर जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ हर युग की आध्यात्मिकता उसकी भौतिकता से जुड़ जाती है, यह इन्टरनेट चाहे कहीं का भी आविष्कार हो, इसका उपयोग यदि हम स्वास्थ्य, समाज और अध्यात्म के लिए कर मानव उत्थान का प्रयास कर रहे हैं तो यही इन्टरनेट वरदान सिद्ध होगा.

इसके दुरूपयोग में भी लोग लगे हैं, और हम जैसे कुछ लोग सदुपयोग में भी… देव-असुर संग्राम हर क्षेत्र में है… हमें बस अपनी दैवीय शक्ति को ऐसे जागृत करना है कि आपकी आँखों की चमकती पुतली में भी किसी ऋषि के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो जाए.

और हाँ आचार्य राजेश कपूर के बहुत सारे वीडियो देखने के बाद जब इस लेख के लिए किसी एक वीडियो के चयन की बारी आई तो यह वीडियो अचानक से प्रकट हुआ, जिसमें आचार्य जी ने एक ऐसी बात कही जो पिछले दस साल से ध्यान बाबा मुझे अलग अलग तरीके से अलग अलग मौकों पर कहते आए हैं कि… “बस सोचने भर से सब हो जाता है…” जिसे आप सकारात्मक सोच का जादू कहकर पढ़ते आए हैं, अब पढ़ना छोड़ इसे जीना शुरू कर दीजिये, इस बारे में सोचना शुरू कर दीजिये क्योंकि सच में सिर्फ़ सोचने भर से सब हो जाता है, और इस जादू की मैं साक्षी हूँ.

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