मानो या ना मानो : यह महफिल है मस्तानों की, हर शख्स यहाँ पर मतवाला

वेद में एक बहुत ही सुन्दर मंत्र है – “कस्मै देवाय हविषा विधेम”. ऋषियों के सम्मुख एक बहुत बड़ा प्रश्न यह था कि यज्ञ में किस देवता की आहुति दी जाये. यह सब विचार करते हुए उन्हें लगा कि कौन सी ऐसी शक्ति है जो पूरे विश्व का संचालन करती है? इस चराचर संसार का नियंता कौन है?

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में कभी न कभी इन दार्शनिक प्रश्नों से अवश्य टकराता है. मेरे मन में भी बचपन से ही ऐसे विचार आते रहते थे. जीवन में सर्वशक्तिमान ईश्वर की खोज करते हुए स्वयं के विचार को अनेकों बार संशोधित किया. आरंभ हनुमान जी से करते हुए राम, कृष्ण, शिव, काली, सरस्वती, दुर्गा अनेकों भगवान के रूपों की वर्षों तक आराधना किया. बाद में महामहिम भगवान शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत की शरण ग्रहण करने पर आत्मा को असीम आनंद की अनुभूति होने लगी.

जीवन में जितनी बार भी रहस्यात्मक अनुभूति हुई, वो आन्तरिक ही हुई. ईश्वर की इतनी भक्ति करने के बाद भी मुझे कभी कोई बाह्य रहस्यात्मक अनुभूति नहीं हुई. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह रहस्यात्मक अनुभूति चाह कर कभी भी नहीं घटित किया जा सकता अर्थात् कितना भी जप, तप, ध्यान, कीर्तन किया जाये वो अनुभूति नहीं हो पाती है. वह अपनेआप कभी भी घटित हो जाती है. उस समय जो चरम आनंद की अनुभूति होती है वह बहुत ही दिव्य होती है. लेकिन यह बहुत क्षणिक होती है. एक बार यह अनुभव जिसे हो गया वह इसे हमेशा के लिए पाने को तड़प उठता है. लेकिन वह असहाय है, उसके हाथ में कुछ भी नहीं है. शास्त्र भी कहता है कि – “यह फल साधन ते न होई”.

इसी पृष्ठभूमि में दस वर्षों से सब कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ छुट गया. उठते-बैठते जब समय मिल जाता है सांसो पे “सो-हम्” का जप करता रहता हूँ. मन को मना चुका हूँ कि अगर अमृत पाना है तो उसका सुराक इसी के आस-पास कहीं है. इसी बीच पिता जी के देहांत होने पर छ: साल के बाद दिल्ली से कोलकाता आया. मेरी मम्मी और पापा लड्डू गोपाल को बेटे की तरह वात्सल्य भाव से भक्ति करते थें. मम्मी सुबह से रात तक उनके खाने, खेलने, सोने आदि की व्यवस्था करने में ही व्यस्त रहती हैं.

घर में गोपाल जी के चमत्कार के कई किस्से हैं. एक दिन गोपाल जी का पंखा खराब हो गया. रात में पापा जब लघुशंका के लिए उठे तो देखते हैं कि लड्डू गोपाल बिस्तर पर दादा जी और पिता जी के बीच में पंखा के ठीक नीचे लेटे हुए हैं. पापा चिल्लाने लगें कि भगवान को मन्दिर से उठा कर बिस्तर पर किसने रखा? तभी मम्मी उठ गयीं और पापा पर नाराज होने लगीं कि बिना स्नान किये गोपाल जी को लेकर बिस्तर पर क्यों रख दिये? मेरे घर में ऐसे चमत्कार होते रहते हैं. लेकिन मेरे साथ आज तक ऐसा कोई बाह्य चमत्कार नहीं हुआ, इस कारण मैं ये सब सहजता से विश्वास नहीं कर पाता हूँ.

ये सब विश्वास कर भी लें तो हम ऐसे भगवान को लेकर क्या करेंगे जो हमारी रक्षा नहीं कर सकता. इस घटना के दो महिने बाद अचानक पता चला पापा को लिवर कैन्सर है और वो गुजर गयें. माँ को वैध्वय का अभिशाप झेलना पड़ा. मम्मी आज भी गोपाल के साथ ही सैंकड़ों चिड़िया, कौआ, मैना आदि का ध्यान वो अपने बच्चे की तरह रखती हैं. ये सब उनके हाथों में अपना चोंच डाल कर खाना खा लेते हैं. मम्मी इतनी सीधी हैं कि उन्हें देखकर दया आती है. मैं माँ को समझाता रहता हूँ कि ये सब से मुक्ति नहीं मिलेगी. चलो दस दिन का विपश्यना कर लो. लेकिन माँ को लड्डू गोपाल के मायाजाल से मुक्त कराना बहुत मुश्किल है.

इधर तीन-चार महिनों से हमेशा रोने की इच्छा होती रहती है लेकिन कभी रो नहीं पाता हूँ. पापा का जब देहांत हुआ था तब मुझे रोना ही नहीं आया. सुबह-शाम क्रिया-कर्म में व्यस्त रहता और बाकी समय दिन से लेकर रात ग्यारह बजे तक लोग मुझसे अपनी कुण्डली दिखवाने के लिए भीड़ किये रहते थे.

मैं भीतर से गुस्सा होता रहता कि कितने बेरहम लोग हैं, कम से कम अभी तो मुझे अकेला छोड़ देतें. वो लोग मम्मी से ही सिफारिश करवा लेते थे. मम्मी कहती कि तुम छ: साल बाद कोलकाता आये हो, लोगों को लगता है कि पता नहीं फिर कब मुलाकात होगी. इसी में पन्द्रह दिन बीत गये और उसके बाद मैं दिल्ली आ कर यहाँ व्यस्त हो गया. पिछले सात महिने से मन संसार से उदासिन रहने लगा है.

3 & 4 दिसम्बर, 2016 को मायापुर में धर्म जागरण के प्रांत स्तरीय पदाधिकारियों की बैठक थी. धर्म जागरण के राष्ट्रीय सह-प्रमुख माननीय राजेन्द्र जी मुझे अपने साथ लेकर चले गये. हमलोग 2 दिसम्बर की रात वहाँ पहुंचे. सुबह सात बजे की आरती में हम दोनों सम्मिलित थे. वहाँ सभी नाच रहे थे और मैं खड़ा हो कर चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति की ओर देख रहा था. पीछे से राजेन्द्र जी मुझे इस्कॉन के नृत्य स्टेप बताने लगे कि मैं भी नाचूँ. मैं उन्हें कह नहीं सका कि मुझे इन सबसे वितृष्णा है.

चैतन्य महाप्रभु की आरती के बाद हम बगल के कक्ष में राधा-कृष्ण की आरती के लिए आये. वहाँ अभी भी पर्दा लगा था. अचानक से पर्दा हटता है और भजन होने लगता है – “गोविन्दा आदिपुरुष: त्वम्हम् भजामि”. मैं सामने गोपाल को देखता रह गया. मैं रोने लगा. कितना प्रबल आकर्षण है उसमें! मैं अब तक इस स्वर्ग में नहीं आ सका, इसकी वेदना मेरे भीतर से हुक मारने लगी. सुदामा जब कृष्ण से वर्षों बाद मिलते हैं तब प्रभु कहते हैं – “आए न इते किते दिन बिते”. सुदामा तुम अब तक मेरे यहाँ नहीं आये, कहाँ समय व्यर्थ गंवा दिया? शायद मेरी रूह इसी रोने का इंतजार तीन-चार महिने से कर रही थी.

दूसरे दिन मैं फिर सुबह की आरती में गया. चैतन्य महाप्रभु की आरती हो रही थी. मुझे बिलकुल भी नाचना नहीं आता, इसलिए मैं आँखें बन्द करके खड़ा रहा. फिर धीरे-धीरे मेरे शरीर में थिरकन महसूस होने लगी. मेरे शरीर का एक-एक जोड़ लचकने लगा. पाँव से नृत्य के थाप पड़ने लगे, पाँव इतनी जगह से लचक रहा था कि मुझे लगता कि मै अब गिरा की तब गिरा. लेकिन मैं गिर नहीं पा रहा था, जैसे कोई मुझे थामे हुए था. मैं कुछ नहीं कर रहा था, सब अपनेआप हो रहा था.

इससे पहले ऐसा एक बार तेरह-चौदह वर्ष पहले हुआ था. आर्ट ऑफ लिविंग के ध्यान में, सभी को आँखें बन्द करके खड़ा कर दिया गया था और उसी समय मेरे साथ ऐसा होने लगा था. मैं सोच रहा था कि ये अनुभव किसी और के साथ होता और मैं खुली आँखों से ये दृश्य देख पाता. मैंने इसका जिक्र किसी से भी नहीं किया. इस घटना के कुछ साल बाद मेरे एक मित्र पारस भाई ने एक दिन खुद बताया कि मैं भी उस दिन आपके साथ खड़ा था. उनका ध्यान में मन नहीं लग रहा था, इसलिए चुपके से आँख खोल कर सबको देखने लगे. इसी बीच उनकी नजर मुझ पर पड़ी. वे बता रहे थे कि ऐसा दुर्लभ नृत्य जीवन में कभी नहीं देखा.

मायापुर से कोलकाता लौटने के बाद मैंने सोच लिया है कि अब मैं माँ को विपश्यना ध्यान करने के लिए परेशान नहीं करूँगा. माँ का उद्धार गोपाल जी ही करेंगे. मैं अपने इस सनातन धर्म की अनेकों विभिन्नताओं को देख कर मुग्ध हो जाता हूँ. ईश्वर की कृपा है कि उसने मुझ जैसे ठूँठ को भी अपने विभिन्न रूपों का थोड़ा-थोड़ा स्वाद चखा कर मुझे अन्य मार्गों का विरोधी बनने से बचा लिया. मुझे भगवान शंकराचार्य का ज्ञान भी चाहिए, मुझे बुद्ध का गहन ध्यान भी चाहिए, मुझे शिव-शिवा की शक्ति का अनुभव भी चाहिए और मुझे गोविन्द का माधुर्यमय प्रेमा भक्ति भी चाहिए. यही तो है हमारे सनातन का आधार, जिसे बहुदेववादी एकेश्वरवाद कहा जाता है.

(इस फेसबुक के पटल पर ये मेरी पहली आध्यात्मिक पोस्ट थी. इसी पोस्ट ने यहाँ मुझे मुझ जैसे सैकड़ों पागलों से मिलवा दिया और फिर उसके बाद यहाँ पागलों की महफिल जमने लगी. इस महफिल में जो भी होशवाला बुद्धिमान आकर खलल डालने की कोशिश की, मैंने चुपके से उसे ब्लॉक कर दिया. हर बाखबर की मैंने ऐसे ही खबर ली और अंत में सिर्फ हम जैसे बेखबर ही बचें. “यह महफिल है मस्तानों की, हर शख्स यहाँ पर मतवाला! भर-भर के जाम इबादत के, यहाँ सबको पिलाये जाते हैं!!”)

– ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह राठौड़

मानो या ना मानो : रहस्यमयी रंगोली

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *