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मानो या न मानो : मिट्ठी के जन्म और गुड़वाले बाबा की सच्ची कहानी

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माई, ओ माई !!
गुड़ रोटी मिलेगी खाने को?

आगे जा बाबा… आज कुछ नहीं है देने को. मैं बहुत परेशान हूँ.

दे दे ना माई, बस दो रोटी और गुड़.

ओ हो बाबा… एक तो मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा और ऊपर से तुम… खैर बाबा तुम्हारा क्या दोष, लाती हूँ गुड़ रोटी.

कह कर शारदा अंदर गयी और लोटा भर पानी और कागज़ में लपेट कर रोटी और गुड़ लाकर बाबा को दे दिया.

खाते खाते बाबा बोला… माई, तू बेटी के ब्याह के लिए परेशान है ना, चिंता मत कर परसों दिल्ली के एक बड़े घर से रिश्ता आएगा तेरी बेटी के लिए, राज करेगी राज. चिंता मत करियो सब काज अच्छे से होगा मैं अब फिर आऊंगा जिस दिन तेरी बेटी की सगाई होगी.
ये कह कर पानी पीकर वो बाबाजी चला गया.

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हूँ !!
फिर आगे क्या हुआ बाबा?

मिट्ठी अपने बाबा के घुटने पे सिर टिकाए कहानी सुन रही थी और बाबा सुना रहे थे कहानी जो उनकी और उनकी पत्नी शारदा की ज़िंदगी में गुज़री थी.

मिट्ठी के बाबा राजाराम जी एक गरीब संस्कृत अध्यापक थे. किसी तरह पूरे कुनबे का भरण पोषण करते थे. बड़ा बेटा जब से कमाना शुरू हुआ था कर्जे ही कर्जे उतार रहा था जो अब तक राजाराम शास्त्री अपने भाई बहनों के ब्याह के लिए लिए थे.

राजाराम शास्त्री बहुत संतोषी व्यक्ति थे उनका बड़ा पुत्र पढ़ने में बहुत मेधावी था, छात्रवृत्तियों पे पढ़ कर वो इंजीनियर बन गया था और सुशील कन्या से विवाह के बाद एक 5 वर्षीय बेटे का पिता था.

राजा राम जी के दो बेटे दो बेटियों में से एक बेटे और एक बेटी का विवाह हो चुका था.

ये दूसरी बेटी प्रभा के विवाह की चिंता में उनका मन व्याकुल था. हाथ में पैसा नहीं और उस ज़माने में बेटी BA पास कर चुकी थी. बहू के कहने पे बेटी को इतना पढ़ा दिया था सुलक्षणी बहू थी. पर पढ़ाई में बिटिया 19 साल की हो चुकी थी अब वर कैसे मिले.

गरीब ब्राह्मण परिवार और कच्चा छप्पर वाला घर.

इंजीनियर, पर ईमानदार बेटा. पैसा कहाँ से आये.

तो राजाराम शास्त्री और उनकी पत्नी शारदा आज एक जगह रिश्ते की बात के ना हो जाने के कारण परेशान थे कि उस बाबाजी ने रोटी मांग ली.
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राजाराम जी अब वृद्धावस्था में पहुच चुके हैं और अपनी लाड़ली पोती को ये आपबीती घटना सुना रहे थे वो बालिका इसको कहानी समझ कर सुन रही.

बोलो ना बाबा आगे क्या हुआ?

आगे हुआ ये कि तीसरे ही दिन तेरे पिताजी के एक मित्र घर आये जो इस गांव के दामाद थे नाम था मिश्र जी.

उनके सामने जब प्रभा के विवाह की बात चली तो उन्होंने तुरंत दिल्ली अपनी बुआ के बैंक में नौकरी करने वाले बेटे का रिश्ता बताया. और रिश्ता पक्का हो भी गया.

तब तेरी दादी शारदा ने ये बाबाजी की घटना मुझे बताई.

अब मुझे भी इंतज़ार था प्रभा की सगाई के दिन का क्योंकि मैं भी उन बाबाजी से मिलना चाहता था.

सगाई के दिन जब रस्म हो गयी कि घर के दरवाजे पे आवाज़ आयी… अलख निरंजन!!!
माई, आज गुड़ रोटी के साथ कम्बली भी दिला दे. जत्थे के साथ यात्रा पे जा रहा हूँ.

मैं तुरन्त दौड़ कर उस बाबा के चरणों मे गिर गया और उस बाबा ने उठा कर कहा. शास्त्री अभी तेरे घर एक बार और आऊंगा मैं जब “वो” आएगी.

आज कंबल दिला दे.

मैं तुरन्त शाह जी की दुकान पे गया और दो कम्बल लेकर आ गया पर वो एक ही कम्बल लेकर चल दिये मैं सोचता रहा कि बाबाजी किस “वो” का ज़िक्र कर रहे थे.
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खैर ! तेरी बुआ ( प्रभा) का विवाह आराम से हो गया तेरी माँ ने अपने सारे गहने खुशी से अपनी ननद को दे दिए और आर्थिक संकट इस तरह टल गया. गांव भर में धूम रही कि दिल्ली शादी हो रही.

पर मुझे एक दुख था कि तेरा भाई चार वर्ष का हो गया था उसके बाद इस घर मे कोई किलकारी नही गूंजी थी.

तो मैं कर्मकांडी ब्राह्मण संकल्प लेकर नवरात्रि पूजा में बैठा. रोज दो पत्ते तुलसी और एक गिलास जल ये मेरा आहार था.

गायत्री साधना करते मेरे 3 नवरात्रि अनुष्ठान पूरे होने वाले थे कि रात्रि में कमरा पूरे तेज से रोशन हुआ और स्त्री की आवाज़ आयी तेरा अनुष्ठान स्वीकार हुआ.

तेरी पुत्रवधु गर्भवती है और मेरा ही एक रूप आ रहा है. मैं जब तक उठ कर बैठूं सब गायब.

बस अचम्भा यही था कि हर वर्ष मैं राम पूजा करता था रामायण के परायण करता था पर तीन नवरात्रि से दुर्गा सप्तशती करके दुर्गा उपासना कर रहा था.
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राजाराम शास्त्री पानी पीने के लिए रूके.
मिट्ठी बोली … बाबा, आगे क्या हुआ बताओ जल्दी.

राजाराज जी मुस्करा दिए.

अप्रेल के नवरात्रों की ये घटना थी और फिर अक्टूबर के नवरात्रि में भी मैंने मां जगदम्बा की पूजा की और दिसम्बर में. दिसम्बर की रात्रि को इस गांव से 500 km दूर जहां तेरे पिता की नौकरी थी वहां तेरी मां के गर्भ से तेरा जन्म हुआ.

तब संचार के इतने साधन तो थे नहीं कि फोन पे सूचना मिल जाये. तो उस रात को दिसम्बर की कड़कती ठंड में सुबह 4 बजे किसी ने दरवाजा बजाया और जब लालटेन जला कर मैंने दरवाजा खोला तो उस दरवाजे पे वो ही बाबाजी था उसने नाचते हुए कहा… वो आ गयी, वो आ गयी जिसका इंतज़ार था वो आ गयी. अब मैं नही आऊंगा. अब वो मुझसे मिलने आएगी.

शास्त्री तेरे बेटे के घर 3 बजकर 40 मिनट पर वो आ गयी है.
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मैं अचंभे में था कि जो सूचना अभी तक मुझे नहीं मिली वो 500 km दूर की खबर इनको कैसे?

कौन जन्मा है मेरे बेटे के घर?

और वो बाबाजी गायब हो गए…

सुबह 10 बजे बड़े शहर से एक आदमी ने खबर दी कि शास्त्री जी आपके घर पोती हुई है.
बिटिया वो तुम हो मेरी आराध्या.
उसके बाद वो बाबाजी नज़र नहीं आये…

पता नहीं मिट्ठी का और गुड़ रोटी वाले बाबाजी का कब मिलना होगा?

– शालिनी गौड़

मानो या न मानो : जगदम्बा, एक सच्ची घटना

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