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मानो या ना मानो -7 : महासमाधि की झलक

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पिछले महीने ‘युगन युगन योगी’ यह पुस्तक एक मित्र के माध्यम से जादुई रूप से पहुँची थी… यूं तो मैं आजकल सद्गुरु को दिन रात यूट्यूब पर सुनती रहती हूँ, लेकिन पुस्तक पढ़ने का जादू क्या होता है वो मैंने ‘वर्जित बाग की गाथा’ और ‘हिमालायीवासी गुरु के साए में श्री एम’ पुस्तक से जाना है…

तो यह पुस्तक आये हुए दो चार दिन बीत चुके थे स्वामी ध्यान विनय को मैंने इन दो चार दिनों में उस पुस्तक को पढ़ते हुए देखा है, उन्हें पढ़ते हुए देखना भी बहुत अद्भुत होता है… वो पुस्तक पढ़ते हुए बीच-बीच में अपना चेहरा हटाते हुए मुझसे अक्सर कहते रहते… आप इस पुस्तक को बिलकुल मत पढ़ियेगा… आपका सारा जादू ढह जाएगा..

मैं जानती हूँ पुस्तक पढ़ने के लिए उकसाने का उनका अपना तरीका होता है… और ये भी समझ पा रही थी कि क्यों आजकल सद्गुरु मुझे दिन रात घेरे रहते हैं… लेकिन मेकिंग इंडिया की दोनों websites और दो बच्चों और घर के कामों के साथ मैं सच में उस पुस्तक को पढ़ने के लिए समय नहीं निकाल पा रही थी…

फिर एक दिन अचानक सुबह दस बजे ध्यान बाबा ने पूछा- चलें?

उस दिन शुक्रवार था मतलब शनिवार को मुझे मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी लॉन्च करना था… जिसकी मैं तैयारी कर रही थी… लेकिन उनका “चलें?” इतना रहस्यमय था कि मैंने तुरंत जवाब दिया… चलो… कहाँ कितने दिन कुछ नहीं पूछा, मेकिंग इंडिया के अगले अंक की लॉन्चिंग का उनको भी भलीभांति ज्ञान था तो सोचा कुछ सोचकर ही कहा होगा… फिर भी मैंने सिर्फ इतना पूछा- कब?

आज शाम चार बजे की गाड़ी है, कल रात साढ़े नौ तक वापसी… और हाँ वो पुस्तक “युगन युगन योगी” रखना मत भूलना…

दस बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक मैंने मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी तैयार किया… बस लौटकर आने के बाद उसे पब्लिश भर करने का काम ध्यान बाबा का होता है सो मेरे हिस्से का काम मैंने पूरा कर दिया…

दो से तीन बजे के बीच में बच्चों के दो जोड़ी कपड़े और यात्रा में ज़रूरी कुछ चीज़ें बैग में डाली और बैठ गए ट्रेन में..

आते और जाते दोनों समय स्वामी ध्यान विनय ने दोनों बच्चों को पूरे समय सम्भाला और मैंने 300 पेज की ‘युगन युगन योगी’ को आधी जाते समय और आधी लौटते समय में पढ़कर पूरी की….

ये मेरे लिए विशेष यात्रा थी सिर्फ एक पुस्तक को पढ़वाने के लिए, वरना ध्यान बाबा और मेरा एक साथ निकलना असंभव सा होता है, मेरी लाख मिन्नतों के बाद भी उनका एक ही जवाब होता… आप अकेले हो आइये ना मैंने कब मना किया है, बस मुझे अपना स्थान छोड़ने के लिए न कहिये…

जहाँ पहुंचे वो है ससुराल, ध्यान बाबा के बड़े पापा का घर, जहाँ मैंने एक बहू के रूप में सर ढंककर प्रवेश किया, बुजुर्गों के चरणों में बैठकर उनका आशीर्वाद लिया, बच्चों ने बड़े दादा का सानिध्य पाया जिसके लिए वो पिछले कई दिनों से तरस रहे थे… उनकी तबीयत अचानक से बहुत खराब हो गयी थी और पापा यानी बच्चों के दादाजी का जाना हो नहीं पा रहा था तब ध्यान बाबा ने मुझसे पूछा था- “चलें?”

ये किस्सा बताना आवश्यक था क्योंकि मुझे उन दो दुनिया का ज़िक्र करना था जो हम एकसाथ जीते हैं… ससुराल पक्ष जो किसी माँ जीवन शैफाली को नहीं जानता, मेरी आध्यात्मिक यात्रा तो दूर की बात मेरी सांसारिक यात्रा का भी उनको अधिक नहीं पता… उनके लिए मैं बस घर की प्यारी बहू हूँ, घर की बहू जो अक्सर घूंघट में रहती हैं, वो बहू आज रोते हुए बड़े दादा के हाथ थामकर कहकर आई “दाऊ आप बिलकुल चिंता मत करो, मैंने आपका घर संभाल लिया है” सब बहुत अच्छा है… सब सुखी हैं… और मेरी आँखों में आंसू देखकर “बाई” ने प्यार से झड़क दिया… चलो चलो अब बहुत हल्ला मत मचाओ… उनकी अपनी भाषा और लहज़ा होता है जो मुझे हमेशा प्यारा लगता है… न जाने किसने कहा है लेकिन सच ही कहा है “ससुराल” गेंदा फूल”… यही गेंदे के फूल ही तो भगवान् की मूर्ति को चढ़ाए जाते हैं ना…

प्रत्यक्ष रूप से भगवान् इस मूर्ति में ही है लेकिन हम ये भी जानते हैं कि इस मूर्ति के पार भी एक दुनिया है… जहाँ सिर्फ और सिर्फ हमारी चेतना पहुँचती है…

तो बात अब दूसरी दुनिया की जिसके लिए ये यात्रा तय हुई थी… लौटते में मुझे आधी बची युगन युगन योगी पुस्तक पढ़कर ख़त्म करना था… बच्चे उसी तरह से ध्यान बाबा को परेशान कर रहे थे, आसपास बैठे लोग भी दोनों का मनोरंजन करने में लगे थे… लम्बी यात्रा के कारण दोनों उकता गए थे… लेकिन मेरी आँखें पुस्तक से नहीं हट रही थी… बस एक बार हटी जब आँखों में इतने आँसू भर आए कि पढ़ना मुश्किल हो गया… मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था लेकिन आसपास वाले देख रहे थे कि मैं हिचकियाँ लेते हुए खिड़की की ओर मुंह करके रो रही हूँ…

किस्सा था सद्गुरू की पत्नी विजी की महासमाधि का… कई लोगों का स्वभाव ऐसा होता है कि आप उनके साथ खुदको एकाकार होते हुए पाते हैं… जैसा वर्जित बाग़ की गाथा पढ़ते हुए आग से निकल रहे उस पुरुष का किस्सा पढ़ते हुए भय लगा था कि कोई मेरी तरफ बढ़ता हुआ आ रहा है, वैसे यह किस्सा पढ़ते हुए मैं विजी के साथ इतनी एकाकार हो गयी थी लगा काश मुझे भी इतनी ही सहजता से समाधिस्थ होने का सौभाग्य मिले… दोनों भावनाओं में ज़मीन असमान का फर्क है… यही मेरी जीवन यात्रा की उपलब्धि है… कि किसी की महासमाधि का किस्सा पढ़ते हुए मैं समाधि की झलक पा लूं…

विजी के स्वभाव के बारे में सद्गुरु बताते हैं कि वो कोई बहुत बड़ी साधक नहीं थी, बहुत ही कोमल स्वभाव की चंचल लड़की थी, किसी भी बात पर ज़ोर ज़ोर से हंसने वाली और छोटी सी बात पर बच्चों की तरह रो देने वाली… वो लोगों के प्रति बहुत करुणामयी थी.. लोग भक्तों को अधिकतर मूर्ख समझते हैं उनकी तार्किक बुद्धि भक्तों को स्वीकार नहीं कर सकती, लेकिन विजी की भक्ति ने यह साबित कर दिया था कि इंसान सरल हृदय से भक्ति द्वारा मुक्ति के लिए समर्पित हो जाए तो उसके लिए अस्तित्व महासमाधि की भी व्यवस्था कर देता है…

जिस किस्से ने ट्रेन में मुझे ज़ार-ज़ार रुला दिया वो यह था-

उन्हें याद है कि उसकी महासमाधि से दो दिन पहले जब वे ऊटी से लौट रहे थे, विजी जो हमेशा की तरह “शम्भो” जप रही थी… अचानक रोने लगी, उसने उनका हाथ पकड़ लिया और कार रोकने के लिए कहा, जब उन्होंने कार रोकी तो उसने कहा कि उसके जीवन में वही एक शम्भो थे जिन्हें वह जानती थी, उसने अपने सपने को सच करने में उनसे मदद की भीख माँगी, सद्गुरु ने बिना गंभीर हुए जवाब दिया कि अगर वह शम्भो को नहीं भी जानती थी, तो भी शम्भो उसे पक्के तौर पर जानते थे, तुम जो कर रही हो, अगर तुम उसके प्रति इमानदार रहो, तो तुम “उन्हें” ज़रूर अनुभव करोगी और मेरे भौतिक रूप के परे “उन्हें” जान पाओगी, उन्होंने उससे कहा कि कोई भी उसे उसके लक्ष्य से वंचित नहीं कर सकता, इससे उसे राहत मिली, ऊटी से आने के बाद वह और भी जोश से अपने अभ्यास में लग गयी… (विजी जिनका नाम विजेता कुमारी था, उनकी महासमाधि पर विस्तार से अलग से लिखूँगी कि कैसे एक साधारण स्वभाव वाला इंसान भक्ति और समर्पण से अपने शरीर से और संसार से मुक्ति पा सकता है)

Ma Jivan Shaifaly

और मैं स्वामी ध्यान विनय को अश्रू भरी आँखों से कहती रही – मेरे जीवन में वही एक ‘शम्भो’ है जिन्हें मैं जानती हूँ, और मोक्ष के मेरे सपने को सच करने में आपको मेरी मदद करना होगी….

– माँ जीवन शैफाली

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