Menu

मानो या ना मानो – 5 : इच्छापूर्ति के लिए कायनाती षडयंत्र

0 Comments


बात उन दिनों की है जब फैशन डिजाइनिंग का शौक चढ़ा था… अधिकतर ड्रेस मैं अपने हाथों से बना लेती थी, बात शायद 2002 के आसपास की होगी, विचार आया था कि अपने इस शौक को क्यों न प्रोफेशनल रूप में सीखकर करियर बना लूं, तो उन दिनों NIFT में दाखिला लेने भी गयी थी लेकिन वहां की फीस और खर्चा सुनकर निराश होकर वापस लौट आई।

एक सहेली ने सलाह दी कि उसका एक परिचित टेलर है वो बड़े बड़े बुटिक के लिए ड्रेस डिज़ाइन करता है उसके अंडर में काम सीख कर फिर अपना कुछ शुरू कर देना।

तो एक दिन वो मुझे उससे मिलवाने ले गयी, वो एक ब्लैक और ग्रे कॉम्बिनेशन में कोई ड्रेस डिज़ाइन कर रहा था, सहेली ने उससे मेरे बारे में बात की और मेरे फैशन डिजाइनिंग के शौक के बारे में बताया, तो उसने कहा ठीक है इस कपड़े को कैसे डिज़ाइन करोगी।

मैंने कागज़ कलम लेकर एक फिश कट लहंगे का डिज़ाइन बनाकर दिखा दिया। उसने उसी डिज़ाइन में उसे तुरंत काटा और आगे एम्ब्रॉयडरी और सिलाई के लिए भेज दिया।

मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, मेरा डिज़ाइन किया हुआ ड्रेस किसी बड़े बुटिक की शान बनेगा, मैं ये सोचकर ही खुश थी। टेलर ने कहा आपको पता है ये ड्रेस बनने के बाद कितने में बिकेगा? मैंने ना में सिर हिला दिया। कहने लगा – कम से कम चार या पांच हज़ार में…

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया उस ज़माने में जब मेरे लिए काजल लिपस्टिक के पैसे जुटाना भी मुश्किल हो रहा था उस ज़माने में मेरे लिए वो पांच हज़ार का ड्रेस भी पचास हज़ार के समान था। मेरे मुंह से बस इतना ही निकला, मैं तो सपने में भी इतनी महंगी ड्रेस नहीं खरीद सकती और एक ख्वाहिश भी… कि काश मेरी पहली डिज़ाइन की हुई ड्रेस मैं खरीद पाती।

तब उस टेलर ने मुझे कहा था मैडम आप बहुत अच्छी डिज़ाइनर बनेंगी एक दिन देखना, आपकी डिजाइनिंग बहुत अलग है।

लेकिन उस टेलर की भी फीस इतनी अधिक थी कि मेरे पास आगे सीखने के सारे रास्ते बंद हो गए थे। मैं निराश होकर घर लौट आई थी फिर कुछ साल घर में बिताने के बाद एक बड़ी मीडिया कंपनी में उपसंपादक के रूप में काम मिल गया था।

चार पांच साल में फिर किस्मत ने ऐसी पलटी मारी कि नौकरी करते हुए इतने पैसे कमाने लगी कि अपने और अपने परिवार का पालन पोषण कर सकूं।

उन्हीं दिनों एक करीबी रिश्तेदार के विवाह के लिए मुझे अपनी पसंद का एक ड्रेस खरीदना था। एक पूरी शाम बाज़ार की बड़ी-बड़ी शॉप्स देखने के बाद भी मुझे अपनी पसंद की कोई ड्रेस न मिली। मैं बहुत उदास थी, आज पैसा है तो पसंद का ड्रेस तक नहीं मिल रहा। कपड़ों ही नहीं हर चीज़ में मेरी पसंद ज़रा अलहदा ही होती है, तो मिलना ज़रा मुश्किल ही था।

हम लोग घर लौट रहे थे कि रास्ते में एक बुटिक दिखा ये सोचकर कि घर तो लौट ही रहे हैं एक बार यहाँ भी देख लिया जाए, मिला तो ठीक वर्ना मैं नया कुछ न खरीदूंगी, जो रखे हैं घर में नए कपड़े उसी से काम चला लूंगी।

हम उस बुटिक में गए, दो चार ड्रेस दिखाने के बाद मुझे एक लहंगा पसंद आ ही गया। मैंने चैन की सांस ली, चार हज़ार रुपये पकड़ाकर ड्रेस घर ले आई।

अगले दिन उसी पुराने टेलर के पास गयी जिससे अब मैं अपने कपड़े सिलवाने लगी थी क्योंकि मेरी बताई हुई डिज़ाइन के कपड़े वही बना पाता था। उन दिनों तरह-तरह की डिज़ाइन के कपड़े पहने हैं मैंने और लोग आश्चर्य से देखते भी थे, क्योंकि हर तरह की डिज़ाइन के कपड़ों को पहनना और उसको कैरी कर पाना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती।

वो लहंगा मैंने उसके सामने रखा और कहा कल ही खरीदा है बस थोड़ा सा ब्लाउज़ ढीला है इसे टाइट कर देना और ज़रा ध्यान से करना बहुत महँगा है बिगड़ने ना पाए।

उसने पैकेट में से लहंगा निकाला और उसमें से ब्लाउज़ निकालने लगा… और ज़ोर से हंस दिया… मैंने पूछा क्या हुआ इसमें हंसने की क्या बात है!!

मैडम आपको याद नहीं?

क्या?

चार पांच साल पहले इसी लहंगे को आपने डिज़ाइन किया था और मैंने काट के सिलवाने भेजा था।

उस समय सिर्फ़ कपड़ा देखा था तो ध्यान ही नहीं गया चूंकि टेलर ने सिल आने के बाद भी लहंगा देखा था तो उसे याद रह गया।

मैंने गौर से देखा… और अचंभित रह गयी… अरे हाँ यह तो वही कपड़ा है… इतने साल तक यह ड्रेस किसी ने खरीदा नहीं, इतनी बुरी डिज़ाइन थी क्या?

कहने लगा आपकी डिज़ाइन बहुत अलग होती है हर कोई नहीं पहन सकता इसे और हो सकता है आपकी इच्छा रही होगी इसे पहनने की तो आप ही की किस्मत में आया है।

उन दिनों मैं इसे सिर्फ इत्तफाक़ समझकर खुश हो ली थी लेकिन आज जब एक के बाद एक मेरी हर इच्छा पूरी होती देखती हूँ तो लगता है… नहीं अस्तित्व मुझ पर कुछ अधिक ही महेरबान है।

फिर ध्यान बाबा के पास आने के बाद जो फकीराना जीवन में आनंद आने लगा तो इच्छाएं स्वत: समाप्त होने लगी। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझ आने लगा है।  हाँ कुछ रिश्ते हैं कुछ पिछले जन्मों के, कुछ इस जन्मों के मेरे डिज़ाइन किये हुए.. जिनके मोह के बंधन से अभी मुक्त न हो सकी हूँ… उनकी अवश्य प्रतीक्षा है… देखते हैं अस्तित्व कब उन्हें मुझ तक भेजता है।

और मैं जानती हूँ कोई और उन रिश्तों को संभाल ही नहीं सकता… क्योंकि कुछ ड्रेस की तरह कुछ रिश्ते जो मैंने डिज़ाइन किए हैं उनको कैरी करना सिर्फ मुझको आता है और वो मेरे साथ ही फबते हैं… इसे आप मेरी आत्म मुग्धता कह सकते हैं, लेकिन क्या करें मैं ऐसी ही हूँ…

यह तस्वीर उसी ड्रेस की है, चूंकि उन दिनों मॉडलिंग का भी भूत सवार था और ध्यान बाबा का आगमन नहीं हुआ था जीवन में, तो थोड़ी बदसूरत सी लगूंगी 🙂

इस ड्रेस से जुड़ी एक और कथा मानो या ना मानो के छठे भाग में

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

मानो या ना मानो – 2 : हनुमान दर्शन

मानो या ना मानो – 3 : मुक्ति के यज्ञ में पिता ने दी आहुति

मानो या ना मानो – 4 : पिता के अंतिम दर्शन

मानो या ना मानो – 6 : अग्नि के मानस देवता

रे फकीरा मान जा…

Facebook Comments
Tags: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!