Menu

मानो या ना मानो – 4 : पिता के अंतिम दर्शन

0 Comments


पिता की मृत्यु के बाद लिखे दो लेख-

सत्य से मुंह फेर कर खुद को समेट समेट कर जीते रहने की आदत औरत में जन्म के साथ पड़ जाती है, क्योंकि वह अपनी माँ को और माँ की माँ को भी इसी तरह जीते हुए देख चुकी होती है। पूछने पर जवाब भी यही मिलेगा – हाँ यही तो होता है हर घर में, परिवार ऐसे ही चलाया जाता है। दो समय का खाना और सर पर छत रहना चाहिए तो परिवार सफल कहलाएगा।

और यदि परिवार का कोई एक व्यक्ति भी सामाजिक नियमों को ताक पर रखकर स्वतंत्रता का वास्ता देकर अपना सर थोड़ा सा भी ऊपर उठा ले तो वह बाग़ी कहलाएगा। और ये परिवार सभी के लिए बराबर मापदंडों पर नहीं चलता। औरतों के लिए ये मापदंड अलग होते हैं और मर्दों के लिए अलग। एक बहुत बड़ा उदाहरण मेरे पिता के घर में था।

मेरा उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर विवाह कर लेना उस परिवार के अनुसार गुनाह है, लेकिन ये नियम बेटों के लिए नहीं था…

खैर, जब तक पिता जीवित थे तब तक ही मेरा अस्तित्व उस परिवार से जुड़ा था, और सारी शिकायतें भी थीं। आज सुबह उनकी मृत्यु की खबर सुनने के बाद मेरी आँख से एक आंसू नहीं निकला क्योंकि मैं जानती हूँ कल जब तक वो शरीर में थे तब तक वहां थे। आज अशरीरी होकर मेरे पास है।

और ये बात केवल लिखने के लिए नहीं लिख रही, अपने अनुभव से लिख रही हूँ। वो एक महीना पहले ही मुझे स्वप्न में आकर अपनी मृत्यु की सूचना दे गए थे। इंदौर में कुछ रिश्तेदारों को मैंने सूचित भी कर दिया था। पापा से मिलने आना है, उनका अंतिम समय आ गया है लेकिन किस्मत में उनसे मिलना नहीं लिखा था तो नहीं जा सकी।

कल रात स्वामी ध्यान विनय को संकेत मिल गया था, रात को मुझे नींद से उठाकर गले से लगा लिया। मैं समझ नहीं सकी क्या हुआ। शायद वो भी इस संकेत को भ्रम समझकर दूर कर देना चाहते थे। लेकिन ऐसा कहाँ होता है, आज सुबह उनकी मृत्यु का समाचार उन्हें दिया तो उन्होंने यही कहा- मुझे कल रात ही आभास हो गया था।

पिता की देह को अस्पताल में दो दिन तक रखा जाएगा क्योंकि उनके सबसे बड़े सुपुत्र भारत नहीं पहुंचे हैं जो विवाह कर अमेरिका में बस गए हैं। बाकी उनके अंतिम दर्शन के लिए देश विदेश से उनके रिश्तेदार उनके पास इंदौर जा रहे हैं.. उनका दाह संस्कार होने वाला है।

लेकिन मैं जानती हूँ देह छोड़ने के साथ ही उनका उस देह से मोह ख़त्म हो गया है अब चाहे उसे जलाओ, दफनाओ, नदी में बहाओ या पारसियों की प्रथा अनुसार पक्षियों को खाने को दे दो। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अब देह के मोह से मुक्त है।

जीवन में वो इस मोह से मुक्त नहीं हो सके क्योंकि वो मेरी तरह बाग़ी नहीं थे, इसलिए अध्यात्म की उन ऊंचाइयों को भी नहीं छू पाए जितनी संभावनाएं उनमें थी। लेकिन मुझे सदैव मौन समर्थन देते रहे क्योंकि मेरे अन्दर भी संभावनाओं के उस द्वार को देख पाए वो।

आपकी आध्यात्मिक यात्रा में कुछ घटनाएं जानबूझकर ऐसी घटित होती हैं, जहां आप सामाजिक रिश्तों के मोह से ऊपर उठ सको, जिसके लिए जीवन पर्यंत आपको आरोपों के बोझ को अपनी यात्रा का हिस्सा बनाना होता है। ऐसे बहुत से आरोपों का सामान मैं अपने साथ लेकर चल रही हूँ।

प्रकृति धीरे धीरे उस बोझ को कम करके मेरी यात्रा आसान कर रही है, कुछ को जीवन से हटाकर कुछ को जीवन में वापस लाकर, क्योंकि यात्रा के दौरान जब आप रिश्तों से मुक्त हो जाते हैं तो आगे जाकर वही रिश्ते उपहार स्वरूप आपको दोबारा मिल जाते हैं।

इस जन्म के बहुत से रिश्तों से खुद को परे कर दिया, जो नहीं हो पाए उनसे रिश्ता केवल दैहिक नहीं था। पिता उनमें से एक हैं। इसलिए मेरी तड़प बार बार उनको पुकारती रही और आज वो मेरे पास अपने वास्तविक रूप में हैं, जिनसे अब मैं जब चाहे बात कर सकती हूँ। इस दौरान माँ हमेशा रूठी रही, पिछले जन्म की कुछ कड़वाहटें इस जन्म तक लादी रही वो।

कहते हैं मृत्यु के बाद सूक्ष्म काया को जिसके प्रति मोह होता है वहां मंडराती रहती है। पिता को उनकी देह से तो मोह रहा नहीं तो वो वहां तो है नहीं। जो लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए इंदौर जा रहे हैं उन्हें यहाँ मेरे पास आना चाहिए क्योंकि सूक्ष्म काया वहीं मंडराती है जिससे उसे सबसे अधिक मोह होता है… और कल रात से पापा मेरे पास है…

*********************************************
फरवरी 2015 पापा की मौत की खबर आई…
कार्डियोग्राम पर बनी धड़कनों के ग्राफ को देखा है न….
रेखा सीधी हो गयी जैसे… वैसे ही जैसे मेरे भाव… न एक स्पंदन ज़्यादा ना एक कसक कम…

छाती में पानी हिलौर मार रहा था लेकिन आँखों पर बाँध बना लिया। पानी बहा दिया तो बिजली कहाँ से बनाओगी शैफाली…

शादी के चार साल बाद गुनाह न होते हुए भी कबूल कर लिया था, अपने ही तो हैं… पैरों पर गिर पड़ोगी तो भी घर की छोटी हो तो छोटी ही रहोगी ना।

जाते से ही पापा के पैरों पर गिर पड़ी थी। माँ के चेहरे से हैरत टपक रही थी मेरी आँखों से बेतहाशा आंसू। पापा ने गले लगा लिया था। अपनी जेब में हमेशा रखे हुए मेरे फोटो को दिखाते रहे।

भाई को छूने गयी तो उसी तरह से झटक दी गयी जैसे शादी के तुरंत बाद पहली बार पिता को उनके जन्मदिन पर कुरियर से भेजा फूलों का गुलदस्ता और माफी माँगता हुआ ख़त दरवाजे से ही लौटा दिया गया था।

माँ के जन्मदिन पर अपनी फोटो फ्रेम में जड़कर यूं भेजी थी जैसे ममता को स्थूल रूप देकर आंसुओं से जड़कर दे रही हूँ। नहीं पता उस फोटो का क्या हुआ, लेकिन माँ ने देह में जड़े मेरे स्पर्श को भी नोंच फेंका था। उन्हें जब भी छुआ लगा बेटे के भय में जड़ हो गयी किसी पत्थर की मूरत को छू रही हूँ।

फिर कई सालों तक नहीं गयी। बस परिवार में किसी की मृत्यु की खबर आती तो “अंतिम दर्शन” करने चली जाती। घर की एक बुज़ुर्ग की मौत पर गयी थी। पापा बाजू के कमरे में पलंग पर आँख बंद किये लेटे थे। मैंने उन मृत बुज़ुर्ग के पास नहीं गयी। पहले पापा के पास बैठ गयी।

उनका हाथ धीरे से पकड़ा और आँखों का बाँध टूट पड़ा। पापा ने आँखें खोली। कुछ नहीं बोले। बस हम दोनों के आंसू बोलते रहे। हम क्यों नहीं मिल सकते पापा। किससे डरता है मेरा शेर? अपने ही पाले हुए लोगों से, उनसे जो आपसे आँखें मिलाने में डरते थे!!!

इतनी तड़प और इतनी कसक… फिर कैसी मजबूरी है ये? उनके पास कोई जवाब नहीं था।

मैं लौट आई यह कहते हुए कि अब किसी की मौत पर अंतिम दर्शन करने नहीं आऊँगी… अपना ही बोला हुआ सामने खड़ा था, इसलिए पापा के अंतिम दर्शन पर भी नहीं गयी। क्योंकि उनके पास तीन तीन बेटे थे, जिन पर कभी उन्हें फक्र हुआ करता था।

मैं जानती हूँ “है” कब “था” में बदल गया उन्हें खुद भी पता नहीं चला, लेकिन मुझे हर बार पता चल जाता था, जब वो सबसे छुपकर मुझसे फोन पर बात करते थे। तब भी पता चला था, जब उनकी ज़ुबान साथ छोड़ गयी थी लेकिन फोन पर उनका दुःख मुझ तक पहुँचता था।

मैं जानती थी पापा की याददाश्त साथ नहीं देती थी, फिर भी मुझसे बात करने के लिए घर से अकेले निकल पड़ते थे। मैं ऐसे समझाती थी जैसे किसी छोटे बच्चे को समझाया जाता है। पापा मैं हूँ ना हमेशा आपके साथ.. आप ऐसे अकेले मत निकला करो घर से. आप जब कहोगे मैं आपको लेने आ जाऊंगी… सबसे छीन कर ले जाऊंगी। वो नहीं मानते थे और फिर खबर मिली ऐसे ही अकेले घर से निकले थे और एक्सीडेंट हो गया… दौड़कर इंदौर गयी थी।

एक घंटे की मुलाक़ात में जीवन भर की बातें करके आ गयी थी… टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में। उन्हें बहुत अच्छा लगता था अंग्रेज़ी बोलना। मोतीतबेला की गलियों से शहर के पॉश इलाके में रहने आये भौतिक शास्त्र के प्रोफ़ेसर को अपनी यात्रा के बारे में बताया- पापा, लोग बहुत सम्मान देने लगे हैं. “माँ” कहते हैं मुझको… पापा, आपकी बेटी बहुत ऊपर की यात्रा कर चुकी है.. चलो मेरे साथ।

उनका पूरा शरीर दर्द से भरा था, उनकी तीमारदारी की जा रही थी। ये हैं उनके रिश्ते, शरीर के दर्द की तीमारदारी कर रहे थे और आत्मा को कुरेद कुरेद कर लहू लुहान।

वो अंत तक मुझे पुकारते रहे… किसी का दिल नहीं पसीजा। फिर खबर आई, चले गए वो, आओ अंतिम दर्शन करने – मैं हंस दी, मूर्खों किसके अंतिम दर्शन को जा रहे हो?? जिसके प्यासे हलक में पानी की दो बूँद नहीं डाल सके। मरते हुए जो शरीर इतना असहाय हो गया था कि किसी से यह तक नहीं कह सका कि उसे दो बूँद पानी चाहिए।

मृत्यु की खबर मिलने के अगले दिन कम्प्युटर टेबल पर रखा पानी का लौटा अचानक हवा में उठ गया। स्वामी ध्यान विनय ने लोटा वापस लेते हुए कहा ये नहीं, ये मेरा जूठा है… मैं कमरे में लेटी थी, ध्यान मेरे पास आये कहा एक ग्लास पानी भरकर डायनिंग टेबल पर रख दो।

रात बेरात उनके ऐसे किसी आदेश को मैं समझ जाती हूँ। एक ग्लास भर कर रख दिया। सुबह उठकर देखा ग्लास आधा खाली था। ध्यान ने कहा – वो पानी के लिए तरसते हुए ज़रूर गए हैं लेकिन स्थूल रूप से पानी कम होना अचंभित करता है।

मैंने कहा- आपके जैसी सिद्धि तो पाई नहीं है मैंने, मैं तो सूक्ष्म काया के परिवर्तनों को भी स्थूल में खोजती हूँ ना, मेरी तसल्ली के लिए पापा इतना तो करेंगे ही।

उस दिन उनकी देह का दाह संस्कार हुआ। जो शरीर जीवन भर मेरी जुदाई में जलता रहा। तुम लोग उसको और जला आये। दो बूँद प्रेम का छिट्टा दे दिया होता तो वो आज तरसते हुए यूं मेरे पास नहीं होते।

कहते हैं जब आप दिल से कोई प्रार्थना करते हैं तो पूरी कायनात उसको पूरा करने के लिए षडयंत्र रचती है, और मुझ पर तो प्रकृति जैसे विशेष रूप से मेहरबान है, आज तक ऐसा नहीं हुआ कि मैंने कोई प्रार्थना की हो और वो पूरी न हुई हो। कुछ प्रार्थना इस लोक में पूरी होना संभव न हो सकी तो ईश्वर ने उस लोक के नियमों के तहत पूरी की है, पिता से मिलने की प्रार्थना उन्हीं में से एक है।

सिर्फ आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, जिन दिनों प्रकृति के इस जादू से अनजान थी उन दिनों कुछ भौतिक इच्छाएं भी पूरी हो जाती थी… एक किस्सा मानो या न मानो के पांचवे भाग में…

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

मानो या ना मानो – 2 : हनुमान दर्शन

मानो या ना मानो – 3 : मुक्ति के यज्ञ में पिता ने दी आहुति

मानो या ना मानो – 5 : इच्छापूर्ति के लिए कायानाती षडयंत्र

Facebook Comments
Tags: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!