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मानो या ना मानो – 3 : मुक्ति के यज्ञ में पिता ने दी आहुति

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पिछले वर्ष जीवन एक चिलक हो गया था… चिलक जानते हो ना, पीठ की अकड़न से उठने वाली पीड़ा… भयंकर दर्द… असहनीय… ऐसा कि बस मुंह से अंतिम शब्द जो निकला था … पापा मुझे अपने पास बुला लो… बस अब नहीं जीना मुझे… मैं जीना नहीं चाहती… अपने पास बुला लो…

पापा मेरे उलटे जन्मे थे यानी पैर की तरफ से… कहते हैं जो उल्टे जन्मते हैं उनका पैर यदि चिलक से पीड़ित रोगी की पीठ पर लगा दो तो उसका यह रोग हमेशा के लिए चला जाता है…

मुझे आज तक याद नहीं कभी पापा के पैर छुए हो, या शायद उन्होंने ही कभी नहीं छुआए. हालांकि हमारे परिवार में ऐसी कोई परंपरा भी नहीं कि बेटियां पाँव नहीं छूती…

तो पापा ने गुहार नहीं सुनी, जीवन की असहनीय पीड़ा पीठ पर लादे आँखें उनको खोज रही थी, ये जानते हुए कि अब वो देह में नहीं है… होते तब भी उनका आशीर्वाद भरा हाथ पीठ पर होता, पाँव वो कभी ना लगाते…

लेकिन उस रात जैसे मेरा वजूद प्रार्थना बन गया था… या तो मेरे पास आ जाओ या मुझे अपने साथ ले जाओ… पिछले चार महीने से जिस पीड़ा को भोग रही हूँ, उससे मुक्ति चाहिए… सारे भगवान्, सारे गुरुओं से प्रार्थना कर चुकी… मेरी कोई नहीं सुनता… बस एक आखिरी उम्मीद बस आप ही है पापा….

हर बार की तरह स्वामी ध्यान विनय ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली, मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा… बेटी से इतना मोह!!! जब से देह छोड़ी है, बस देह ही छूटी, जिस बेटी से मिलने के लिए जीते जी तरसते रहे उसका प्रेम मरकर भी नहीं छूट पाया… तब से वो आप ही के पास है… उन्होंने कहा- ज़रा सर उठाकर उस कुर्सी की तरफ देखो… आंसुओं से भरी आँखों में इतना धुंधलापन था कि मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था…

स्वामी ध्यान विनय जैसी दिव्यदृष्टि नहीं पाई है जो अशरीरी लोगों को देख सकूं… लेकिन इन चार महीनों की कठिन तपस्या के दौरान भी ध्यान विनय ने अपनी दीक्षा का धर्म नहीं छोड़ा था… उठने, बैठने, खाने पीने, सोने जागने, से लेकर स्वर के अनुसार पहला कदम उठाने, स्नान करने की विधि, से लेकर देखने सुनने और बोलने तक की इतनी विद्या सिखा दी थी कि इतनी पात्रता हासिल कर सकी कि उन्हें चाहे अशरीरी रूप में देख ना सकूं, लेकिन…..

मैं घुटनों के बल घसीटते हुए जब उस कुर्सी तक पहुँची और हाथ मैंने कुर्सी पर रखा तो उनका स्पर्श पा सकी… फिर जब कभी उनको याद करती हूँ, वो अपने तरीके से अपनी उपस्थिति का एहसास करवा जाते हैं.

स्वामी ध्यान विनय के होते हुए मैं उस दिन मृत्यु के द्वार पर खड़ी थी तो कदाचित पिता की सुरक्षित बांहों को अनुभव करने के लिए ही वहां तक पहुँचाया गया था… वरना मैं पूरे ब्रह्माण्ड में खुदको अकेला अनुभव करने लगी थी…

अनवरत अश्रुधारा और उखड़ती सांस के साथ मेरी पीड़ा अपने वर्चस्व पर थी… और तब ध्यान विनय ने कहा था- उनके ही आदेश पर सब हो रहा है… उनकी ही इच्छा थी आपको इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने की, जिसके लिए उन्होंने मुझे नियुक्त किया.. और पीड़ा को भोगे बिना उससे मुक्ति नहीं मिलती “माँ”।

और उस दिन पापा मुझे मौत के मुंह से खींच लाये… उनका साथ उनका आशीर्वाद एक बार फिर नया जीवन दे गया। स्वामी ध्यान विनय की नौ साल की मेहनत जो वो मुझ पर कर रहे थे, उनकी दीक्षा रूपी यज्ञ में पिता का वो स्पर्श ही अंतिम आहुति के रूप में बचा था कदाचित, जिसके बाद लगा नहीं पूरा ब्रह्माण्ड मुझे इस पीड़ा से मुक्त करने के लिए प्रयासरत था, मैं ही अपनी आँखें बंद किये बैठी थी… और जब आँखें खुली तो सारे गुरुओं का आशीर्वाद और अस्तित्व का जादू मुझ पर बरस पड़ा।

ध्यान विनय हमेशा कहते हैं.. बहुत सारे लोगों की प्रार्थनाएं आपके साथ है। मुक्ति का मार्ग सिर्फ प्रेम ही नहीं होता, जैसे मैं कहता हूँ प्रेम करना नहीं प्रेम हो जाना है वैसे ही पीड़ा को अनुभव करने के स्थान पर पूरी तरह से पीड़ा ही हो जाओ… और जैसे प्रेम में आप अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता से भर जाते हो उसी तरह जब वो पीड़ा देता है तब भी कृतज्ञ हो जाओ कि उसने आपको इस पीड़ा के लिए चुना।

करोड़ों में कोई एक होता है जब अस्तित्व किसी को इस पीड़ा के लिए चुनता है, और आप उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हैं। और जब तक आप खुद अपने पिछले जन्मों के कर्मों की इस पीड़ा से पूरी तरह मुक्त नहीं होंगी आप दूसरों को कैसे मुक्त करेंगी जिसके लिए अस्तित्व ने आपके लिए योजना बनाई है।

उन्हीं दिनों पीड़ा में डूबकर यह कविता लिखी थी –

अंतिम निश्छल और निर्मल हंसी

वो अंतिम निश्छल और निर्मल हंसी थी उसकी
जब तक उसे पता न था
कि उसे किसी की पीड़ा के लिए
निमित्त बनना है

वो बाद में बहुत दिनों तक रोती रही
कि काश उसका बालसुलभ रुदन
निमित्त बन सके किसी की खुशी के लिए भी

लेकिन समय अंतराल के पहाड़ की
दो जन्मों सी कठिन चढ़ाई को पारकर
उस खुशी को देख पाना उसके भाग्य में नहीं था

तो वो इस जन्म की अपनी पीड़ा की बाड़
लगा आई बची हुई हंसी के चारों ओर
कि नियति फिर किसी की हंसी का
ऐसा दुरूपयोग ना कर सके

ध्यानी लोग कहते हैं
ईश्वर की योजना को क्रियान्वित करने
उसके हाथ बन सकी आप
यह सौभाग्य हज़ारों जन्मों में
किसी एक को मिलता है

वो कल्पना करती है अब
उस ईश्वर की
कि कटे हाथ के साथ
वो इतना बदसूरत भी न लगता
जितना इस सूरत से उसकी सीरत छीनकर बना दिया..

मैं नहीं जानती अस्तित्व की योजना क्या है, और मुझे क्या करना है लेकिन इन चार महीने की ध्यान की प्रक्रियाओं ने मुझे और अधिक साक्षी भाव से जीना सिखाया है। पिछले नौ वर्षों में ध्यान विनय की रोज़मर्रा के कार्यों को लेकर जिन नसीहतों के प्रति लापरवाह रही उसे और अधिक सजगता से करने लगी हूँ। योग प्राणायाम की हमारी सनातनी परंपरा और ऋषियों ने जिन नियमों को अपनी हर आती जाती सांस के साथ पालन करने की शिक्षा दी है, उसका महत्व समझने लगी हूँ।

अब बस जीवन जैसा आता है उसे जीए चले जाने का गुर मेरे गुरु स्वामी ध्यान विनय से सीख रही हूँ… ताकि पिछले जन्म के कर्मों से मुक्ति के अलावा अब इस जन्म में अपनी तरफ से कोई ऐसा कर्म न करूं जिसका क़र्ज़ चढ़ जाए।

पिता की मृत्यु के दौरान हुए अद्भुत अनुभवों को भी मैंने कलमबद्ध किया था जिसे मानो या न मानो भाग- 4 में बता रही हूँ…

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

मानो या ना मानो – 2 : हनुमान दर्शन

मानो या ना मानो – 4 : पिता के अंतिम दर्शन

 

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