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मानो या ना मानो – 2 : हनुमान दर्शन

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(यह पिछले वर्ष मुझ पर हुए आध्यात्मिक प्रयोग पर लिखी सम्पूर्ण घटना जीवन पुनर्जन्म का एक अंश भर है)

उन दिनों मैं पिछले जन्म में हुए किसी गुनाह के भय से जूझ रही थी जिससे मुक्त करने के लिए मुझ पर प्रयोग हो रहे थे। भय से मुक्ति के लिए एकमात्र साधना है हनुमान तत्व को ग्रहण करना। मैंने हनुमान साधना शुरू की, कुछ दिनों तक मैं इस भय से मुक्त रही। एक दिन सुबह-सुबह इनसे कहा मुझे हनुमान मंदिर जाना है आज…

ये हमेशा की तरह मुस्कुरा दिए, आपको हनुमान मंदिर जाने का आज ही विचार क्यों आया?

मैंने कहा – पता नहीं यूं ही…

आपको पता है आज क्या है?

नहीं… क्या है?

बूढ़ा (बुढ़वा) मंगल..

ये क्या होता है?

वो आप लौटकर इन्टरनेट पर पढ़ लीजियेगा, पहले जो आपको आदेश मिला है उसका पालन कीजिये… देखिये शायद कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा हो वहां…

Symbolic Photo

ये मुझे हनुमान मंदिर में छोड़ गए, मैं अन्दर गयी तो आरती शुरू हो गयी थी। सब लोग ज़ोर ज़ोर से ताली और घंटे बजाते हुए हनुमान चालीसा गा रहे थे। मुझे तो हनुमान चालीसा आती भी नहीं थी, जीवन में कभी कोई मंत्र, आरती, पूजा पाठ कुछ किया ही नहीं तो कहाँ से आता। गायत्री मंत्र भी बच्चों के स्कूल में सिखाया गया था तो उनको सुनते हुए आ गया।

बस आँखें बंद किये हनुमान के सामने खड़ी हो गयी… मेरे पीछे से सबकी आवाज़ें मेरे अन्दर ऐसे प्रवेश कर रही थी जैसे मेरी प्रार्थना को बल देने के लिए ही सब लोग आरती गा रहे हों। मेरी आँखों से झर-झर आंसू बह रहे थे और मन में एक ही प्रार्थना, मुक्त कर दो मुझे इस भय से… मुक्त कर दो मुझे इस भय से… प्रभु….

आरती ख़त्म हुई तो मैंने धीरे से आँखे खोली और थोड़ा सा पीछे की ओर खिसकी ताकि बाकी लोग भी आगे आकर माथा टेक सके। पीछे खिसकते समय मेरा पैर मेरे पीछे खड़े एक व्यक्ति के पैर से टकरा गया… मैंने बिना देखे ही उनसे माफी माँगी फिर आगे देखने लगी।

थोड़ा सा किनारे होकर फिर पीछे की ओर खिसकी… मुंह मेरा हनुमान की तरफ ही था… मैं फिर उसी व्यक्ति से टकरा गयी.. क्योंकि किनारे में खिसकते हुए मैंने उसके कपड़ों की हल्की सी झलक पाई थी। उसने सिंदूरी रंग का टी शर्ट पहना हुआ था। इस बार मैं पूरी तरह से किनारे हो गयी तो वो व्यक्ति आगे की ओर बढ़ गया।

उसको चलते हुए देखा तो मेरी धड़कने एकदम से तेज़ हो गयी वो ऐसे चल रहा था जैसे कोई वन मानुष या बंदर चलता है… अपने हाथ पैर चौड़े कर, पैर थोड़े से मोड़कर… मैं उसे ऐसे चलते हुए गौर से देख रही थी… उसने धीरे से गर्दन पीछे की ओर घुमाई और मुझे देख कर मुस्कुरा दिया… उसका चेहरा देखकर मैं पूरी तरह कांपने लगी… मैं कभी हनुमान की मूर्ति को देखती कभी उस आदमी की सूरत… जैसी उसकी चाल थी वैसा ही उसका मुंह… बड़े बड़े होंठ और फूली सी नाक… एकदम बन्दर नुमा चेहरा…

मैं मूर्तिवत वहीं खड़ी रह गयी… वो गर्भगृह के एक बार चक्कर लगाकर सीधे मेरे सामने खड़ा हो गया और फिर वही परिचित सी मुस्कान देकर उसी बंदरनुमा चाल के साथ बाहर निकल गया… मैंने पलटकर देखा तो वो मुझे भीड़ में फिर कहीं दिखाई नहीं दिया…

मैं वहीं धम्म से बैठ गयी और कृतज्ञता और अहोभाव से भरकर हनुमान के उस साक्षात स्वरूप को प्रणाम किया… फिर वहां दीवाल पर लिखी हनुमान चालीसा पढ़ने लगी… मुझे यकीन हो गया कि अब मैं इस भय से पूरी तरह मुक्त हो जाऊंगी…

और अंतत: भय से मुक्ति पाई… मृत्यु सदृश्य पीड़ा में मेरे स्वर्गीय पिता ने अशरीरी रूप में आकर मुझे आशीर्वाद दिया जिसको विस्तार से मानो या ना मानो की अगली कड़ी भाग – 3 में बताया है…

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

मानो या ना मानो – 3 : मुक्ति के यज्ञ में पिता ने दी आहुति

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