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मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

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इश्क़ जब उम्र का चोला सिलता है तो उसमें मिलन की झालर में लगे तुरपाई के तंतु इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि चेतना तक पैरहन के लिए लालायित हो जाती है। आप मानो या ना मानो लेकिन ये ऐसी ही इश्क़ की कहानी है कि मृत्यु के पश्चात भी वो आशिक़ से मिलने आती है, उससे बात करती है और मुझे गवाह बनाती है।

मैं नहीं जानती मैं उनके इश्क़ की कहानी के साथ कितना न्याय कर पाती हूँ, लेकिन जितना इस सत्य घटना से रूबरू हुई हूं, कृतज्ञ हूँ कि उसने मुझे चुना अपनी प्रेम कहानी को लोगों तक पहुँचाने के लिए। माँ के नव रूपों का आशीर्वाद है उस पर, तो मेरे लिए माँ ही है, लेकिन उसके पहले वो इश्क़ है और उस दुनिया के साथ इस दुनिया को जोड़े रखने के लिए मुझे माध्यम चुना है।

मेरे पास शब्द नहीं थे उसकी कहानी को माला में पिरोने के लिए, एमी माँ (अमृता प्रीतम) तो सिद्धहस्त हैं ऐसी कहानियाँ लिखने में, मैं खाली झोली फैलाए एमी माँ से प्रार्थना करती रही कि अपनी विरासत से एक मुट्ठी अक्षर मेरे नाम कर दे… मेरी कलम तुम्हारी तरह रूहानी नहीं, मुझमें संसार अधिक है, जीवन अधिक है… लेकिन फिर रूह के बिना कलम में जीवन भी कहाँ से आएगा?

शायद उसके अंदर भी मेरी तरह जीवन अधिक था, संसार अधिक था इसलिए मातारानी की कृपा होने के बावजूद वर्षा(काल्पनिक नाम) अपने सांसारिक प्रेम से मुक्त न हो सकी… चन्दन (काल्पनिक नाम) के विवाह हो जाने के बाद उसने मृत्यु को गले लगा लिया… लेकिन मौत की खबर से बेसुध होकर गिर पड़े चन्दन के रुदन की तड़प से वो जा न सकी और भव-सागर के अंतिम छोर से वापस लौट आई…

वर्षा की मौत के तीसरे दिन भी जब चन्दन सामान्य न हो सका तो एक दिन उसकी फोन की घंटी बजी…

चन्दन ने फोन नम्बर देखा तो वर्षा का था… उसे लगा शायद उसके घर से किसी ने किया होगा… उसने फोन उठाकर हलो कहा तो सामने से वर्षा की वही शहद में घुली मीठी आवाज़ सुनाई दी… – “चन्दन…”

चन्दन जो वर्षा के जाने के बाद जैसे खुद को भूल ही गया था एकदम से फिर महक उठा… “वर्षा तुम कहाँ चली गयी थी… सबने मुझे बताया कि….”

“हाँ चन्दन मैं जा चुकी हूँ… बस… तुम्हारी हालत मुझसे देखी नहीं गयी… इसलिए लौट आई हूँ…”

चन्दन को समझ नहीं आ रहा था, आवाज़ वही, बातें वही, मृत्यु का समाचार भी सही… फिर ये कौन है जो फोन पर बात कर रहा है….

लेकिन उसने चन्दन को कुछ बोलने का मौक़ा ही नहीं दिया, उसे तो बस वो सब कह डालना था जो चन्दन के विवाह के पश्चात न कह सकी थी… “मैं नहीं जाती तो वो लोग तुम्हें मार डालते या तुम्हारा बहुत अनिष्ट कर देते… और फिर तुम्हारे विवाह के बाद मेरे जीवन का कोई औचित्य ही नहीं था। मैंने तुम्हें आत्मा से अपना जीवन साथी मान लिया था.. फिर ये दुःख मुझसे देखा नहीं गया और मैंने माँ काली से कह दिया कि अब और ये दर्द सहन न कर सकूंगी मुझे अपने पास बुला ले और माँ ने बुला लिया…”

चन्दन को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था, वर्षा के जाने के बाद तो वैसे ही वह चंदन के पेड़ से बस एक ठूंठ भर रह गया था… फिर भी उसने जैसे तैसे खुद को सम्भाला और बताया – “वर्षा, मैं मजबूर था उन लोगों ने समाज के सामने मुझ पर झूठा इल्ज़ाम लगाया कि मैंने उनकी लड़की को धोखा दिया है और उनकी बेटी विवाह से पहले ही एक महीने के गर्भ से है.. वर्षा मैं तुम्हारी सौगंध खाकर… “

“नहीं चन्दन… मुझे सब पता है, जिसने तुम्हारे साथ सात जन्मों की सौगंध खाई हो, उसके सामने सौगंध खाकर अपने प्रेम को इतना छोटा न करो, तुम पर विश्वास न होता तो क्या मैं यूं मुक्ति के द्वार से लौट कर आती?”

“वर्षा, मैंने विवाह अवश्य किया है लेकिन ये सिर्फ कागज़ी विवाह है… कागज़ के चंद टुकड़ों पर किये गए हस्ताक्षर है, मैंने उसे आज तक छुआ भी नहीं, उसे कह दिया है यदि पेट में मेरा बच्चा है तो पैदा करके दिखाओ…”

“मुझसे क्या छुपा है चन्दन… “

चन्दन जब ये सारी बातें मुझे फोन पर बता रहा था तो मेरा रोम रोम सिहर रहा था, इश्क़ की बहुत सारी दास्तानें सुनी हैं, रूहानी भी, दुनियावी भी, आत्मा-परमात्मा के बहुत सारे अनुभव मेरे अपने हैं, लेकिन मैं एक ऐसे लड़के से कहानी सुन रही थी जिसको देखकर कोई नहीं कह सकता कि इस भोले भाले गाँव के लड़के पर मातारानी की इतनी कृपा है कि उसे अपने हृदय की रानी का प्रेम आशीर्वाद स्वरूप दे रखा है…

उसने मुझे बताया कि वर्षा को मरे हुए पूरे दो साल होने वाले हैं लेकिन वो आज भी उससे फोन पर बात करती है, और अधिकतर समय उसके घर में ही रहती है, वो कोई भी रूप धारण कर लेती है… अधिकतर वो एक बिल्ली के रूप में आसपास मंडराती रहती है… और जब फोन पर बात करती है तो बताती है आज इस रूप में हूँ…

मैं अचंभित थी बिल्ली सुनकर, अभी कुछ दिनों पहले ही एक सखी से वार्तालाप हुआ था, मैं उसे बता रही थी कैसे मैं एक बिल्ली के कारण आप कुछ लोगों से मायावी रूप से जुड़ी हूँ… कैसे मेरे स्वप्न में बिल्ली का दखल है… कैसे एक बिल्ली का बच्चा अक्सर मेरे आँगन में रोता हुआ घूमता है….

खैर, मैंने उससे पूछा – “तुम ये सब मुझे क्यों बता रहे हो?”

आप अपनी वेबसाइट पर ‘मानो या ना मानो‘ श्रृंखला चलाती हैं वो पढ़ा, तो लगा एक आप ही हैं जो इस बात पर विश्वास करेंगी…

ये श्रृंखला तो कुछ दिनों पहले ही शुरू की है और तुम्हें तो मैं कई महीनों से मुझे फॉलो करते देख रही हूँ…

हाँ मैं आपको कई दिनों से लगातार पढ़ रहा हूँ, आपका लिखा पढ़कर और आपको देखकर बहुत आध्यात्मिक अनुभव होता है… मैं इस समय इतना भाव विभोर हो रहा हूँ कि समझ नहीं आ रहा मैं आपको क्या कहकर पुकारूं- माँ कहूं, मैम कहूं, दीदी कहूं, गुरुमाता कहूं…

क्या फर्क पड़ता है कुछ भी पुकारो, दुनिया माँ कहती है, तुम्हें जो भाव आता हो उस नाम से पुकारो…

फिर उसे मैंने कुछ ऐसे व्यावहारिक प्रश्न पूछे उसे लगा शायद मैं उसकी बात पर विश्वास नहीं कर रही… कि फोन किसके पास रहता है, फोन तुम लगाते हो या उसका आता है, कभी वो प्रत्यक्ष रूप में दिखी या नहीं?

तब उसने कहा आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं तो मेरी माँ से फोन पर बात कीजिये वो आपको बहुत कुछ ऐसा बताएंगी कि आपको विश्वास ही नहीं आएगा कि ऐसा भी होता है…

मैं हंस दी… विश्वास? बस यही एक तत्व तो है मेरे पास जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया है, विषम से विषम परिस्थिति में भी मैंने कभी विश्वास का दामन नहीं छोड़ा… महामाया के जाल में इसी विश्वास के बल पर उलझती रही कि वो उलझाना चाह रही है तो उसके पीछे मेरा कुछ भला ही होगा, वर्ना माँ अपने बच्चों के साथ ऐसे खतरनाक खेल क्यों खेलेगी?

इसलिए शुरुआत में जब मेरी किसी पोस्ट पर चन्दन का कमेन्ट पढ़ती तो उसकी इतनी शुद्ध और क्लिष्ट हिन्दी पढ़कर लगता था मेरी मित्रसूची में जो फेक आईडीज़ की भरमार है उन्हीं में से कोई होगा तो मैंने कई महीनों तक उसका मित्रता निवेदन स्वीकार नहीं किया था…

लेकिन महामाया की योजना हम कहाँ समझ पाते हैं, जब मैंने ये सोचकर इस हफ्ते ही उसका मित्रता निवेदन स्वीकार कर लिया कि इतनी फेक आईडीज़ के साथ एक और आ भी जाएगा तो क्या फर्क पड़ने वाला है… तो तुरंत समझ आ गया कि क्या फर्क पड़ा है मेरे जीवन में… ऐसी हर घटना मुझे अन्दर तक झकझोर जाती है, मैं और अधिक साक्षीभाव से देख पाती हूँ, महामाया के जादू के प्रति अधिक कृतज्ञ हो पाती हूँ…

फिर भी जब चन्दन ने पहली बार फोन लगाया था तो मुझे यकीन ही नहीं आया था, इतनी शुद्ध हिन्दी लिखनेवाला कैसे फोन पर ऐसी देहाती भाषा में बात कर रहा है, तो मैंने उससे कहा सबसे पहले दो मिनट के लिए मुझसे Whatsapp पर वीडियो कॉल पर बात करो फिर हम आगे नॉर्मल कॉल पर बात करेंगे…

मैंने उसे वीडियो कॉल पर प्रत्यक्ष देखा फिर उसने यकीन दिलाया कि आपको मेरी बातों पर विश्वास नहीं आ रहा तो आप मेरी माँ से बात कीजिये… लेकिन मेरी एक शर्त है…

अरे शर्त!! अच्छा चलो बताओ क्या शर्त है?

नहीं पहले आप मुझसे वादा कीजिये आप शर्त मानेंगी…

अरे बिना शर्त सुने कैसे मान लूं, पहले बताओ तो…

नहीं, कुछ अवांछित न मांगूंगा आप पहले हाँ कहिये…

अमूमन मैं किसी से कोई वादा नहीं करती, जब मुझे ही अपने ही अगले पल की खबर नहीं होती तो मैं कैसे किसीसे कोई वादा कर सकती हूँ, फिर भी उसका भोलापन देखकर मुझसे ना नहीं कहा गया….

उसने कहा ठीक है फिर आप जीवनभर मुझे अपने वात्सल्य में रखेंगी…

मैं मन ही मन मुस्कुरा दी सब पर विश्वास कर लेना इस जीवन पर कभी विश्वास मत करना, मृत्यु कब आकर छल जाएगी पता ही नहीं चलेगा, न वर्षा को पता चला न तुम्हें.. लेकिन मैंने उसे यह कहा नहीं फिर उसकी माँ से लगभग दस पंद्रह मिनट फोन पर बात की…

हालांकि उनकी आंचलिक बोली में बात पूरी तरह स्पष्ट तो समझ नहीं आ रही थी लेकिन जितना भी मैं समझ सकी वो सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे..

चन्दन की माँ के साथ भी वो अदृश्य होकर बात करती है, कभी बिल्ली के रूप में तो कभी किसी अन्य रूप में, एक बार मनुष्य रूप में भी साक्षात उसे देखा है… रूप के साथ उसकी मीठी बोली की तो माँ इतनी तारीफ़ करती रही… और भी ऐसी बहुत सारी बातें माँ ने बताई जो मुझे लगता है सार्वजनिक करना वर्षा के साथ अन्याय होगा…

जब उस लोक की बातें इस लोक में सार्वजनिक होने लगती है तो उसका जादू ख़त्म होने लगता है, इसलिए मैंने चन्दन से वादा किया कि मैं कहानी लिखूँगी अवश्य लेकिन बस सांकेतिक, जैसे मैं अपने अनुभव लिखती हूँ, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि वर्षा के साथ जो तुम्हारा रिश्ता है उस पर कोई आंच आए, या खबरी चैनलों की बाढ़ के कारण तुम्हारा उस जगत से नाता टूट जाए…

बहुत खुश किस्मत होते हैं ऐसे लोग जिन्हें ऐसे रूहानी रिश्ते नसीब होते हैं, वर्ना भूत प्रेत की मनगढ़त कहानियों और अंधविश्वासों के पीछे इस संसार का उस लोक से रिश्ता ख़त्म सा होता जा रहा है जिसे सनातन काल से हमारे तपस्वियों ने संभालकर रखा है…

चन्दन का भोलापन और पिछले जन्मों की उसकी तपस्या ही होगी जो उसे ऐसा प्रेम नसीब हुआ… चन्दन की माँ से भी यही कहा – माँ, ज़रूर आप लोगों से उससे पिछले जन्म का रिश्ता है तभी तो वो आपकी इतनी सेवा कर रही है… कभी अदृश्य रूप में आपके पाँव दबा जाती है, कभी आपसे वादा करती है कि आप पर भौतिक रूप से कभी संसाधनों की कमी वो नहीं आने देगी…

और चन्दन से कहा यह तुम्हारे सरल हृदय और चन्दन से गुणों का ही प्रताप है कि हर मंगलवार, बृहस्पति और शनिवार को वह तुम्हारे घर की छत पर पीले चन्दन की वर्षा करती है… बस तुम ऐसे ही प्रेम के चन्दन के साथ महकते रहो ये मेरा आशीर्वाद है…. (छत पर होने वाली चन्दन की बारिश के फोटो भी उसने दिए जिसे डाउनलोड करने की एक दो कोशिश के बाद भी वो डाउनलोड नहीं हुए तो मैंने उसे भी प्रकाशित करने का इरादा छोड़ दिया हालाँकि स्क्रीन शॉट ले सकती थी लेकिन फिर मन नहीं माना)…

अंत में चन्दन ने पत्नी के बारे में बताया कि विवाह के बाद जब चन्दन ने उसे छूने से मना कर दिया तो आठ महीने बाद पिता से मिलने के बहाने जो वो घर छोड़कर गयी तो आजतक नहीं लौटी, न ही उसने कोई खबर ली, जब आत्मा से ही कोई रिश्ता उससे नहीं था तो साथ रहकर भी क्या मिल जाता… और जिससे आत्मा से रिश्ता होता है वो मृत्यु के बाद भी वर्षा की तरह लौट आती है… वो कागज़ी रिश्ता हमारे प्रेम की चन्दन वर्षा में भीगकर बिखर गया…

चन्दन ने बताया कि बचपन से ही माँ का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था वर्षा को, उस पर माता अवतरित होती थीं, उसकी भाभी ने आठ हाथों के साथ साक्षात देखा है… कई लोगों के मन में प्रश्न जागेगा कि आठ हाथों की तो हमारी कल्पना है, माँ तो मात्र ऊर्जा रूप में होती है उसे प्रत्यक्ष कैसे देखा जा सकता है, तो जहाँ तक मेरा अनुभव कहता है यूं तो ईश्वर कण कण में व्याप्त है आप जहाँ देखेंगे उसी का रूप है लेकिन जिन लोगों ने ईश्वर की कल्पना जिस रूप में की होती है दर्शन उन्हें उसी रूप में उपलब्ध होते हैं… जैसे मैंने हनुमान तत्व के साक्षात वानर रूपी मानव के रूप में दर्शन पाए थे जिसका ज़िक्र मैंने अपने पुनर्जन्म की कथा और यहाँ मानो या ना मानो के भाग 2 में किया है…

चन्दन आज भी कहता है मैं अपनी और वर्षा के बीच हुई बात का आपको साक्षी बना सकता हूँ, आप बोल न सकेंगी लेकिन हम दोनों को बात करते सुन सकेंगी…

मैंने यह कह कर मना कर दिया ये प्रेम से भरी दो चेतनाओं के मिलन स्थल पर जाकर उनके निजता में बाधा उत्पन्न करने जैसा होगा… मैं हमेशा कहती हूँ कि मुझे मेरा एकांत प्रिय है जैसे प्रिय से मिलना एकांत में, तो मैं किसी और के एकांत में भी दखल नहीं देना चाहूंगी… माँ ने मुझे इस कहानी का साक्षी बनाया उतना ही काफी है… वैसे भी यह दुनिया जितनी रहस्यमय रहे उसका जादू बना रहता है, जितनी बात उजागर होती है जादू टूटने लगता है..

लेकिन वो नहीं माना, एक दिन अचानक उसका सन्देश आया मैं फोन लगा रहा हूँ आप तुरंत उठाइये और सिर्फ सुनिए… उसने कुछ कहने का मौका नहीं दिया और तुरंत फोन लगाया, कुछ दो चार बातें ही उन दोनों के बीच की सुन पाई थी कि फोन कट गया, फिर उसका कई बार फोन आया लेकिन मेरे फोन उठाने पर उसकी आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुँच रही थी… उसके बाद आज की तारीख तक उससे कोई संवाद नहीं हुआ है…

ये कल शुक्रवार की बात है तब तक मैं काफी कुछ इस घटना पर लिख चुकी थी और उसके अलावा भी मेरे साथ हुए कुछ अन्य परालौकिक अनुभवों को संकलित कर चुकी थी, बस काम था लेख के अनुसार चित्र खोजना और वेबसाइट पर अपलोड करना, कि आज शनिवार सुबह सुबह मेरे कम्प्युटर के माउस ने काम करना बंद कर दिया, उसके बाद वेबसाइट ने लॉग इन लॉग आउट की समस्या शुरू कर दी…

आ रहे अवधानों को मैं समझ रही थी, ऐसे में अंतिम उपाय के लिए ध्यान बाबा के शरण में ही जाना पड़ता है… सबसे पहले तो माउस देखा तो वो पूरी तरह से अन्दर तक जल चुका था… उन्होंने अपने सिस्टम का माउस मेरे सिस्टम में लगाया फिर वेबसाइट में आई तकनीकी समस्या को ठीक किया… लेकिन आज शाम तक इसे अपलोड करने में लगातार समस्या आती ही रही… इस बीच ब्राउज़र पूरी तरह तांडव नृत्य दिखाता रहा, एक जगह स्थिर नहीं हो रहा था, कम्प्युटर कम से कम पांच छः बार अपने आप बंद हो गया और पिछली सारी मेहनत पर पानी फिर गया, फिर इसे शुरू से अपलोड करना पड़ा….

इधर मैं इसे अपलोड कर रही हूँ और उधर ध्यान बाबा घर में घुस आए सांप को बाहर निकालने में जूझ रहे हैं…

इसे आप संयोग कहकर ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन मेरे लिए यह एक संकेत था… और फिर उसे मैंने उन दोनों की बात सुनाने के लिए मना भी कर दिया था… लेकिन उसके अति उत्साह के कारण वो संयम न रख सका… कुछ बातें प्रकट न हो तो ही अच्छा है… होता है जादू बस यह संकेत मान लीजिये लेकिन उसको जानने की यात्रा सबकी अपनी व्यक्तिगत और रहस्यमयी होती है… उस दुनिया के भी कुछ नियम होते हैं जिसे तोड़ने की आज्ञा किसी को नहीं होती…

उससे अंतिम सम्वाद जब हुआ था उसने पूछा था – आप अपने बारे में कुछ नहीं बताएंगी, मैंने कहा नहीं… मैं तुम्हारी इस कहानी से अधिक अविश्वसनीय हूँ… मुझसे आप रिश्ता रख सकते हैं, भावनाएं जोड़ सकते हैं… मुझे जान न सकेंगे… मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की….

– माँ जीवन शैफाली

मानो या ना मानो – 2 : हनुमान दर्शन

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