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मानो या ना मानो : उसे जिसको चुनना होता है, वो चुन लेती है

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कस्तूरी बहुत परेशान थी किस से कहे अपने मन की बात, कि तभी मकान मालकिन की बहू आयी। वो कलकत्ता से आई हुई थी। उनके परिवार में किसी की मृत्यु होने पर गरुड़ पुराण चल रहा था। वो कस्तूरी को भी बताने आयी थी।

थोड़ा बैठी तो कस्तूरी रो पड़ी। कस्तूरी ने प्रेम विवाह किया था तो परिवार वाले नाराज थे उनका तो कोई सपोर्ट था नहीं। और उसके पति का बॉस उस पर बुरी नज़रें गड़ाए था।

उसके पति राजेन्द्र एक सीमेंट फेक्ट्री में चीफ केमिस्ट की पोस्ट पर थे। उनके बॉस मिस्टर गर्ग कस्तूरी पर भी कम्पनी को PRO के रूप में जॉइन करने पर दबाव डाल रहे थे। साथ ही वो चाहते थे कि जंगल में  बनी हुई फेक्ट्री में क्वार्टर बनवा दिए जाएं तो कुछ परिवार वहां शिफ्ट हो जाएंगे।

शुरू में कस्तूरी और राजेंद्र में हामी भर दी क्योंकि गर्ग परिवार भी वहां रहने वाला था साथ ही अकाउंट्स वाले का परिवार भी। साथ ही असम से आये मजदूर तो थे ही।

तो पहले ये बताया गया था कि मजदूरों के भी परिवार वहां रहेंगे जब कमरे तैयार हो जाएंगे तो मज़दूर परिवार लेकर आएंगे।

कस्तूरी जंगल में रहने को तैयार थी, पर पता नहीं उसको मिस्टर गर्ग की कंजी आँखें कभी पसन्द नहीं आती थीं वो हमेशा उसको घूरते थे।

वो जब फेक्ट्री गयी तो देखा मजदूरों के कमरे में रसोई घर की व्यवस्था नहीं बन रही थी। कहा गया सबके लिए मेस रहेगा और अभी उनको पत्नियां लाने की इजाजत नहीं है। खैर कस्तूरी ने सोचा गर्ग परिवार और अकाउंट्स वाले 2 परिवार की स्त्रियां तो रहेंगी।

पर जब दोबारा गयी तो देखा कि सिर्फ एक फ्लैट बन कर तैयार हुआ था जिसमें पीछे भी एक दरवाजा था और एक अलग कमरा। उसको गर्ग साहब ने कहा कि ये फ्लेट तुम लोगों के लिए है और पीछे का कमरा मेरा रहेगा, कभी रात बे रात ज़रूरत पड़ जाए और मैं फेक्ट्री में लेट हो जाऊं तो यहीं रुक जाऊंगा। मेरा परिवार अभी शिफ्ट नहीं हो सकेगा क्योंकि भाई की पत्नी के बच्चे छोटे हैं बहुत, उसको मेरी पत्नी की ज़रूरत है।

कस्तूरी का यकीन पुख्ता हो गया कि ये गर्ग की चाल है। वो परेशान थी उसके पति राजेन्द्र अगर नौकरी छोड़े तो घर कैसे चलेगा और नई नौकरी का इंतज़ाम कैसे हो।

उसने जगदम्बा को पुकारा .. हे माँ
हे कुलदेवी माँ भगवती मदद करो।

और मकान मालकिन की बहू तभी उसको बुलाने आयी थी। उसको परेशान देख कर बोली – जो पंडित जी गरुड़ पुराण कर रहे हैं तुम उनसे बात करो।

कस्तूरी ने पंडित जी के सामने व्यथा रखी। पंडित जी ने तुरन्त कहा बिटिया माँ बगलामुखी को पुकारो… वो तुम्हारी मदद करेंगी। मैं अनुष्ठान कर देता पर सुबह मैं किसी और के अनुष्ठान में वचनबद्ध हूँ और शाम को ये गरुड़ पुराण। तुम्हे स्वयं करना होगा।

किताब मेरे पास है तुम्हे समझा दूंगा कैसे करना है पर तस्वीर का इंतजाम कैसे होगा नहीं जानता।

कस्तूरी ने कहा मैं अजमेर जाऊंगी वहां देखूंगी। तो पंडित जी बोले बेटा वो तस्वीर सिर्फ दतिया में मिलती है वहीं उनका सिद्धपीठ है।

कस्तूरी ने पूरी रात माँ को पुकारते बिताई बिना तस्वीर अनुष्ठान कैसे हो।

फिर उसको किसी काम से अचानक अजमेर आना पड़ा।

बजरंग गढ़ की सीढ़ियां चढ़ते उन दोनों पति पत्नी को अचानक राजेन्द्र के फिज़िक्स के शर्मा सर किनारे की दीवार पर बैठे दिखे। दोनों ने प्रणाम करके पैर छुए तो चर्चा चली ग्वालियर की। क्योंकि वो सर ग्वालियर के थे। कस्तूरी ने पूछा सर ग्वालियर से दतिया जाना है वहां से माई की तस्वीर लानी है बहुत ज़रूरी है मेरे लिए।

शर्मा सर की आंखों में आंसू आ गए, तुरन्त हाथ के थैले में से एक किताब, तस्वीर और माला निकाली और कस्तूरी को पकड़ा दी। बोले – मैं हर बार दतिया जाता हूँ इस बार गया तो ये पुजारी जी ने दिया। मैंने कहा मेरे पास तो है, उन्होंने कहा इसको लेने वाली स्वयं तुम्हारे पास पहुँच जाएगी, ये तुम्हारे लिए नहीं है।

तीन दिन से रोज़ यहां आकर बैठ जाता हूँ कि कौन आकर लेकर जाएगा इसको। आज तुम आयी तो पता चला ये तुम्हारे लिए चल कर आई थी।

कस्तूरी माई की तस्वीर से लिपट कर रो पड़ी।

जैसा उसको बताया गया था उसने उनकी पूजा की। और अपनी प्रार्थना कह दी।

मिस्टर गर्ग को जब पता लगा कि कस्तूरी और राजेंद्र फ्लेट में शिफ्ट नहीं हो रहे तो उन्होंने पहले राजेन्द्र को प्रताड़ित किया और धमकी दी फ्लेट की कीमत उसकी सेलेरी में से हर महीने काटने की।

राजेन्द्र और कस्तूरी डरे नहीं और फिर पंडित जी से मिले। क्योंकि सरकारी नौकरी का फार्म भरने राजेन्द्र को अजमेर आना था और गर्ग साहब छुट्टी नहीं दे रहे थे।

11 मई फॉर्म भरने का आखिरी दिन था और 9 मई तक गर्ग ने छुट्टी की अर्जी पर दस्तखत नहीं किये।

पंडित जी ने कहा – बिटिया जाओ शाम 5 बजे वो दस्तखत कर देगा।

पर पंडित जी वो तो आज बीकानेर से असम जा रहा अब वो फैक्ट्री नहीं आएगा 2 महीने।

मैं नहीं जानता, माई लाएगी कैसे लाएगी ये उसका काम।

और शाम 4.30 पर गर्ग की कार फैक्ट्री में घुसी कोई फाइल की तलाश में। राजेंद्र ने अपनी अर्जी पकड़ाई साथ में इस्तीफा भी और रवाना हो गया अजमेर के लिए।

जब सरकारी नौकरी का फार्म भर कर लौटा तो गर्ग मनाने आया कि जैसा चाहोगे वैसे होगा। मत रहना फ्लेट में।

पर दोनों ने हाथ जोड़ दिए।

आज तक माई की वो तस्वीर कस्तूरी के साथ है। खुद चल कर जो आयी थी माई।

– शालिनी गौड़ द्वारा लिखित एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी

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