Menu

मानो या ना मानो : ऊपरी हवा का टोना और अंतर की आस्था का जादू

0 Comments


आज आपबीती लिखने जा रहा हूँ। कुछ ऐसी घटनाएं जो जीवन में सबक बन कर आती हैं और आप किंकर्तव्यविमूढ हो जाते हैं कि आगे का मार्ग क्या हो?

लगभग 27-28 सितम्बर से यह सब आरम्भ हुआ। मुझे यह अनुभूति होती कि मुझे बुखार रहता है.. और दिन में तीन-चार बार हथेली से स्वेद भी झरता..! मेरा स्वभाव है कि यदि मुझे तनिक अस्वस्थता भी होती है तो मैं घर में भी नहीं कहता। लगभग 10 दिन यह चलता रहा। परन्तु रोग के अन्य लक्षण भी उभरने लगे थे, जब भी मैं गुरुदेव, श्री विष्णु भगवान तथा घर के मंदिर में पूजा करने भी जाता तो मस्तिष्क में अपशब्द ही अपशब्द के विचार आते।

बहुत विस्मित होता जब गुरुमन्त्र का मानसिक जप करते हुए वह स्थिति नहीं रहती थी, हां जप के आरम्भ में कठिनाई अवश्य होती किन्तु युद्ध में हृदय की विजय अवश्य होती। तीन चार दिन तो स्वंय पर संयम रखा फिर मैंने यह विचार किया कि ये अपशब्द मेरे हृदय के भाव नहीं हैं अपितु अन्य कोई ठीक उसी समय आकर बलपूर्वक डाल देता है। जीवन में कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं हुआ था, अपितु मैं तो किशोरवय होते-होते घनघोर रात्रि में भी रामकृपा से ‘अभय’ हुआ करता था और आज भी हूँ।

धीरे-धीरे घर के मंदिर में पूजन भी छूट गया क्योंकि जब मैं ईश्वर के स्वरूप को अपशब्द कह रहा हूँ तब मुझे उनके पूजन करने का क्या अधिकार? सो मन में बड़ी ग्लानि हुई तो सभी स्वरूप से क्षमा मांगकर पूजन छोड़ दिया। किन्तु गुरु ने जो क्रिया और मन्त्र प्रतिदिन अपरिहार्य कर रखे थे, मैं अक्षरशः उनके आदेश का पालन करता रहा। उसमें कोई अंगिढीली नहीं की।

अब फिर जप करने का स्थान भी परिवर्तित हो गया। साथ ही हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का नित्य पाठ भी मतिभ्रम के कारण छूट गया।

तब पूर्णिया के एक चिकित्सक श्रीमान चन्दन कुमार सिंह से स्वंय को दिखवाया। उन्होंने टायफायड और मलेरिया दोनों टेस्ट करवाकर देख लिया- जाँच में दोनों ही निगेटिव निकले। डॉक्टर साहब से खूब तर्क-वितर्क हुआ। उन्होंने कहा- आपको बुखार नहीं है। फिर उन्होंने दस दिनों का बुखार चार्ट बनाकर लाने कहा। साथ में कुछ गैस और पेट की सामान्य गोलियां लिख दी।

हृदय में यह भाव आता कि एक बार गुरु जी से संवाद किया जाए लेकिन यह क्या? गुरु जी का स्मरण करते ही जो अपशब्द आते उससे मन ही मन बहुत पीड़ा होती! करूँ तो क्या करूँ? अक्टूबर पार हो चुका था।

तीन दिन पश्चात एक स्वप्न आता है, संयोग से जागते ही स्वप्न को लिख कर सहेज लिया था।

“मैं अपनी समस्या लेकर एक दिव्य, तेजस्वी सफेद वस्त्र धारण किये हुए व्यक्ति के पास जाता हूँ जो गायत्री के बड़े उपासक हैं।

फिर संवाद के बीच में ही उस व्यक्ति के स्थान पर गुरु जी प्रकट होते हैं, वह कहते हैं कि भाग कहाँ रहे हो? नहीं भागने देंगे.. गुरु से बड़ा कोई नहीं होता, हम तो आपका हाथ पकड़ के खींच लेंगे। सब ठीक होगा।

फिर आपसे मिलने पैदल ही जा रहा हूँ तो रास्ते में पानी है, उस पानी की परवाह न करते हुए आगे बढ़ जाता हूँ। और फिर सोचता हूँ मुझे गुरु के पास जाना है। जब पानी में पार करता रहता हूँ तो मेरे जूते चमड़े के रहते हैं और पानी पार करते ही सफेद स्पोर्ट्स शू हो जाते हैं। इतने में नींद खुल जाती है ।

समय- 05:49 ” शनिवार 3/11

दूसरा स्वप्न –

“मैं स्वप्न देखता हूँ कि अपने सहायक के साथ बाइक से पाकिस्तान चला गया हूँ, वहां की सेना हमें पकड़ लेती है। लेकिन मेरे साथ बड़ा ही मित्रवत व्यवहार करती है, पूछताछ के नाम पर भी कोई कष्ट नहीं देती। पाकिस्तानी मुझ को वैष्णव जानकर आदरसहित दो रोटी और दूध खाने को देती है। वस्तुस्थिति जानकर भारत भेजने का राजनयिक प्रबन्ध भी करती है। इतने में बलशाली एक श्वेत त्रिपुंड किये शिवभक्त आता है उसे भी सैनिक दूध रोटी देते हैं।

स्वप्न समाप्त हो जाता है।

5:50” – रविवार 04/11

गुरु जी जब स्वप्न में बुला रहे हैं तो यह मेरे लिए अवसर है, जीवन में यह प्रथम अवसर था जब बिना आदेश के धनतेरस के दिन ही गुरु जी के यहाँ पहुँचा।

गुरु जी ने देखते ही कहा- क्या हुआ आप एब्नार्मल दिख रहे हैं। जो समस्या थी वह बता दी। मैंने उन्हें स्वप्न भी कह सुनाया। उन्होंने कहा- जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब स्वंय की दृष्टि में व्यक्ति स्वंय को कभी सही और कभी गलत पाता है, यहां तक कि मैं भी अछूता नहीं हूँ। प्रायः जीव द्वैत भावसे जीता है।

चूँकि ब्रह्मांड के सभी शब्द ॐ कार से बने हैं तो आपके अपशब्द मेरे लिए ॐ हैं। इसीलिए आप दुःखी न हों।

मैंने पूछा- गुरुजी, क्या यह तंत्र वार है?

उन्होंने कहा- किसी का किया हुआ अवश्य है (उन्होंने नाम नहीं बताया किन्तु मुस्कुरा दिये) लेकिन वह आपके शरीर को छू भी नहीं पाया, ऊपरी हवा-बिहार खूब दिया.. सट न सका। और जब हम स्वप्न में आपका हाथ पकड़ लिये तब फिर शेष क्या रहा? चिंता मत कीजिये।

उन्होंने उपचार बता दिया। रामकृपा से घर आकर नियत समय पर उपचार भी हो गया और मैं स्वस्थ भी हो गया। मानसिक रूप से सामान्य भी हो गया तथा उस द्वेषी का नाम भी ज्ञात हुआ जिसने यह किया। लेकिन हम प्रतिक्रिया नहीं देते, प्रकृति पर छोड़ देने का स्वभाव है। वैसे भी मरे हुए को क्या मारें.. ? काल एक दिन सबको ग्रास लेता है। भटकते रहने की नियति जिसकी तय है उसको क्या दंड देना?

(मस्तिष्क स्थिर हुआ तो ज्ञात हुआ कि मेरे शरीर का तापमान एक जैसा रहता है अपितु हथेलियां ही ठंडी होकर त्वचा को स्पर्श करके मेरी तन्त्रिका तंत्र को बुखार होने का संदेश भेजती हैं ।)

कवच अभेद विप्र गुर पूजा ।
एहि सम मिलि उपाय न दूजा।

– मनीष सिंह

मानो या ना मानो -1 : चन्दन-वर्षा

Facebook Comments
Tags: ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!