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मैं दीपक… तुम ज्योति…

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दीपक अंधेरे में बैठता है… ज्योति ढिंढोरा पीट आती है दूर तलक…… कि वहाँ कोने में, अंधेरे में दीपक रखा है. जैसे चाँद सुन्दर इसलिये है कि चाँदनी खबर लाती है.

दीपक को व्याकरण ने ‘पुल्लिंग’ रखा है, ज्योति को ‘स्त्रीलिंग’. वैसे ही चाँद भी ‘पुल्लिंग’ की कतार में खड़ा होता है पर चाँदनी ….. ‘स्त्रीलिंग’ की कतार में.

पुरुष हमेशा गौण है और उसकी स्त्री हमेशा मुखर. “स्त्री” जो उस “पुरुष” से ही आ रही है. संसार से संवाद है मेरी “स्त्री” जिसका बीज मुझ (पुरुष) में ही है. “अभिव्यक्ति” है स्त्री, पुरुष है “मौन”.

मजाक की सीरियसनेस ठीक वैसे ही है, जैसे मौन की आवाज. जीवन की छोटी छोटी बातें बहुत बडा संदेश देती हैं.

ऊपर व्याकरण का जिक्र इस विश्वास के साथ किया कि हिन्दी पूरी तरह से एक वैज्ञानिक भाषा है. विद्वज्जन कहते हैं कि देवनागरी के एक एक अक्षर अपने भीतर किसी मंत्र की ऊर्जा समेटे हुये है. हिन्दी भाषा के अन्दर छुपा हुआ गणित भी मैं देखता हूँ. फिर यकीन हो जाता है इसकी वैज्ञानिकता पर.

चलिये “दीपक” और “ज्योति” पर बात करते हैं– जहाँ से आज की बात शुरू हुई थी……

……. दीपक जलाता है, अपने भीतर का तेल. आग की तपिश को जीता है- मौन रहकर. नीचे अंधेरे में रखता है अपने पैर…. या यूँ कहें कि उसके नीचे का अंधकार ही प्रमाण है– उसके जलते होने का और उसके अपने होने का.

हे पुरुष! तुम जलना हमेशा, मौन … तपना हमेशा आग में, ताकि तुम्हारी ज्योति (स्त्री) अभिव्यक्ति बनकर संसार को रोशन करे. तुम अपनी लौ पर इतराना…. अँधेरे को पी जाना, अपना तेल जलाना और संसार को रोशन करना अपनी स्त्री से.

वैसे ही जीवन में कहीं भी ‘प्रेम’ से मिलो, तो तर्क में मत उलझना, बस साथ हो लेना

सबूत और साक्ष्यों के आधार पर अदालत चलती है. फिर उसी बुनियाद पर नाप तौल कर फैसले भी सुनाती है. अदालत अपाहिज है बिना तर्क के, बिना सबूत और साक्ष्य के.

तर्क, साक्ष्य और सबूत अदालत द्वारा उपयोग में लाये जाते हैं, क्योंकि अदालत की विषय वस्तु है – विवाद.

विवाद और संशय तर्क, साक्ष्य और सबूतों के सहारे चलते हैं. इसके बाद परिणाम आ जाने पर भी विवाद और संशय समाप्त नहीं होता है. बस संशय का एक पक्ष बली हो जाता है और दूसरा कमजोर.

पर ….. प्रेम, परमात्मा और अस्तित्व की गति साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर नहीं चलते. ठिगने हैं सारे साक्ष्य, सबूत और तर्क इनके आगे. ये विवाद की बात ही नहीं करते. ये अपने आप में ही साक्ष्य हैं. ये पचा लेते हैं – दोनों तर्कों को. इनका नकार (यदि कभी दिखता हो) भी स्वीकार की अति ही है.

ये अदालत के मोहताज नहीं. प्रेम, परमात्मा और अस्तित्व झूठ और सच की परिभाषाओं में नहीं उलझते. क्यों??

क्योंकि झूठ के केन्द्र में भी यही है और सच के केन्द्र में भी यही. तभी मैं बाध्य हो जाता हूँ, ये कहने के लिये — कि ये है “परम सत्य”.

एक बात कहूँ ?? जीवन में कहीं भी “प्रेम” से मिलो.. तो तर्क में मत उलझना. साथ हो लेना… बस. जीवन में एक क्षण को भी परमात्मा का भास हो, तो डुबा देना अपना भूत, भविष्य और वर्तमान उसी एक “क्षण” में.

उसका बरस जाना फिर सारे संशय को निमज्जित कर जाता है. फिर क्या साकार और क्या निराकार. दोनों पर्याय ही हो जाते हैं एक दूसरे के. फिर मंदिर ही भगवान और भगवान ही मंदिर हो जाता है. और एक राज की बात कहूँ…… फिर “माँ” ही “पुत्र” और “पुत्र” ही “माँ” हो जाता है.

तुम भी कर देना प्रेम को परिभाषाओं से मुक्त…. अस्तित्व के साथ हो लेना….. “जीवन” हो जाना………. बस.

– कुंवर शक्तिनाथ ‘संगम’

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