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सारे नियम तोड़ दो, नियम पे चलना छोड़ दो

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कोटा की कोचिंग ने जब मेरी ज़िंदगी की लगानी शुरू की तो मेरे अंदर अध्यात्म जाग गया और मैं ढूंढने लगी किसी गुरु को जो मुझे शरण में ले और दुनिया के मोह-माया से आजाद करवाये. कोटा में हर दूसरा बच्चा प्रेशर में इतना पक कर गुलगुला हो चुका होता कि पढ़ाई के लिये दिल कड़ा करने की क्षमता जाती रहती.

ऐसे में बाकी बच्चे दिल को सांत्वना देने के लिये सायबर कैफे में घुस कर “3 idiots” जैसी कोई फ़िल्म देख रहे होते. पर मैं खुद को ज्यादा गम्भीर मानती थी तो मैंने अध्यात्म का सहारा लेने का सोचा.

ढूंढते हुये पहुँच गयी एक डॉक्टर दम्पति के पास जो श्री श्री रविशंकर के अनुयायी थे. दोनों मुझे देख कर बड़े खुश हुये कि दुनिया इतनी बदल रही है, कि उनके गुरु का महिमा इतनी फैल रही है, कि ग्यारवीं में पढ़ने वाली बच्ची भी उनके शरण में आ रही है. उन्होंने मुझे अच्छा नाश्ता करवाया, दो गिलास शरबत दिया और अगले रविवार से आने के लिये कहा.

अगले रविवार जब मैं पहुँची तो सामने का दरवाजा बंद था. मैं तीन-चार मिनट देर थी. डोरबेल बजाया तो कोई रिस्पॉन्स नहीं. फिर से बजाया. उसके बाद फिर से. पर फिर भी कोई नहीं आया. दरवाजे पर कान लगाने पर अंदर से एक भीड़ के गाने की आवाज आ रही थी. कोई बीस लोग होंगे. अब मेरा टेम्पर चढ़ गया. मैं शहर के एक कोने से दूसरे तक आयी थी डेढ़ सौ खर्च करके और ये गधे दरवाजे तक नहीं आ रहे थे. चिढ़ कर मैंने लगातार डोरबेल बजाना शुरू कर दिया. सुनने पर लगा कि अब इनके गाने का सुर-ताल बिगड़ रहा था. लोग अंदर परेशान हो रहे थे.

बीस मिनट बाद मैं थक कर बैठ गयी. पानी पीकर और पांच मिनट आराम कर के फिर डोरबेल पर हमला कर दिया. अगले पन्द्रह मिनट यह सिलसिला चलता रहा कि मेरे पीछे से एक लड़का आया और वह दूसरे छोर पर दरवाजा खोल कर एक गलियारे में घुस गया.

मैं भी उसके पीछे चल दी और हम पहुँच गये उस हॉल में जहाँ लोग ढोल-मंजीरे के साथ दरी पर बैठे थे और श्वेत वस्त्र में सिंहासन नुमा कुर्सी पर विराजमान उस दम्पति की बातें सुन रहे थे. सभी मुझ से काफी बड़े थे और उनकी शक्ल से लगा कि मुझ से चिढ़े हुये भी.

जब वह सेशन खत्म हुआ तो मेरे बगल वाले बूढ़े ने गुस्से से कहा, “लड़की तेरी वजह से आज की पूरी क्लास खराब हो गयी.”

बाकी लोगों ने भी हाँ में हाँ मिलायी और मुझे गुस्से से घूरा, “हाँ इसकी वजह से दो मिनट ध्यान केंद्रित नहीं कर पायी मैं” एक बोली. दूसरे ने कहा,”सिर में दर्द हो गया मेरे.”

मैंने पलटकर पूछा ,” तो आपलोगों ने दरवाजा क्यों नहीं खोला?”

“क्योंकि एक बार क्लास शुरू करने के बाद हम उठते नहीं हैं. ” उस डॉक्टरनी ने समझाया, “गुरुजी ने ऐसा करने से मना किया है.”

“आपने अपनी एक पूरी क्लास खराब करवा ली मुझसे, एक नियम की वजह से जोकि हर सिचुएशन में सही भी नहीं है. मेरे बजाय अगर कोई ऐसा इंसान होता जिसे मदद चाहिये या कोई इमरजेंसी पेशेंट तो?”

“अरे अभी आप नये हो इसीलिये समझ नही रहे. बच्ची भी तो हो. नियम थोड़े ना तोड़ सकते हैं,” डॉक्टर ने खिसियानी हँसी से समझाया. मैं फिर से शरबत पीकर वापस आ गयी पर वह लॉजिक मुझे बिल्कुल पल्ले नहीं पड़ी कि दो मिनट के काम के लिये इंसान पैतालीस मिनट अपनी क्यों लगवाये?

इसीलिये मैं दुबारा उधर गयी ही नहीं. खैर मुझे दूसरा यूथ कैम्प मिल गया Art of living का जहाँ लम्बी दाढ़ी वाले गुरु नियम को जान पर बन आने तक follow करने के चक्कर में नहीं रहते थे.

इतने सालों बाद इतने सारे मानसिक रोग के मामले देखने के बाद मैं एक निष्कर्ष यह दावे के साथ दे सकती हूँ कि सिर्फ दुःख या संघर्ष की वजह से ही लोग मानसिक बीमारियों के चपेट में नहीं आते. दुःख और समस्या तो हर इंसान के पास आती ही है, पर जो जिंदगी में अपने नियम और सोच को लेकर flexible नहीं होते फँसते सबसे ज्यादा वही है. जैसे उन बीस लोगों ने अपनी जड़ता की वजह से पैंतालिस मिनट बर्बाद जाने दिया वैसे ही लोग अपनी जड़ता की वजह से सालों बर्बाद करते हैं.

मेरा एक क्लाइंट आज डिप्रेशन में भर्ती है अस्पताल में क्योंकि ज़िद IAS की थी और दो बार से IFS मिल रहा है. एक लड़की हाथ काट रही है क्योंकि ज़िद है कि तीन साल पहले खोये हुये प्यार को पाना ही है.

Intelligence की कई परिभाषा है मनोविज्ञान में, पर मेरा वाला फेवरिट है एक ‘भौतिकविज्ञानी’ का दिया हुआ, Stephen Hawking का :
Intelligence is the ability to adapt to changes..

– मेघा मैत्रेयी

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