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मुझे बरबाद करने की फ़िराक में ये आदमी

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ज़िंदगी में पहली बार काम-धाम के बारे में तब सोचा, जब बड़े राजकुमार चिरंजीव ज्योतिर्मय जी के हमारे घर आने के संकेत मिले…. सोचा और सफलतापूर्वक शुरू हो गया… पर अब एक आदमी मुझे बरबाद करने की फ़िराक में है….

फिर छोटे राजकुमार चिरंजीव गीत के आने से पहले, परिवार बढ़ने की आहट पा, ज़िंदगी की पहली नौकरी छोड़ी, और बेहतर पैकेज वाली ज्वाइन कर ली… मतलब तरक्की कर रहा था… पर अब एक आदमी मुझे बरबाद करने की फ़िराक में है….

मिकी यानी ज्योतिर्मय जी के स्कूल में दाखिले से पहले और बेहतर सैलरी वाली नौकरी का ऑफर आया… ज्वाइन करना ही था… मेरा खर्च बरसों से एक समान रहा है, जो अब बढ़ती महंगाई के चलते एक सौ पैंतीस रूपए हफ्ते का हो गया है… समझा जा सकता है कि इन उत्तरोत्तर बेहतर होते जा रहे पैकेज से मेरे बैंक अकाउंट के क्या हाल हो रहे होंगे…. पर अब एक आदमी मुझे बरबाद करने की फ़िराक में है….

इसके बाद जैसा अपना यायावरी स्वभाव है, (मेरे मित्र इसे मेरा शाही स्वभाव कहते हैं… 35 सालों से मेरे-अन्दर बाहर से परिचित होने के कारण उसका कहना है कि राजा-महाराजा काम करने के लिए पैदा नहीं होते)… तो एक खुशनुमा सुबह अपन ने अपनी नौकरी को लात मार दी और… बैंक अकाउंट को खाली करने का इरादा कर लिया…

पूरे 11 महीने और 18 दिन बाद फिर काम में जुटे… इस बार कोई नौकरी नहीं, अपना काम, दिन में 18 से 20 घंटे काम करना रूटीन की बात हो गई…. पर अब एक आदमी मुझे बरबाद करने की फ़िराक में है….

अपने इस नए काम में तीसरे महीने से ही इनकम भी शुरू हो गई… लगभग उतनी ही, जितनी अंतिम नौकरी से होती थी… सारा सिलसिला मज़े से चल रहा था… जानने वाले सलाह देते कि जितना खुद को झोंक रहे हो, उतना हासिल नहीं कर रहे… अपन बेपरवाह, अपनी धुन में जुटे रहे…

और ऐसे में मेरी धुन में एक और धुन आ मिली… जिस आदमी का ज़िक्र इतनी देर से करता आ रहा हूँ, उस आदमी की धुन….

सचिन जम्भेकर …. आप में से कोई जानता है इन्हें…?

कल सुबह लगभग साढ़े सात बजे इनसे पहला परिचय हुआ… अभी लगभग चालीस घंटे बाद भी मैं इनकी गिरफ्त में हूँ… इसके बाद हर रोज़ की तरह काम करने की ‘कोशिश’ कर रहा हूँ….

इन साहब का कारनामा यह है-

पंचम दा की यह रचना सबकी सुनी हुई है… मुझे पुराने जानने वाले यह भी जानते है कि वाद्य यंत्र के तौर पर हारमोनियम मुझे कितना पसंद है… जिस भी गाने में इसका इस्तेमाल हुआ, उसने बाँध लिया… भले पूरे गाने में दस सेकेण्ड के लिए ही क्यों न बजे हारमोनियम….

ऐसे में पंचम दा का यह शाहकार, हारमोनियम में सुनने मिल जाए… ऊपर से सचिन जी की कलाकारी… कुछ बारीक हरकतें ऐसी ली हैं, जो मूल गीत में नहीं… ऐसा कोई सिद्ध ही कर सकता है कि मूल रचना के चरित्र को बरकरार रखते हुए, उसमें अपना योगदान दे, अपना कुछ जोड़ सके…

अतिश्योक्ति लगे तो मेरी बला से, पत्नी साक्षी हैं, रविवार सुबह से अभी तक… जब तक जागता रहा हूँ… इसे सुन रहा हूँ… झूम रहा हूँ… पी रहा हूँ… जी रहा हूँ… आँख खोल कर टेबल पर थाप दे रहा हूँ… आँखें बंद कर ध्यानस्थ हो जा रहा हूँ… ऐसे में काम कौन करे… कैसे करे…

स्वामी ध्यान विनय

कुछ दिल ने कहा… कुछ भी नहीं…

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