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मानो या ना मानो : साक्षात माँ काली से बातें करता है वह!

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आठ साल बाद हरेन्द्र फिर से मेरी ज़िंदगी में अचानक से आ गया है. दो-तीन दिन पहले मुझसे मिलने ग्वालियर से दिल्ली आया था. पहली बार 2010 में एक मित्र हरेन्द्र को मेरे कमरे पर मिलने के लिए ले आये थे. उन्होंने मुझे चुपके से बताया था कि इस पर माँ दुर्गा का वास है, इसके साथ में बहुत चमत्कार होते रहते हैं पर ये कभी मानता नहीं है, हमेशा झूठ बोलकर ऐसी बातों का खण्डन करता है.

हरेन्द्र ग्वालियर का रहनेवाला था, दिल्ली में नेहरू विहार में सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के लिए रहता था. इसके पिताजी मध्यप्रदेश सरकार में पीसीएस अधिकारी थे. इसकी अंग्रेज़ी और गणित कमज़ोर थी, जोकि प्रतियोगिता परीक्षा के लिए प्रायः अनिवार्य है. इस कारण एससी वर्ग में होने के बावजूद भी इसे सफलता नहीं मिल पा रही थी. वैसे वह बहुत व्यवहार कुशल और समझदार था.

कुछ ही दिनों में मुझसे घुलमिल गया. मैंने उससे पूछ लिया कि सभी तुम्हारे बारे में जो बोलते हैं क्या वो सच है? क्या तुम साक्षात माँ काली से बातें करते हो? उसने मुझसे शुरुआत में कुछ छिपाने की कोशिश की पर बाद में मान लिया कि ये सच है. एक दिन नवरात्रि में वो मुझे अपने घर ले गया, जब उसने उपवास कर रखा था. मैंने देखा कि उसे तो बिलकुल संस्कृत नहीं आती. वह माँ की सारी पूजा हिन्दी के दुर्गासप्तशती से करता है.

एकदिन वो मुझसे बोला कि माँ ने मुझे बताया है कि तुम्हें दिल्ली में राहुल से मिलाऊँगी, तुम्हें उसकी तरह बनना है. उसकी ऐसी बातों से लगा कि वो थोड़ा डिस्टर्ब है. इसके पीछे कारण यह था कि उस समय मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी के एकदम शिखर पर था, वर्षों से साधना छूट गई थी, दिन-रात किताबों में ही लगा रहता था. ऐसे में मेरा अध्यात्म से कोई संबंध रह नहीं गया था.

मैं थोड़ा उसकी उपेक्षा करने लगा. एकदिन तो मैंने उसे कह दिया कि तुम्हारे दिमाग में भी “लगे रहो मुन्ना भाई” फिल्म की तरह केमिकल लोचा हो गया है, इसलिए तुम्हें माँ दुर्गा साक्षात बातें करते हुए प्रतीत होती हैं. उसने कहा कि आप सही कहते हैं भाई, मुझे भी ऐसा लगता है, इसलिए मैं डॉक्टर से इलाज भी करवा रहा हूँ. लेकिन मैं पूरी तरह बीमार भी नहीं हूँ. जो बात वो किसी से जल्दी नहीं बताता, वो मुझे बताने लगा.

वो बोला कि माँ को हम उनके नौ रूपों में से जिस रूप में याद करें, ये जरूरी नहीं है कि वो उसी रूप में आयें. वो उस समय ब्रह्माण्ड में जिस रूप में विचरण कर रही होंगी, वो उसी रूप में प्रगट हो जायेंगी. यही वजह है कि जब माँ चण्डी रूप में नग्नावस्था में विचरण कर रही होती हैं तो वो मेरे सामने ऐसे ही प्रकट हो जाती हैं. उनके हाथ में जो कटार है उससे रक्त टपकता रहता है. उनके जाने के बाद कभी मेरे कुर्ता पर तो कभी मेरे हेलमेट पर ये खून के छींटे लगे रहते हैं. मैं इन खून के छींटों का इलाज किस डॉक्टर से कराऊँ, जिसे मैं अपने हाथों से रगड़-रगड़ कर साफ करता हूँ.

ऐसी ही एक घटना ग्वालियर की है. एक तांत्रिक था, जो महिषासुर का भक्त था और महिषासुर को अपने शरीर पर बुलाया करता था. महिषासुर के आने के बाद लोगों के दुख-दर्द को दूर करता था. इस कारण बहुत से लोग उसके महिषासुर का आशीर्वाद लेने उसके पास पहुँचते थे. बहुत दिनों से उसका महिषासुर उससे रूठ गया था और उसके पास नहीं आता था.

लोगों को पता था कि हरेन्द्र पर माँ का वास रहता है, इसलिए इसका आदेश इसका नहीं बल्कि माँ का आदेश है. अगर ये महिषासुर को आदेश दे दे तो वो मान जायेगा. हरेन्द्र को उनलोगों ने सम्मान के साथ पूजा में बुलाया. इसे पहले से बताया नहीं गया था कि वो लोग इससे क्या करवाने वाले हैं. वहाँ जब पूजा आरम्भ हुआ तो उनलोगों ने इनसे गुहार लगाई कि एकबार महिषासुर को आदेश कर दो कि वो फिर से मान जाये. हरेन्द्र बहुत मुश्किल में पड़ गया कि भला इसका महिषासुर मेरी बात क्यों सुनेगा? फिर लोगों की जिद्द पर उसने धीरे से बस इतना कहा – “आ जा” और उस तांत्रिक के शरीर पर महिषासुर आ गया.

इसके बाद उस तांत्रिक का शरीर फूलने लगा, शरीर फूलने से उसके शरीर के कपड़े फटने लगें, वो जमीन पर इतने जोर से अपने दोनों हाथ पटकता कि धरती हिलने का अहसास होने लगा. सैकड़ों लोग जो वहाँ पूजा करने आये थें वो बाहर भाग गयें. हरेन्द्र की डर से हालत खराब थी, लेकिन वो अपना डर छिपाए हुए वहीं दम मारकर बैठा रहा. अब लोग हरेन्द्र से कहने लगें कि महिषासुर मान चुका है, अब इसे आदेश दीजिए कि अभी शान्त होकर चला जाये. ये सुनकर हरेन्द्र के होश उड़ गयें. जब उसने महिषासुर को आने को कहा था तब उसके पराक्रम को देखा नहीं था पर अब उसके इस रौद्र रूप को आदेश देकर वह अपने प्राण संकट में नहीं डालना चाहता था. फिर भी लोगों के बारम्बार आग्रह करने पर वो डरता हुआ धीरे से बोला – “चला जा”. उसके ऐसा बोलते ही महिषासुर चला गया.

ऐसी अनेकों घटनाएं हरेन्द्र से जुड़ी हुई हैं, जिसके बारे में मुझे दूसरे मध्यप्रदेश के मित्रों ने बताया, जो इन घटनाओं के साक्षी रहे थे. हरेन्द्र भले ही औरौं से इन विषयों पर बात नहीं करना चाहता था, पर मुझे सारी बातें बता देता था. इसके बावजूद भी मुझे उसको लेकर हमेशा संशय रहा.

ऐसी कुछ घटनाएं घटती कि मुझे इस पर संशय हो जाता. एकदिन मैं और हरेन्द्र दोनों एक मित्र धर्मवीर दुबे के कमरे में बैठे थे. किसी विषय पर डिस्कस होने लगा. मैं कोई विषय दोनों को समझा रहा था. हरेन्द्र अचानक कमरे से चला गया. हम और धर्मवीर भाई घंटों प्रतीक्षा करते रहे, पर वो नहीं लौटा.

दो दिन बाद मिले तो बोला – “राहुल भाई, बुरा मत मानियेगा, मैं परसों बात बीच में ही छोड़कर चला गया था”. वो आगे बोला कि मुझे लोगों की ओरा नजर आती है, आपके जितनी ऊर्जा मैंने आज तक किसी में नहीं देखी है. आप जब उस दिन अपने दोनों हाथों को मूव करते हुए धाराप्रवाह बोले जा रहे थे तो पूरा कमरा रौशनी से भर गया था, आपके सिर से प्रकाश के गोले निकल-निकलकर बिस्तर पर गिर रहे थे. इतनी ऊर्जा से मेरा दम घुटने लगा. इसलिए मैं तुरन्त भागकर पार्क में चला गया और दो घंटे खुले हवा में टहला तब जाकर तबीयत थोड़ी ठीक हुई.

मैं उसकी सरलता और भोलेपन का सम्मान करता था पर उसकी ऐसी अजीब बातों के कारण उसे चाहकर भी सीरियस नहीं ले पाता था. एकदिन शाम को हम दोनों पार्क में बैठे थे. मैंने उससे कहा कि अगर तुमको माँ काली के दर्शन होते हैं तो उनसे कहो कि मुझे भी दर्शन दे. वो थोड़ी देर शान्त हुआ फिर बोला कि मुझे दिख रहा है कि माँ के स्तन से दूध निकल रहा है और उसकी धारा अनवरत आपके मुख में प्रवेश कर रही है.

माँ कह रही है कि राहुल तुमसे बड़ी अध्यात्यमिक स्थिति में है, तुम्हारे पास तो मैं आती हूँ और फिर चली जाती हूँ, राहुल तो हमेशा मुझमें समाया हुआ है, तुम्हें राहुल की तरह बनना है. उसकी ये बातें सुनकर मैं मन ही मन उसपर कुपित हो गया. मुझे लगा कि ये अर्द्ध-विक्षिप्त है और सिर्फ बकवास करता है. मैंने कहा ऐसे बातें मत बनाओ, अगर तुम्हारी माँ से बात होती है तो उनसे बोलो कि मुझे दर्शन दे. वो मेरे कठोर शब्दों से थोड़ा असहज हुआ और बोला कि हमें माँ दर्शन देती हैं यही हम पर उपकार करती है. मैं उनका दास हूँ, मेरी क्या औकात है कि मैं उन्हें बताऊँ कि उन्हें किसको दर्शन देना है? उन्हें जिसको मन करेगा उसको दर्शन देंगी.

उस रात मैं उससे नाराज होकर अपने घर चला आया. रात को करीब बारह बजे सो गया. उसके एक-दो घंटे के बाद की बात होगी. एक शीतल हवा की लहर मेरे पाँव की तरफ से मेरे सिर की तरफ गुजरी. ऐसी शीतल हवा की लहर मैंने अपने जीवन में इससे पहले कभी अनुभव नहीं किया था. जैसे ही इसकी शुरूआत हुई मैं उसी तुरीयावस्था में बोल पड़ा – “आ गयी माँ”. हजारों घंटों की दिव्य आवाज कानों में गूँजने लगी, अष्टभुजा, दसभुजा आदि अनेकों माँ के हजारों रूप आँखों के सामने से गुजरने लगे. इतना असीम आनन्द अकारण आ रहा था कि लगा आज खुशी से ही मर जाऊँगा. ऐसा लग रहा था मानो एक विशाल समुद्र में लगातार और गहरे डूबता जा रहा हूँ. हालांकि समुद्र शब्द का प्रयोग ठीक नहीं है क्योंकि वहाँ पानी नहीं था. हमें इन्हीं टूटी-फूटी शब्दों से ही काम चलाना होगा क्योंकि हम उस शब्दातीत अनुभव को शब्दों में बांध भी तो नहीं सकते. अब समझ में आता है कि मलंग क्यों कहता है – “डूबत सो बोलत नहीं, बोलत सो अनजान। गहरो प्रेम समुद्र में, कोई डूबे चतुर सुजान।।”

मेरे साथ अक्सर ऐसा अनुभव होता रहा है, पर ये शीतल हवा की लहर और हजारों माँ के रूपों का दर्शन पहले कभी नहीं हुआ था और बाद में भी कभी नहीं हुआ. महीने दो महीने में मेरे साथ ऐसा अनुभव रात में होता है. मैंने ध्यान दिया कि जबसे तेरह साल पहले दिल्ली आया और पढ़ाई के कारण मेरी साधना छूट गई, तबसे मुझे ऐसा अनुभव होने लगा. रात में निद्रा में, अपने आप “सो-हम्” या “ओ-म्” का जप आरम्भ हो जाता है और मैं उसी समुद्र में डूबने लग जाता हूँ. ऐसे लगता है मेरा अस्तित्व उस विशाल में तिरोहित होता जा रहा है और मैं अपने आप को बचाने के लिए छटपटाने लगता हूँ और झटके से बाहर निकल जाता हूँ और नींद खुल जाती है. अब समझ में आता है कबीर ने क्यों कहा था – “जिन ढूंढा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा डूबन डरी, रही किनारे बैठ।।”

मैं दूसरे दिन सुबह-सुबह हरेन्द्र के घर गया और उससे माफी मांगी. जाने-अनजाने मैंने कई बार उसके माँ के साकार विग्रह के प्रति आग्रह पर अपने ब्रह्म के दार्शनिक ज्ञान को थोपने का प्रयास किया था. मैंने अपनी इन धृष्टताओं के लिए उससे क्षमा मांगते हुए उससे कहा कि तुम जैसे माँ की पूजा करते हो वैसे ही करते रहना, मुझ वाचाल के थोथे ज्ञान से रत्तीभर भी विचलित मत होना.

उस पर जगतजननी की कृपा है ये तो मैं साक्षात अनुभव कर लिया था पर मुझे उस पर दया आती थी कि बेचारा ये मन्दबुद्धि इस मक्कार संसार में सर्वाइव कैसे करेगा? ये तो अर्थोपार्जन करने में बिलकुल भी सक्षम नहीं है. जगतजननी ने मेरे विचार को भी धूल चटा दिया. हरेन्द्र बिना अपने पिता के सहयोग के, अपने घर से दूर लखनऊ में काम करते हुए पचास-साठ लाख बैंक बैलेंस बना चुका है और अपने दम पर फोरव्हीलर मेन्टेन कर रहा है. इस बार वो मुझसे अध्यात्यमिक वार्तालाप ही नहीं कर रहा है, कह रहा है अब सबकुछ छोड़ चुका हूँ.

हालांकि उसे जब सामने से देखा तो महसूस हुआ कि आज भी उसकी आँखें वैसी ही चढ़ी-चढ़ी सी हैं, जैसे पहले रहा करती थीं. माँ काली की बात करते उसकी आँखें थोड़ी दाहिने तरफ भागती हैं, जो मैंने अभी भी महसूस किया. लेकिन अब वो सिर्फ प्रोफेशनल बातें करता है, उसे देखकर लग ही नहीं रहा है कि ये वही मन्दबुद्धि है. ईश्वर की जब ऐसी लीला देखता हूँ तो भावविभोर हो जाता हूँ. शास्त्र ठीक ही उद्घोष करता है कि अगर उसकी कृपा हो जाये तो गूँगा वाचाल हो जाता है और लँगड़ा व्यक्ति पर्वत चढ़ जाता है. इस चराचर जगत में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे जगतजननी की कृपा से प्राप्त नहीं किया जा सकता.

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥

– राहुल सिंह राठौड़

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