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वो दुनिया मेरे बाबुल का घर … ‘ये’ दुनिया ससुराल…

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पिछले हफ्ते लगातार एक सवाल मुझसे अलग-अलग लोगों द्वारा पूछा गया, मेकिंग इंडिया का उद्देश्य क्या है?

सबको अलग-अलग जवाब दिए हैं, राष्ट्रवादियों को राष्ट्र सेवा, आध्यात्मिक लोगों को आध्यात्मिक सन्देश, जीवन को भरपूर जीने वालों को जीवन के सारे रंग उड़ेलते हुए सकारात्मक उद्देश्य….

अलग-अलग लोगों के लिए मेकिंग इंडिया की उपयोगिता अलग-अलग है. लेकिन इन सारे उद्देश्यों के पीछे मुख्य उद्देश्य क्या है… हमारा सनातनी उद्घोष “वसुधैव कुटुम्बकम”…

आज मेकिंग इंडिया को देखती हूँ, लोगों का उसके और मेरे प्रति प्रेम देखती हूँ, तो ध्यान बाबा की 2008 में उस समय कही गयी बात याद आती है जो उन्होंने हमारी पहली मुलाक़ात से पहले ही कह दी थी…

“सबसे कह रखा है, ‘गलतियाँ करने से कभी मत डरना’, और मुझसे तब तक पूछते रहो, जब तक सोल्यूशन ना मिल जाए या मैं ये न कह दूं कि “मुझे नहीं पता कल बताऊंगा”.

मैं ऐसा ही हूँ, किसी से पहचान हो तो खुद उसको पता नहीं चलता और मैं उसके घर का सदस्य बन चुका होता हूँ, और आपको भी ऐसा होना है.

अब अगर ये कहोगी कि नहीं मैं तो ऐसी नहीं हूँ या मैं क्यों बनूँ ऐसी, तो सुनो जब हम साथ चलेंगे तो कोई एक ठिकाना तो होगा नहीं हमारा, कभी इस शहर, कभी उस गाँव, हर घर हमारा घर होगा और हर घर में अपने लोग बनाने होंगे, तब जाकर वो सब कुछ हम कर पाएंगे जो हमें करना है, जो नियति ने करने के लिए हमें चुना है.

और फिर पति में ही इतनी मगन न हो जाना कि बाकी ससुराल वालों को पहचान भी ना सको…. “

ये उन सैकड़ों खतों में से एक ख़त का हिस्सा है जो स्वामी ध्यान विनय ने ई-मेल के ज़रिये मुझे उन दिनों भेजे थे, जब हमारी मुलाक़ात नहीं हुई थी, हमने एक दूसरे को देखा तक नहीं था, आवाज़ तक नहीं सुनी थी.

जी हाँ, आवाज़ तक नहीं सुनी थी जबकि हम दोनों के पास मोबाइल हुआ करता था… क्योंकि हमारा मिलना, नाम वाली दो देहों का मिलना नहीं था. यहाँ अस्तित्व योजना बना रहा था एक ऐसे मिलन की, जो सिर्फ दो चेतनाओं का व्यक्तिगत मिलन नहीं होगा, बल्कि इनके मिलने के बाद जो भी इनसे मिले वो उस ऊर्जा को ग्रहण कर सके जो इनके मिलने से उत्पन्न हुई है… अर्धनारीश्वर का वास्तविक अर्थ मैंने उसे वास्तविक रूप से जीकर ही समझा है…

 

तो यहाँ सिर्फ दो प्रेमियों के मिलन की उत्सुकता नहीं थी, यहाँ हम एक एक घटना को खुद से गुज़रते हुए और मिलन के लिए बन रही योजनाओं पर, परमात्मा का आदेश मान एक एक कदम साक्षी भाव से आगे बढ़ा रहे थे…

मुझे तो कुछ ज्ञान भी नहीं था उन दिनों, कुछ जादू घटित हो रहे थे जिसमें मगन होकर बस इनसे मिलना ही पूर्ण नियति समझ रही थी… एक नदी की तरह बहती जा रही थी… जीवन से ओत-प्रोत… मुझे लग रहा था ईश्वर ने मेरी तपस्या से खुश होकर मुझे वरदान स्वरूप इनसे मिलवाया है … बस यात्रा समाप्त हुई…

तब भी ये मुझे कभी “माँ” कभी “जीवन” नाम से पुकारते थे, जबकि यह “माँ जीवन शैफाली” नाम तो बहुत बाद में ओशो से संन्यास प्राप्त करने के बाद मिला.

लेकिन ध्यान बाबा तो सबकुछ जानते थे… हमारे मिलने का कारण भी… जब हम मानव रूप में जन्म लेते हैं तो जीवन का मुख्य उद्देश्य सिर्फ मानव सेवा ही तो होता है… जिस भी तरीके से आप अपने आसपास के लोगों, समाज, देश की सेवा कर सके, प्रेम बाँट सके, उनकी आध्यात्मिक यात्रा में सहयोग कर सकें. इसलिए उनकी कही हुई बात मुझे बार-बार याद दिलाती है कि … “पति में ही इतनी मगन न हो जाना कि बाकी ससुराल वालों को पहचान भी ना सको…. ”

आज जब लोग मिलते हैं जुड़ते हैं, तो मुझे अपने ही परिवार के सदस्य से लगते हैं… इस बड़े से परिवार का… वसुधैव कुटुम्बकम…. इस पूरे परिवार को साथ लेकर हमें चलना है, लोगों को प्रेम बांटना है, उनकी सेवा करना है… उनकी आध्यात्मिक राह में आ रही अड़चनों को दूर करने का प्रयास करना है…

इसलिए लगता है इस धरती पर जिनसे भी मैं मिलती हूँ या मेरा मिलना लिखा है, वो सब मेरे ससुराल पक्ष के ही हैं. इसलिए ही तो हमारे यहाँ पति को परमेश्वर कहा जाता है और स्त्री को सदा सुहागन का आशीर्वाद दिया जाता है. महिलाएं इसका बहुत ही सतही अर्थ निकालती हैं.

हमारे यहाँ जो पति को परमेश्वर मानने की धारणा है वो वास्तव में परमेश्वर को पति मान लेने की प्रार्थना से ही निकला है. चूंकि स्त्री और पुरुष के भाव जगत में भिन्नता होती है इसलिए पुरुष उस शक्ति स्वरूप में हमेशा माँ देखता है…

तो प्रेमिका अपनी आत्मा के आधे टुकड़े की तलाश में कभी उसे शिव या कभी कृष्ण या कभी राम में खोजती है, या इनके गुणों को धारण करने वाले व्यक्ति को खोजती है…

वास्तव में प्रेम में डूबी औरत सदा सुहागन ही होती है क्योंकि जब वो प्रेम में होती है तो प्रेम ही परमेश्वर हो जाता है और परमेश्वर ही पति. और परमेश्वर कभी मरता नहीं…. इसलिए स्त्री सदैव सुहागन रहती है…

हमारे यहाँ हर औरत शक्ति स्वरूप है जो अपने शिव स्वरूप के साथ जीती है. हर औरत धरती की जायी है इसलिए उसमें धरा सा धैर्य है इसलिए वो राम को पूजती है… यहाँ प्रेम में डूबी हर औरत राधा है, जो कृष्ण की बांसुरी की धुन में रमी रहती है.

इसलिए ये दुनिया हमेशा मेरे लिए ससुराल है… और जब यह जीवन यात्रा समाप्त होगी तो मैं लौट जाऊंगी अपने बाबुल के घर जहाँ से मेरा उद्गम हुआ है, दोबारा उसमें विलीन होने…

क्योंकि वो दुनिया मेरे बाबुल का घर ये दुनिया ससुराल….

– माँ जीवन शैफाली

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