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जानेमन तुम कमाल करती हो….

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बहुत विस्तृत है भाव जगत, जिन्हें शब्दों का बंधन रास नहीं आता, फिर भी अज्ञात को ज्ञात शब्दों में प्रस्तुत करने की मनुष्य की सीमा को तोड़ने की ज़िद लिए तुम हर बार शब्दों के समंदर में कूद जाती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

कभी ठहर जाया करो उन दो दुनिया के बीच में कहीं तो उन दोनों को भी आराम आये, आवागमन के लिए बनी देह की झिल्ली के पार चेतना का विस्तार करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

कभी कभी समय के पीछे या कम से कम साथ चल लिया करो, कालचक्र से भागकर समय को चक्कर में डाल, दूर खड़ी यूं भोलेपन से मुस्कुराती हो…. जानेमन तुम कमाल करती हो…

लोग प्रेम को रोग कहते हैं, तुम पीड़ा से आवेशित ह्रदय पर ‘टोनही’ बन प्रेम का टोना करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

जो अगम है अगोचर है अज्ञेय है अविनाशी है… उसके स्वरूप सृजन के लिए तुम जां निसार करती हो… जानेमन तुम कमाल करती हो….

बस कुछ ऐसे ही कमाल की मजाल की है इस नाचीज़ ने… कुछ ख़ास बातें और विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए लिंक्स ख़िदमत में हैं… हमेशा की तरह मेरा विश्वास उम्मीद से हैं…

– माँ जीवन शैफाली

जीवन का फ़लसफ़ा : चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो…

सबने अलग अलग तरीके से पूछा- हाँ तो? फिर उसके बाद क्या? क्या जान लिया? और क्या जानना चाहती हो? क्या पा लिया और क्या पाने की प्यास बची है?

मैं निरीह सी अपनी उमंगों के पंखों को खुद में समेट लेती हूँ… खुले पंखों का विस्तार गुच्छा बनते ही सिकुड़ने लगता है…

क्यों, कहाँ, कैसे, कब, कितना या बितना का जवाब खोजो पहले उसके बाद जिज्ञासुओं का चोगा पहनो… जितना जान लिया उससे अपने आसमान के कौन से छेद पर पैबंद लगा दिया है इसका हिसाब भी तो देना होगा…

हर बार फटी झोली दिखाकर क्या पाया क्या खोया के कच्चे चिट्ठे से बच नहीं सकती. दुनिया सूक्ष्म प्राप्ति के भी स्थूल प्रमाण मांगती है. और तुम हो कि पाकीज़गी की नई परिभाषा गढ़ने चली हो, तुम्हारे जिस्म पर छोड़े गए निशान तुम्हारी पाकीज़ा रूह पर चाँद पर दाग़ के समान है.

ज़िंदगी के अनुभवों की फाइल में सारे प्रमाण पत्र और NOC लगाकर निकलना दुनिया के बाज़ार में… यहाँ तुम्हारे अनुभव की कीमत तुम्हारे प्रमाणपत्रों की सत्यता से लगाई जाएगी…

माना तुम्हें कुछ पाना नहीं है, तो फिर… READ MORE

जीवन के रंगमंच से : Ma Is Feeling Happy With Herself And 52 Others

जाने वाले कभी लौटकर कहाँ आते हैं, हम बस उम्मीदों के दम पर पैरों की ज़मीन को पकड़े रहते हैं… कि समय की रेत पैरों तले से खिसक न जाए और ब्रह्माण्ड के उस छोर पर खुद को खड़ा पाएं जहाँ अकेले होना नियति होता है लेकिन अकेलेपन का भय हमें अकेला नहीं छोड़ता…

ये जीवन उसी भय से मुक्ति की यात्रा है… दक्ष के हवन कुण्ड में खुद को स्वाहा कर चुकी सती अपनी चेतना को बावन स्थानों पर गिरता देख रही है… न जाने कौन बावन लोग हैं जो अपनी ऊर्जा देकर उन्हें शक्तिपीठ बनाएंगे… READ MORE

मैं तुम्हारे जीवन का रंगमंच हूँ, मैं ही तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रपंच हूँ

मैं ही तुम्हारे अदृश्य जगत में रचती हूँ माया
मैं ही दृश्य जगत में फिरती हूँ बनकर छाया
परस्पर अनुकूल-प्रतिकूल, साधक-बाधक रूप में
मानव जगत में प्रकट होती बनकर महामाया

मैं चिति बन पराशक्ति रूप में आत्मस्फुरित हूँ
जिसके बहि:प्रसरण से तुम्हारा संसार करती हूँ
और मैं ही स्थावर-जंगमात्मक जगत में
परमशिव के तीसरे नेत्र पर तांडव करती हूँ… READ MORE

 

 

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