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मैं अपनी ही प्रेमिका हूँ

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शायद 1996 या 97 की बात होगी उन दिनों टीवी पर एक डेली सोप आता था “एक महल हो सपनों का” ये टीवी सीरियल पहले गुजराती में बना फिर उसकी लोकप्रियता को देखते हुए उसका हिन्दी रीमेक भी बना।

गर्मी की छुट्टियां चल रही थी, मेरा ग्रेजुएशन हो चुका था, और मैंने अपने विद्रोही लक्षण घर में प्रकट करना शुरू कर दिए थे, तो पापा मेरे मुझे पकड़कर वलसाड (गुजरात) ले आये थे। अब मामा तो है नहीं, तो मौसी के घर पर मुझे रखा गया और वहां से मुझे मुम्बई ले जाना तय हुआ था, अमेरिका से कोई लड़का आया हुआ था उसको दिखाने के लिए।

उन दिनों मेरी नानी भी मौसी के यहाँ ही रहती थी। चूंकि नानी को कोई बेटा नहीं था सिर्फ़ चार बेटियाँ थीं, तो नाना की मृत्यु के बाद वो बारी बारी से तीनों मौसी के यहाँ रहती। मुझे शैफाली नाम मेरे नाना ने ही दिया था। उनकी बहुत अधिक स्मृति नहीं है लेकिन बस इतना याद है वो मुझे अपनी आगे डंडे वाली साइकिल जिस पर उन्होंने एक छोटी सी सीट लगवा दी थी, पर बिठाकर घुमाया करते थे।

मेरे नाना दरजी थे, कपड़े सिलने का काम करते थे। कमाई बहुत नहीं थी तो मेरी माँ और बाकी मौसियाँ साड़ी छपाई का काम करके घर चलाती। चारों की शादी के बाद नाना-नानी अकेले ही रहते थे और जैसे तैसे जीवन गुज़ार रहे थे। तीनों मौसियाँ गुजरात में ही ब्याही थीं तो उनके यहाँ आना जाना लगा रहता, चूंकि मेरी माँ इंदौर में ब्याही थी तो नाना-नानी का यहाँ बहुत अधिक आना नहीं हुआ। इसलिए भी नाना के मृत्यु के पश्चात नानी कभी इंदौर रहने नहीं आईं।

पुराने किस्सों का ज़िक्र इसलिए करती हूँ ताकि आपको याद दिला सकूं आपका बचपन भी मेरी ही तरह मज़ेदार गुज़रा होगा, उसे याद कीजिये। बड़े होने के चक्कर में हमने बहुत कुछ खो दिया है। दिल तो आज भी बच्चा है जी।

तो बात हम टीवी सीरियल की कर रहे थे। रोज़ दोपहर को टीवी पर यह सीरियल आता, नानी खूब चाव से देख रही होती, और मैं भी नानी के साथ वहीं बैठ जाती… टीवी देखने का शौक कभी रहा नहीं तो तब भी ये मुझे बड़ा उबाऊ लगता, मैं अपने कान में वॉकमेन घुसाकर दर्द भरे गीत सुनती आंसू बहाती रहती ।

अब बॉय फ्रेंड से शादी न हो पा रही हो, पिता जबरन पकड़कर किसी अमेरिका वासी से शादी करवा रहे हो और देशप्रेम तो तब से कूट कूट कर भरा था, तो देश छोड़ने का तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी… तो ऐसे में और क्या करती?

आज सोचती हूँ तो बड़ी हंसी आती है, क्या मज़ेदार दिन थे… प्रेम करना, प्रेम में धोखा खाना, दुःख भरी कविताएं लिखना, फ़िल्मी पिता की तरह मेरे पापा का जबरन कहीं और ब्याह के लिए ज़ोर देना… और मेरा फ़िल्मी तारिका की तरह प्रेमी की याद में आंसू बहाना।

तो मैं गाने सुनते सुनते आंसू बहाती और मेरी नानी टीवी सीरियल देखते देखते। हम दोनों के रोने के अलग अलग कारण थे, दोनों के सपनों का महल टूट चुका था।

मौसी के बच्चे स्कूल से घर आते तो उनको मजबूरी में अपना पसंदीदा टीवी सीरियल “एक महल हो सपनों का” छोड़ना पड़ता। कभी कभी वो बच्चों से लड़ भी पड़ती थी उसके लिए। मैंने नानी को बच्चों के स्तर पर लड़ते और वैसे ही रोते देखा है ।

मैं कई बार बीच बचाव करती और बच्चों को समझाती कि “आजी” को पूरा देख लेने दो सीरियल फिर ले लेना टीवी का रिमोट… लेकिन बच्चे फिर बच्चे ही थे ।

नानी गुस्से में घर लौट जाती ।

यह तो एक ही किस्सा है जो मैं जानती हूँ। आजी ने न जाने अकेले कैसे दिन निकाले, कुछ न कुछ समस्या उनके साथ लगी रहती। जीवन के आख़िरी दिंनों में उन्हें सफ़ेद दाग़ हो गए, और रोग इतनी तेज़ी से बढ़ा कि कुछ ही दिनों में पूरा शरीर सफ़ेद हो गया ।

अकेलापन, कुंठा, दुःख जीवन से न निकल सका तो एक दिन कुँए से उनकी लाश निकालना पड़ी।

उनके जीवन में प्रेम नहीं था, वो प्रेम तलाशती रही जीवन भर, लेकिन कभी खुद से प्रेम न कर सकी। उनका सपनों का महल नहीं बन पाया था, मेरा भी न बन पाया था। ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिनके सपनों के महल नहीं बन पाते या बने बनाए महल टूट जाते हैं। जीवन है तो समस्याएँ तो लगी रहेंगी। लेकिन मैंने कभी जीवन की समस्याओं को जीवन नहीं माना, मैं उसमें भी आनंद लेती रही। दुःख और पीड़ा का अपना आनंद होता है।

पिछले हफ्ते मेरे पास ऐसे कई लोग आये जिन्होंने खुद को किसी न किसी समस्या में गले तक डुबो दिया है, उनमें से अधिकतर प्रेम के मामले हैं।

मुझे उन लोगों से यही कहना है जो प्रेम आपको दीमक की तरह चाट के खोखला कर जाए वो प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम तो वह होता है जो आत्मा पर भी फूल खिला दे, जिसकी सुगंध देह से होते हुए हवा में घुल जाए, फिर आप जहाँ से निकलो लोग आपके प्रेम में सराबोर होकर निकले।

प्रेम मकड़जाल नहीं होता जिसमें आप खुद को फंसा पाओ, प्रेम तितली की मानिंद अपने रंगीन परों पर मदमाता अहसास है, जिसे पता है आसमान छूने जितना ऊंचा वो भले न उड़ सके, भले उसका जीवन बहुत छोटा है लेकिन जो भी उसे देखता है मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता। प्रेम की अपनी चित्रकारी होती है जो उसने अपने परों पर उकेरी होती है जिसे देखना भी प्रेम पूर्ण बना देता है।

हाँ जाल की अपनी बुनाई होती है, लेकिन चाहे कितने भी करीने से बुनी हुई दिखे, उसमें फंसा जंतु कभी प्रेम नहीं उपजा सकता।

प्रेम वही है जो आपको खुद से प्रेम करना सिखा दे, वो नहीं जो खुद से दूर कर दे।

इसलिए मैं अक्सर कहती रहती हूँ… हाँ मुझे एक बार फिर इश्क़ हो गया है… खुद से.. और एक बार फिर मैं एलान करती हूँ… मैं इश्क़ हूँ दुनिया मुझसे चलती है। खुद से प्रेम कीजिये और प्रेम है तो उसे प्रकट कीजिये। प्रेम आपकी अपनी ही सुगंध है, दूसरे तो बस माध्यम होते हैं, जैसे खुशबू के लिए हवा ज़रूरी है। अपने प्रेम को पहचानिए और खुद के सामने बार-बार इज़हार कीजिये… मैं अपना ही प्रेमी हूँ… मैं अपनी ही प्रेमिका हूँ।

अंत में हरिवंशराय बच्चन की कविता

सुखमय न हुआ यदि सूनापन!

मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
लंबी-काली रातों में जग
तारे गिनना, आहें भरना, करना चुपके-चुपके रोदन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!

मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
भीगी-ठंडी रातों में जग
अपने जीवन के लोहू से लिखना अपना जीवन-गायन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!

मैं समझूँगा सब व्यर्थ हुआ-
सूने दिन, सूनी रातों में
करना अपने बल से बाहर संयम-पालन, तप-व्रत-साधन,
सुखमय न हुआ यदि सूनापन!

– माँ जीवन शैफाली

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