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एक कहानी : नाम याद नहीं मुझे…

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क्लास, सातवीं से आठवीं हो गई तब महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। कपड़ों में सलवार दुपट्टे की गिनती बढ़ी। मम्मी पहले से ज्यादा चौकन्नी हो गयीं। थोड़ी दुपट्टे को लेकर मैं भी सतर्क हुई। स्कूल जाने के लिए सहेलियों का एक ग्रुप साथ हो गया। लड़कों का कोई झुण्ड देखते ही सिर झुक जाना, चिड़ियों की तरह चहचहाहट को बीच में ही रोककर.. कदमों का तेज हो जाना.. खुदबखुद आ गया..

ऐसा नहीं कि कुछ बदल गई थी मैं! बिल्कुल वैसे ही तो थी…. स्कैच पैन से साड़ी का किनारा बनाना, लूडो के खेल में देर तक पासे को डिबिया में हिलाकर लूडो पर फेंकना, कि अबकी छह आ जाये.. कई चांस तक छह न खुलने पर आँख भर आना।

गिट्टियां, किटकिट, कबड्डी खेलते वक्त दुपट्टे को कमर में बांध लेना। एक-दो चक्कर पापा की साईकिल चलाने की जिद करना। स्कूल से लौटकर चावल फ्राई बनाकर खाना, चुपके से मिठाई गटक जाना, पूछने पर साफ मुकर जाना।

जन्माष्टमी में लकड़ी के बुरादे को ढ़ेर सारे रंगो से रंगकर, जन्माष्टमी सजाना, दीपावली में मिट्टी का घर बनाकर फिर उसे मिट्टी से लीपना, उस पर रंग चढ़ाना, मम्मी के हाथों जूं निकलवाना सब वैसे ही तो था। बस इतना बदल गया कि महीने में दो तीन दिन मम्मी के एक इशारे पर पापा मुझसे यह नहीं पूछने आते कि आज मैं स्कूल क्यों नहीं जा रही।

रोज चमचमाते जूती के साथ स्कूल जाने और गंदे जूते लेकर लौटने के बीच उधम चौकड़ी और शैतानियों की, रोज एक गुल्लक भरती थी मैं। स्कूल से घर तक इमली की चटनी का स्वाद रास्ते पर चटखारे दिलाता रहता। बिस्कुट को कुतर पर खाना। कदमों को गिनकर स्कूल से घर पहुंचना… स्कूल से तितली पेंसिल बाक्स में छिपाकर घर तक ले आना.. कुछ भी तो न भूली …

स्कूल आठवीं तक का ही था वो भी को-एजुकेशन। क्लास में लड़की-लड़कों की डेस्क, अलग लगती थी। बायें हाथ लड़कियों की डेस्क और दायीं हाथ लड़कों की। दोनों डेस्क के बीच मास्टर साहब के गुजरने की एक पतली सी गैलरी नुमा जगह। जहाँ से वह दोनों तरफ मुआइना करते रहते। मास्टर साहब के हाथ और संटी, दोनों की कुल लम्बाई से बाहर कोई भी स्टूडेंट्स नहीं थे। उस पतली सी जगह में कॉपी-कलम, ब्लेड, चूरन, इमली देने लेने में हाथों का इधर से उधर जाना-आना आम बात थी.

क्लास में हर किस्म के लड़के-लड़कियां.. अपनी खूबी, शैतानियों और बद्तमीजी से जाने जाते थे। किसी ने किसी लड़की की इमली चुरा ली.. घंटों झगड़ा हुआ। किसी ने किसी की चुगली कर दी। किसी ने ‘मोटी’ बोल दिया, किसी ने ‘काली’। पिछले डेस्क पर बैठा लड़का पान के पत्ते के भीतर किसी का नाम लिख दिया, सर से शिकायत हुई। सर ने आसमान सिर पर ले लिया। पूरी क्लास को चेतावनी दी गई। उन सब के बीच लड़की का पूरा दिन रोना… दो दिन स्कूल न आना फिर गुमसुम रहना…. इन सब के बीच, रोज सातों घंटी समाप्त.. और हम थके हारे घर लौट आये।

मेरी सीट, दूसरे कतार पर पतली गैलरी की तरफ थी। पहली घंटी क्लास टीचर की थी। हाजिरी के बाद सर ने दो सवाल समझाकर पांच सवाल ब्लैकबोर्ड पर लिखे। पूरी क्लास शान्त थी.. जो भी आवाज़ चल रही थी वो गणित और मस्तिष्क के बीच। क्लास में टहलते वक्त सर जी की निगाह मेरी कॉपी पर टिक गई.. जहाँ मैंने एक आसान से गुणा में चूक कर दी थी.. सर ने मेरी कॉपी उठाई और गुस्से से मेरे कान खींच कर मेरा सिर घुमाने लगे। कान की कील और बेइज्जती के बीच मेरे आंख में पानी भर आया। हाँलाकि सर जी मेरी इस भावना और संवेदना से अनभिज्ञ दिखे। तभी मेरे बराबर के डेस्क से ‘अभिनव’ ने अचानक से उठकर सर की कलाई जोर से पकड़ ली।

अचानक ऐसी घटना से सर सहित पूरा क्लास स्तब्ध हो गया!

सर ने अपनी बेज्जती और अभिनव की जुर्रत और जो भी कुछ उनके मन में आया हो. मुझे छोड़कर तेज़ी से डंडे की तरफ लपके और अभिनव के शरीर पर तेज़ी के साथ डंडे बरसाने लगे। सर गुस्से से हाँफ रहें थे और उतना ही चीख भी.. अभिनव बिल्कुल पत्थर की तरह पैर जमाकर खड़ा था।

वह अपने दोनों हाथ डेस्क पर मजबूती से टिका कर ऐसा खड़ा था मानों गुरूजी को चुनौती दे रहा हो। मैं थरथर-थरथर काँप रही थी. मेरे पैर के पंजे की सब उंगलियां जूती में सिकुड़ कर तले को दबाने लगीं। क्लास में किसी की हिम्मत न हुई जो अभिनव के लिए खड़ा हो सके।

डंडा अभिनव के शरीर पर टूट गया लेकिन अभिनव रत्ती भर भी नहीं। डंडा टूटते ही गुरुजी टूटे.. एक झटके में रजिस्टर लेकर काँपते हुए क्लास से बाहर निकल गये।

गुरुजी के क्लास छोड़ने के बाद कुछ देर तक पूरी क्लास वैसी ही बैठी रही केवल अभिनव स्टैच्यू की तरह खड़ा था। उसकी निगाह अपने डेस्क पर गड़ी थी कि अचानक उसके पलकों से फिसल कर चमकती हुई पानी की दो बूंदे डेस्क पर गिरी। डेस्क की शुष्क लकड़ियों ने तो उसे अपने भीतर जगह न दी लेकिन मेरे भीतर उन दो बूंदों ने गहरे तक डुबकी लगाई।

लगातार तीन दिन अभिनव की जगह खाली रही। चौथे दिन अभिनव अन्तिम डेस्क पर दिखा। ऐसा भी नहीं था कि उससे किसी ने सीट बदलने के लिए कहा हो लेकिन पता नहीं उसने ऐसा क्यों किया.. अभिनव पहले से भी पढ़ने वाला शान्त और गंभीर स्टूडेन्ट था लेकिन उस घटना ने उसे और भी अकेला और गंभीर बना दिया।

मुझे जहाँ तक याद है घटना के बाद गुरूजी ने न तो किसी बच्चे डांटा और न ही हाथ में डंडा उठाया। अभिनव की कॉपी पर कोई दस्तख़त उस दिन के बाद दर्ज न हुई। उसने पूरी क्लास से एक दूरी बनाई जिसमें मैं भी शामिल थी… शायद उसकी इस गलतफहमी में भी..

उस दिन, स्कूल से लेकर घर तक मैं एक अदृश्य पिंजरे में बंद सी रही। जो भी कुछ खाया पिया वो सिर्फ इसलिए कि न खाने की वजह बतानी पड़ती.. खाया तो लेकिन स्वाद एक बार भी जुबान पर दस्तक देने न पहुंची। रोशनी कचोट रही थी, अंधेरा डरावना सा लग रहा था। रोशनी और खुली आंखों के बीच कम्बल ने एक पर्दा गिराया जिसमें ढ़ेर सारे ख्वाब टकराये। मैंने खुद से न जाने कितने सवाल किये… कितनों के जवाब खुद ही दिये..

‘ऐसा नहीं करना चाहिए था अभिनव को.
क्या जरूरत थी सर की कलाई पकड़ने की?
ऐसा भी नहीं था कि सर मुझे बेरहमी से पीट रहे थे.

लेकिन अभिनव जैसा गंभीर लड़के ने ऐसा किया तो जरूर मैं उसके भीतर शामिल हूँ.. वरना वो ऐसा क्यों करता भला!

सर को भी इतनी बेरहमी से नहीं पीटना चाहिए था.. लग ही नहीं रहा था कि कोई टीचर अपने स्टूडेन्ट को मार रहा है.. सर तो ऐसा पीट रहे थे मानों रंजिश या प्रतिशोध की भावना थी…

‘अभिनव’ यदि सर से माफी मांग लेता तो शायद उसे इतना न मारते लेकिन वो तो जैसे उन्हें खड़ा होकर ललकार रहा था।

मुझे भी कुछ हिम्मत करनी चाहिए थी. क्यों नहीं मैंने ही सर के पैर पकड़ लिये..पैर पकड़ लेती तो जरूर माफ कर देते… लेकिन यह भी तो होता कि सब लड़के-लड़कियाँ इल्ज़ाम लगाने लगते।

क्या होता यदि वो इल्ज़ाम लगाते! अब भी तो इल्ज़ाम लगेगा. अभिनव ने जो किया हर बच्चे के मन में एक दूसरी तस्वीर उतरी। फिर भी मुझे अभिनव की तरफ से माफ़ी मांगनी चाहिए थी’

ऐसे उधेड़बुन और सवाल जवाब में न जाने कितनी रातें गुजर गयीं..

अर्धवार्षिकी परीक्षा में अभिनव एक मात्र लड़का था जिसे गणित में सौ फीसदी अंक मिले। गुरुजी को मालूम था कि अभिनव क्लास का सबसे होनहार है शायद यही विश्वास गुरूजी के क्रोध को सातवें आसमान में ले गया हो।

आठवीं पास होने तक मेरे अन्दर कुछ ऐसा घटने लगा था जिसकी आवाज़ बाहर आने में मेरे भीतर डर होने लगा था। अभिनव गंभीर लड़का था उसने पूरे सत्र कभी ऐसे नहीं देखा कि मुझे किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े। उसकी निगाह में, मैं रहती थी यह सच था और मेरी खोज में अभिनव… यह भी झूठ नहीं..

पापा बैंक मैनेजर थे। ट्रांसफर होना आम बात थी.. उसी वर्ष पापा का ट्रांसफर हो गया। पापा के ट्रांसफर के बाद शहर बदल गया.. नये शहर में बहुत कुछ नया दिखा। पुराने शहर में बहुत कुछ पुराना छोड़ आयी… कुछ चुपके से बटोर लाई।

अभिनव से कभी मेरी एक भी शब्द बात न थी कि उस पर कुछ हक जता पाती. यह भी न बता पायी कि मैं शहर छोड़कर जा रही हूँ.. यह भी नहीं पूछ पायी कि तुम कहां रहते हो? इतना भी कह लेती कि तुम्हारे शरीर पर सर की संटियों के निशान तुम्हारे शरीर के ऊपर लगे थे.. लेकिन उसके गहरे निशान मेरे भीतर से अब तक न मिटे।

नये शहर में, नौंवी में इस बार गर्ल्स कॉलेज में एडमिशन हुआ। मेरी रुचि साइंस में थी सो साइंस ग्रुप चुन लिया। फिजिक्स, कमेस्ट्री, बायोलॉजी के बीच इतना वक्त नहीं बचता कि कुछ याद किया जाये लेकिन सब भूल भी जाये यह भी मुमकिन न था।

अभिनव से इतना जरूर हासिल किया कि किशोर भावनांए मुझे अपने संग न तो बहका पायीं और न मुझे रंग सकीं। मेरे लिए पढ़ने के अलावा कुछ और था ही नहीं। सिर्फ एक ही लक्ष्य था डाक्टर बनना..

इन्टरमीडिएट 81% पाकर घर में एक विश्वास कायम कर पायी। पापा ने मेडिकल कोचिंग में मेरा दाखिला करा दिया.. कोचिंग के बाद सिर्फ नोट्स, बुक.. क्वेश्चन पेपर.. कुछ आधी-अधूरी यादों के बीच एक वर्ष गुजर गया।

मेडिकल के परिणाम आने पर पापा देर तक रोये थे। अखबार में नाम निकला.. जिंदगी बदल गई.. एक ही दिन में डाक्टर साहिबा बन गई।

मेडिकल कालेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेन्ट.. कॉलेज में ही हॉस्टल था सो पूरा दिन कॉलेज कैम्पस में ही गुजरने लगा। नया माहौल, नई दोस्त, के बीच मेडिकल कॉलेज का बड़ा सा कैम्पस… बिल्कुल नई सी दुनिया हो गई थी मेरी..

एक दिन क्लास करके छत के सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि अचानक मेरी निगाह सफेद एप्रिन पहने एक मेडिकल स्टूडेन्ट पर गई.. जो नीचे से ऊपर की तरफ़ तेज़ी से जा रहे थे अचानक मेरे भीतर जैसे बिजली कौंध गई हो.. मेरे मुंह से चीख की तरह आवाज़ निकल पड़ी..

“अभिनव”
( हांलाकि उस वक्त मैं भूल गई कि वो मेरे सीनीयर थे)

मेरी आवाज़ सुनकर, सीनियर स्टूडेन्ट सीढ़ियों से वापस उतरने लगे। मैं बरामदे की दीवार पर टेक लगा कर खड़ी थी.. शरीर शक्तिहीन सा लग रहा था।

सीनियर स्टूडैंट मेरे पास आकर रुके और बोले-

“Yes”

मैं बिल्कुल डरी आवाज़ में सिर्फ इतना बोल पायी..
“आप अभिनव हैं न?”

जी… आई मैं अभिनव एंड यू ?

“क्या आप मुझे पहचान नहीं पा रहे?” मैने सकुचाते हुए कहा

सीनियर ने बड़ी बेबाकी से कहा-

“नो”

ऐसे रूखे उत्तर की बिल्कुल भी आशा न थी मुझे..
मैं बिल्कुल रूआँसी हो गई.. शर्म से मेरी नजर नीची हो गई।

“वैसे मुझे आपका नाम तो याद नहीं लेकिन आपका नाम अंग्रेज़ी अल्फाबेट के इस लेटर से शुरु होता है न?”

मैंने शर्म का पर्दा हटाकर नजर उठाई तो देखा, सीनीयर अपने बायें आस्तीन का बटन खोलकर बाजू तक आस्तीन चढ़ाये हुए थे.. बाजू पर गहरे से अंग्रेज़ी में टी (T) का निशान बना था।

इसी लेटर से ही न शुरू होता है न आपका नाम… उन्होंने बात दुहराई..

मैं अब सिसकियों से थी.. आँखों पर पानी की मोटी परत. बोलने पर गला कांटे की तरह चुभ रहा था. सिर्फ अपनी उंगलियां उस T पर दौड़ा पायी…उस वक्त ऐसा लगा कि पूरा छह वर्ष घूम लिया हो मैंने।

सीनियर की आंखें नम थी . उन्होंने भर्राए गले सिर्फ इतना ही कहा.. छह साल में बहुत सी क्लास बदली, किताब बदली लेकिन अल्फाबेट का यह लेटर आज तक रटता रहा हूँ मैं..

मेरी धड़कने अब सामान्य न थीं। चेहरा सुर्ख हो चला था.. मुट्ठियाँ के बीच पसीनों ने मेरी घबराहट को मुझ तक सूचित किया….

छह साल के दरम्यान बातें तो बहुत उमड़ी लेकिन मैं सिर्फ इतना पूछ पायी…

“मैं तो डरपोक थी लेकिन तुम तो हिम्मती थे अभिनव! तुमने सर की कलाई तक पकड़ ली थी लेकिन क्या तुम एक बार मुझसे बोल नहीं सकते थे…

‘क्यों! बोला नहीं था मैंने?

मेरे शरीर पर संटियाँ, बेतहाशा गिरी लेकिन क्या मैंने एक बार भी जुबान खोली? जब मेरी चुप्पियाँ चीख चीखकर तुम तक न पहुंच पायीं तो फिर किस हिम्मत से तुम तक..”

और फिर मेरी हथेली खुदबखुद अभिनव के मुंह पर चली गई..
अब हम दोनों के पास शब्द खत्म हो चुके थे. बस आंसुओं ने जो कहा सुना हो..

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जिन्दगी अब बहुत व्यस्त हो चली है.. परिवार, नौकरी, समाज की तमाम जिम्मेदारियों के बीच शायद कोई है जो मेरी थकान मिटाने चला आता है तो सिर्फ मेरी आधी-अधूरी प्रेम कहानी ही है.. जिसमें झूलकर सारी थकान मिट जाती है मेरी… भले उसमें बताने के लिए मेरे पास कुछ भी न हो..

ओह्ह! देखिए.. अपनी बातों में यूँ खोयी रही कि अब तक मैंने अपना नाम और परिचय भी न बताया-

आई एम तूलिका (गायनेकोलॉजिस्ट ) एंड माई हस्बैंड इस न्यूरोलोजिस्ट…
उनका नाम तो याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि अल्फाबेट के पहले लेटर से ही नाम शुरु होता है उनका…

– रिवेश प्रताप सिंह

मित्रों! झोला उठाने का वक्त आ गया है

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