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अकथ कहानी प्रेम की

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दाड़िमवा खाना खाय के जाए रे!

कास के गट्ठर को बुने जा रहे छप्पर के ऊपर फैलाते हुए सुन्नर महतो ने कहा।
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(दाड़िम समूचे गावं का सेवक था कहते हैं पांच साल की उम्र में भटकते हुए यहां आ गया था जाने कहाँ से, तब से यह गाँव ही दाड़िम का घर परिवार है, खेतों की जुताई से लेकर न्योता हकारी के लिए रिश्तेदारियों में सामान पहुंचाने तक दाड़िम पूरे गाँव के हर दरवाजे पर निःस्वार्थ उपलब्ध रहता, पंडिताइन काकी के पनडिब्बे की सुपारियाँ हों या भगवान अहीर की मटकियों की दही हो साधिकार ले भी लेता था, सबकी ख़ुशी में हँसता, सब के गम में आंसू बहाता दाड़िम मेलों में बाँसुरियां बेचता था, और बजाता भी खूब था )
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उर्मियाँ, हे उर्मियाँ !!
का बनायी है रे सुनरकी, काका खाए पे पठयिन हैं।
दाड़िम ने पुकारते हुए बोला

हाँ
ऊ कल छपरा उठवावे का है न तुमसे तो बापू ने तुम्हें खाने पर बोला होगा, आ जाओ परोस देती हूँ – अंदर चौके से उरमा की सुरीली आवाज उभरी,

सुनो दाड़िम
मुझे सुनरकी न बुलाया करो, हमको अजीब सा लगता है।
थाली रखते हुए उरमा सरमाई

काहे?
का अजीब है इसमें, तुम सुन्नर हो तो सुन्नर बोलते हैं।

तू नहीं समझेगा मौगे दाड़िम….

बाहों में उभरी मछलियों को जान बूझ कर सहलाते हुए उरमा ने बोला

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बोखत
यार ई हम लोग नीक नहीं करते
भांग औ ताड़ी तक को ठीक था लेकिन ई कच्ची

छोड़ देते हैं यार
गंगा पहलवान के भट्ठे पर बैठे दाड़िम ने अपने हमउम्र बोखत को समझाया,

तू भी न दाड़िम, नहीं समझता है, अब हम पढ़े न होते या शहर न गए होते तो मान भी जाते पर अब हमसे ऊ करिया करूठी बर्दास्त नहीं होती, न पिए तो का करें
बियाह के समय अगर हम समझदार होते तो तभय मिनिहा कर देते, जानते हो इसी लिए सरकार बाल विवाह का विरोध करती है।

नशे में लरजती जुबान से बोखत ने ज्ञान उलीचा।

हे दाड़िम, सुन बे
ई बता तुम्हरो बियाह होई कभो ?
न तुम्हार घर परिवार न माई दादा, के बेही आपन बिटिया तुम्हरे संग रे

नशे में बोझिल दाड़िम की आँख में पहाड़ी बंजारों का झुण्ड बरफ का तूफ़ान और बदहवास भागता एक पांच साल का बच्चा तैर गया।

चल चल रात हो रही, घर चलते हैं आज तो शिवाले के बरामदे में भी न जा सकूंगा, महतो काका सीवान वाली मड़ई में सोना होगा।
अंगड़ाई लेते हुए दाड़िम ने कहा..

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रात का पहला पहर है, आधे घंटे की टिप टिपाती बारिश के बाद सावन का आसमान साफ़ था, मचान की मड़ई से दाड़िम दूर तलक पसरे धान के खेतों पर टिमटिमाते सितारों को झांकता है, टाक झाँक में उसे उत्तर के पहाड़ दिख जाते हैं…
दाड़िम फिर से पहाड़ी बंजारों और बर्फीले तूफ़ान के सपने में खो जाता है…

सहसा नील गायों का एक झुंड मचान के ऐन बगल से भागता है तो दाड़िम की तन्द्रा टूटती है, खेत के मेढ़ों पर एक आकृति दीखती है
कौन है
दाड़िम चौकन्ना होता है

स्स
धीरे बोलो दाड़िम
मैं हूँ
मैं उरमा
मैंने सुना भट्ठे से तुम सीधे यहां आ गए, गाँव में किसी के भी घर खाना नहीं खाया

तो क्या करता
उतने नशे में किसी के घर को अपवित्र करता?

तुम भी न मौगे
भूखे नींद कैसे आती? नीचे आओ, मैं रोटियां लायी हूँ तुम्हारे लिए

मेरे लिए?
इतनी रात को? महतो काका ने ??

अरे नहीं बुद्धू, बाबा तो मामा के गाँव गए शाम को ही, मैंने खुद सोचा.. अब तुम पूरे गाँव का इतना ख़याल रखते हो तो तुम्हे भूखा कैसे रहने देती..

लाओ दे दो, पानी भी लायी हो?
मचान से उतरते हुए दाड़िम ने पूछा

सब लायी हूँ दाड़िम, पर क्या मुझे मचान पर नहीं बिठाओगे? मैं भी इस चांदनी रात में धान के इन खेतों को ऊपर से देखना चाहती हूँ।

उसमें क्या है
देख लो
और दाड़िम उरमा को सहारा देकर मचान पर उचकाता है।

लो खाओ,
रुमाल में बंधी रोटियां खोलते हुए उरमा ने कहा।

सुनो दाड़िम, एक मुझे फिर से सुनरकी बुलाओ

क्यूँ बुलाऊँ? तुमने तो मना किया है, तुमको बुरा लगता है
बुद्धू हो तुम दाड़िम
पानी का लोटा पकड़ाते हुए उरमा शरमाती है.

लोटा पकड़ते हुए, जान बूझ कर छुवा दी गयी उँगलियों से स्पर्श से दाड़िम चिहुँकता है, अरे !!!

हे दाड़िम, तुम अपनी बांसुरी लाये हो?
सुनाओ न

इतनी रात को? सीवान में?
पागल हो गयी है क्या तू उर्मियाँ? घर जाओ बहुत देर हो रही

उहुँह
उरमिया नहीं, सुनरकी
तुम्हार सुनरकी और हम तुम्हारे लिए खाना लाये हैं तो बांसुरी तो सुन कर ही जाएंगे वैसे भी गाँव दूर है रात भी आधी से ज्यादा बीत गयी है सुनते सुनते भोर हो जायेगी और चली जाउंगी

नहीं, तू अभी चल, मैं तुझे छोड़ आता हूँ..

तो यूँ कहो न कि तुमको बजानी ही नहीं आती, बेच सकने भर की पिपिहरी बजाते हो मेले में
उरमा ने नाक चढ़ाकर कटाक्ष किया

रुक फिर
सुनाता हूँ

और सावन की उस भीगी रात धान के फूटते कल्लों ने बांसुरी सुनी, जादुई बांसुरी

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दाड़िम
ओ दाड़िम
तू यहां सीवान में सो रहा है
हम लोग तुमको पूरे गाँव में भोरे से खोज रहे हैं !

क्या हुआ तिलई काका? सब कुशल तो?

हाँ सब कुशल है, ऊ महतो का संदेसा आया है भवानीगंज से, उरमा के नाना नहीं रहे, सो उरमा को भवानीगंज पहुँचाना है, बेटा यही जून निकर जाओ सांझे तक पहुँच जौबो

ठीक है काका, कमर पर गमछा बांधते हुए दाड़िम तैयार होता है।

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बहुत बूढ़े थे तुम्हारे नाना? कोई बीमारी थी?

पता नहीं, बहुत बचपन में एकबार देखा था उनको बस…

दाड़िम सुनो
थक गयी हूँ यहीं रुको थोड़ी देर, देखो तो सामने की नदी और ये कचनार का पेड़, यहां सुस्ताते हैं फिर चलते हैं – पीठ पर टांगी गठरी को जमीन पर धरते हुए उरमाँ ने कहा…

ठीक है

दाड़िम भी कचनार के तने से पीठ टिका तक बैठ गया, पीठ के झटके से हिले कचनार की डाल से कचनार के बैगनी फूल उरमा पर झर पड़े,

हो हो हो
ले सुनरकी तेरा बियाह हो रहा

धत्त
दाड़िम के मजाक पर उरमा शर्माती है,

बुद्धू हो तुम

क्यूँ? मैं काहे बुद्धू?

और नहीं तो का
कुछ समझते ही नहीं
मौगे !!

मैं …… मैं न तुम से ब्याह करना चाहती हूँ मेरे दाड़िम
उरमा नदी की ओर देखते हुए सकुचाती है !

क्या???

बौरा गयी है तू ? गोबर खा लिया है? समझ रही है क्या कह रही है तू?

मुझसे? मुझसे? बियाह करेगी?

काहे? तुम में क्या बुरा है?

बुरा? अरे लाख बुराईयाँ हैं मुझमें, एक नंबरी दारूबाज हूँ, घर दुवार महतारी बाप कोनो का पता नहीं मेरे दिमाग न फिराओ मेरा मार देंगे तुम्हें दाड़िम चीख पड़ता है।

तो मार दो न, मार ही डालो, कहे देते हैं ब्याह करेंगे तो तुमसे करेंगे नहीं तो जान दे देंगे
– कहते कहते उरमा नदी की ओर भागती है।

अरे रुक रुक
रुक
सुन ऊर्मिया

दाड़िम बदहवाश हो पीछे भागता है!

क्या करने जा रही थी?

जान देने और क्या, इतने दिनों से मैं कहने की कोशिश कर रही थी और तू समझता नहीं था, आज सब खोल के बोला तो मना करता है – उरमा सुबकते हुए बोली।

नहीं रे
सुनरकी मैं हर बार समझता था तुझे, पर अपनी औकात जानता था सो चुप था
तुमसे ब्याह नहीं कर सकता मैं…

क्यों?

तुमको खिलाऊंगा क्या? रखूँगा कहाँ?
और भी महतो काका?
गाँव वाले??

ई लोग?
मार ही डालेंगे मुझे इस बात पर

तो मुझे शहर लेते चलो दाड़िम इतनी सुन्दर बाँसुरियां बनाते हो वहीँ ये धंधा जमा लेना मैं भी कोई काम धंधा खोज लूंगी, दोनों निबाह लेंगे।

ओह उरमा
बहुत पागल है तू

अच्छा चल
अभी तू नाना के घर जा
मैं शहर में कोई नौकरी तलाशता हूँ

फिर इस पर सोचेंगे

सोचेंगे नहीं, हम ब्याह करेंगे दाड़िम और तुमसे ही ब्याह करेंगे…

कास की पगडंडियों के उस कचनार की छाँह में दाड़िम से लिपट कर फफक पड़ी।
(दूर उत्तर के पहाड़ पर कोई आवारा बादल बरसते हुए बिजलियाँ गिरा रहा था )

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क्या
बोखत, मैं क्या सुन रहा हूँ?
तुमने भौजी को छोड़ दिया?
अब विदा नहीं कराओगे उनको?
गलत है यार ये
गिलास में उलेड़ी हुयी कच्ची के कड़ुए घूँट के साथ दाड़िम ने कहा

हाँ छोड़ दिया उसको
और सुन बे हरामी
हम तुम्हरे कोनो यार वार नहीं

हम महतो हैं महतो
बोखत महतो
मास्टर बोखत महतो
हमरी सरकारी नौकरी लग गयी है
भवानीगंज मिडिल के मास्टर हो गए हैं हम

नशे में धुत्त बोखत अट्टहास करते हुए बोलता है

(भवानीगंज …… उरमा / नाना / कचनार / नदी कौंध जाते हैं दाड़िम की निगाह में )

कब जाओगे बाबू?
मैं पहुचाने चलूँ तुमको?

नहीं रे दाड़िम, तू कहाँ चलेगा, मैं चला जाऊँगा
पैदल नहीं जाना है न
किराए पर कर टमटम लिया है

मास्टर बोखत महतो अपनी कालर ठीक करते हुए बोला

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हाँ काका
ई गट्ठर कहाँ पटकना है?

सुन्नर महतो के धान के खेतों की कटाई में हाथ बंटाते हुए दाड़िम ने पूछा।

दक्खिन वाले वसारे माँ रे दाड़िम।

ठीक काका
हे काका ई उर्मियाँ नाय आई अबही तक बड़ा दिन रुक गयी नाना किहाँ
कब आई भला ?

फागुन माँ उहके मामा के गौना है बेटा, चैत तक आई
गूहन के कटनी माँ,

हमही जॉब लावे काका।
दाड़िम ने साधिकार कहा।

नहीं रे बाउ, कहाँ परेशान होबे
औ फिर अपने बोखत मास्टर भी तो भवानीगंज माँ हैं, चैत माँ उनके छुट्टी पड़िहे बात भई है उन्हीं के साथ चली आई।

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अगहन से फागुन तक दाड़िम मेलों मेलों घूमता, शहर शहर भागता फिरता रहा
उसको उरमा की प्रतीक्षा थी
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काका
कौनो गाड़ी आ रही अपने गाँव की ओर
सुन्नर महतो के दरवाजे पर हाँक लगाते हुए दाड़िम निहाल होता है

अरे
ई तो अपनी सुनरकी है, अपनी उरमा
मैंने तो शहर में कमरा और नौकरी खोज ली है, मिलते ही बताऊंगा उरमा को
(दाड़िम मन ही मन बुदबुदाता है )

अरे
ई लो हम तो भूल ही गए, सावन के फूले कचनार को पानी बदल बदल कर अब तक उरमा के लिए ही सहेजा था, उसको पहुत पसंद आएंगे
ले आऊँ
(दाड़िम शिवाले के पीछे वाले ताल की ओर भागता है )

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काका उर्मियाँ आ गयी ?
बुलाओ तनिक, मामा किहाँ से आई है
देखूं जरा कुछ मोटाई भी या वैसे ही है ?

सुन्नर महतो से दाड़िम ने मनुहार की।

ऊ सो रही है रे
कहती है थक गयी हूँ।

कोनो बात नहीं
कल परसों में देख लेंगे

(दाड़िम गमछे में सहेजे कचनार के फूल सहेजता है )
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हे सुनरकी सुन
तीन दिन हुए तुमका आये
दिखी नहीं तुम

देख तेरे लिए सहेजे कचनार भी सूख गए इन तीन दिनों में

शिवाले की दीवाल पर टेक लगाए दाड़िम ने कुएं से पानी खींचती उरमा से कहा।

हाँ
कुछ बुखार लग रहा था
और दाड़िम की देखे बिना ही उरमा चली गयी

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ले रे दाड़िमवा
बिना झिझके ले, अंग्रेजी है
पैसा कमाता हूँ
अब जब तक हूँ तब तक कच्ची न पीने दूंगा तुम्हें
गिलास भरते हुए, बोखत ने कहा।

यार बोखत एक बात कहूँ ?
(दाड़िम ने धीरे से सहमते हुए कहा )

यार ?? फिर से यार बोला ?
भूल गए ?
अबे तू मेरा यार नहीं है
चल खैर बता

मैं
मैं न उरमा से ब्याह करने जा रहा

क्या? क्या ??
तू ?
उरमा से ब्याह ??

का बे पगला गए हो ?

नहीं बाबू !
ऊ पगला गयी है हमरे प्रेम में, हम जानते हैं गाँव वालों को ई मंजूर न होगा सो हमने शहर में नौकरी और कमरे का इंतजाम भी कर लिया है। बस ई उरमा का बुखार ठीक हो जाए तो हम शहर निकल जाएंगे..
हाँ मगर तुमको अपना पता बताएँगे जरूर, किसी और को न बताना बाबू,
आप हमें अपना यार भले न मानो बकी हम आपको बहुत मानते हैं
आप आओगे न बाबू? हमसे मिलने?
मैं समझूंगा पूरे गाँव से मिल लिया।

(दाड़िम ने मासूमियत से मिन्नत की )

क्यों नहीं दाड़िम
मैं जरूर आऊंगा, तुमने तो दिल खुश कर दिया लो एक गिलास और लो
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हे दाड़िम
सुनो
तुमतो भूल ही गए हमको, मिले तक नहीं चार दिन से

(उरमा ने आँखों में शरारत भर के दाड़िम को छेड़ा )

मैं??
अरे मैं तो रोज़ तुम्हारे घर जाता था, काका कहते तुम्हे बुखार है सो ……

अच्छा छोड़ो
आज रात को सीवान वाले मचान पर मिलोगे? अपनी बांसुरी भी लेते आना
बहुत सारी बातें करेंगे,

हाँ मैं पक्का आऊंगा उरमा।
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दूसरी सुबह समूचे गाँव में हाहाकार मचा हुआ था, महतो के उत्तर सीवान वाले मचान के पास किसी ने दाड़िम को मार डाला था समूचे शरीर में चाकुओं के सैकड़ों घाव थे
सर कूचा हुवा / आँखें बाहर

(पास में अंग्रेजी शराब की दो बोतलें और मैले से गमछे में कचनार के कुछ सूखे फूल मिले )

– अमित आनंद पाण्डेय

पण्डित राज और लवंगी : गंगा की गवाही कि प्रेम न हारा और धर्म भी जीता

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