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कविताएं कुछ प्रेम पगी

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उसके लिए भी, जिसका चेहरा स्मृति में धुंधला हो गया है, पर उसका राशिफल आज भी पढ़ता हूँ, और उसके लिए भी जो आभासी संसार मे रहती है, पर लगता है कि हमारी रेखाएं कहीं ना कहीं तो जुड़ती है.

तुम वही हो ना,
जो बदल सकती है,
मौन को मुखर में,
और छेड़ सकती हो, राग आमंत्रण,
अपने निर्दोष नयनों के स्वर में.
अमिय हलाहल मद भरे, की उपमा,
सच होती है तिल अंकित तुम्हारे ही अधर में.

तुम्हें किस नाम से पुकारूं,
तुम्हें किस उपमा से सवारूँ,
तुम्हें देखते, ना मुझे देख पाए कोई,
तुम्हें अब और किस दिशा से निहारूँ.

तुम्हारे, मधु से मधुर होने में कोई संशय नहीं है,
अप्राप्त हो, तुम्हारे जाने का मुझे भय नहीं है.

वीणा(मौन) का निनाद तुम ही हो,
अतृप्ति का प्रतिसाद तुम ही हो.
तो मैं तुम्हें भाव देता हूं, तुम मुझे छंद दे दो,
निर्बंध कर दो मुझे, बस अपनी एक गंध दे दो.

– विभाष

उन अद्भुद दृग दुर्गों की स्वामिनी के लिए, जो अपनी चतुरंगणी सेना से अकल्पनीय भी कृत कर सकती है.

इन नयनों में अंजन ना भरो,
कनककान्ति कुसुम कलेवर,
क्यों कृष्ण कलुषित धूम धरो,
इन नयनों में अंजन ना भरो.

शिल्प नासिका, है आद्र अधर,
स्वयं मदन दें, मधुमय सागर,
रक्षा शरणागत के प्राण को,
ना ओष्ठपुष्प अभिषिक्त करो,
इन नयनों में अंजन ना भरो.

सुधा कलश कपोल भरे,
केश विशेष कलोल करे,
तुम शशांक की शुभ्र ज्योत्स्ना,
शिवतनुजा सी निर्मल ही रहो,
इन नयनों में अंजन ना भरो.

– विभाष

नीला रंग शायद
कोई डूबा हुआ हिस्सा है
नदी का

जिसमें तैरती स्मृतियाँ
मछलियाँ हैं रंग-बिरंगी

तुम देखना
तुम्हारे पाँव के इंतज़ार में
एकांत हमेशा छुपकर बैठता है वहाँ

और मछलियों को
सिखाता रहता है, चूमना

– अनंत

एक रोज़ तुमने पूछा था मुझ से
क्या तुमने बताया हमारे बारे में किसी को
मुस्कुरा के कहा था मैंने
क्या ज़रूरत है
यह बात तो तुम्हारे, मेरे और खुदा के बीच की है
किसी को क्या लेना देना इस से

वैसे भी कोई नहीं समझ पाएगा
तुम्हारा और मेरा रिश्ता
जो है भी और नहीं भी
जो सब कुछ है और कुछ भी नहीं

आज किसी दोस्त ने बताई
ख़ानाबदोश औरतों की मोहब्बत की दास्ताँ
कैसे वो अपनी पुरानी या गंदी घाघरी उतारती हैं

पहले सिर की तरफ से पहनी जाती है नई वाली
और अंदर से ही नीचे को उतार दी जाती है पुरानी वाली
जब मरती हैं तब भी नहीं बदला जाता यह चलन

कहते हैं नेफे की जगह कमर पे पड़ गई महीन सी रेखा में
वो गुदवा के रखती हैं अपने मेहबूब का नाम
कोई नहीं देख सकता उसे
कोई भी
सिर्फ वो जानती हैं यह राज़ या फिर उनका खुदा

हमने भी तो अपने ज़ेहन में, दिल में
छुपा रखी है एक महीन धुंधली सी रेखा
जिस पे उकेर रखा है एक बेशकीमती नाम

नाम जो पनाह है
नाम जो मरुद्वीप है
नाम जो एक मात्र हक़ीक़त है
नाम जो इक ख्वाब है जिस पे कई सौ हक़ीक़तें वारी

ज़िंदगी की स्टेज पे निभाते हुए सब किरदार
मोनोलॉगस और सोलिलोक्वीस सब रहते हैं आरक्षित
उस एक नाम के लिए

तभी तो मुझे इन लंबी काली रातों से बेहद मोहब्बत है
कि मेरी हर रात होती है चाँद रात…

– राज

विश्व की तमाम सभ्यताएं,
जब पुरातत्वविदों की राह ताक रही होंगी;
तब मेरे अपने खंडहरों को तलाश रहेगी तुम्हारी!

हृदय में बनी मृदा परिच्छेदिकाओं के अंतरालों में,
जिनमें अक्सर किसी काल के चिह्न सहेजे गए होतें हैं,
उनमें से अधिकांश चिह्नों के विश्लेषणार्थ,
तुम्हें आना होगा और लिखना होगा कालविवरण!

यूँ तो सभी ने अपने रोसत्ता खोज लिए हैं,
और बखान कर दिया है वर्तमान के बीज को,
लेकिन मेरा रोसत्ता, जिसे तुम्हें लिखना है;
तुम्हें आना होगा आहटों से स्पर्श करते लिखना होगा!

तुम्हें अंकित करना है इतिहास मर्म,
बताना है अनुसंधान का महत्व और,
रचनी है विविध भाषाएं जिनमें दृश्य अक्षर नही होंगे;
तुम्हे आकर बताना है दबी इमारतों की नींव का आयाम!

तुम्हे संहिताओं के निर्माणों की कहानी बतानी है,
जिनसें दमित हुई हैं सभ्यताएं,
जिन्होंने नही देखा रेगिस्तानी तूफ़ान,
उन नखलिस्तानों को उन्हें सौंप कर,
दीवारों से लिपट जाना है;
जिनसें रक्तरंजित हो जाओ तुम और,
दीवारों पर अंकित हो सके तुम्हारा समर्पण!

– भीष्म

फीचर चित्र के लिए अभिनेत्री और एंकर तब्बसुम जी और बॉलीवुड फोटोग्राफर जयेश शेठ को आभार

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