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तुम्हारा दिल या हमारा दिल है…

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प्रतीक्षा चिरनिरन्तर है. वह प्रतीक्षा ही कैसी जो विरत हो जाये?

प्रतीक्षा प्रारंभ होती है कभी समाप्त नहीं होने के लिए!

प्रतीक्षा रोती है कलपती है लेकिन थकती नहीं!

प्रतीक्षा मोजड़ी में अनवरत चलने के घाव दे के आह को नित्य नव्य बना देती है!

प्रतीक्षा ऊपरी सतह से समतल राह सी दिखती है लेकिन अंतर में कंकड़-पत्थर के कठोर धरातल को चुनती है.

प्रतीक्षा नीले आकाश में छाए हुए बादलों में विरह की सघन पुरवैया के साथ डोलते हुए लौटते मानसून के साथ आये और आँखों से आँसू बन के बरस पड़े.

प्रतीक्षा मृत्यु और जीवन से अलग-थलग जीती है. लेकिन अपनेआप में स्वयं के एकली होने का बोध नहीं कराती. इसलिये नहीं उसमें यह सामर्थ्य नहीं; बल्कि इसलिए कि दो छोरों के मिलन का सहजोर केंद्रबिंदु होती है.

इसलिये ही तो इतने जन्म मोती बन जाते हैं विरह के धागे में. और मोती भी कौन से? वह सीपी वाले नहीं जो एक जोड़ सीप में एकल मोती के से पनपते हैं; बल्कि रुद्राक्ष के मोती जो जीवनी के पेड़ से झरझर झरते हैं सहस्त्रों की गिनती में. वे एकसाथ समेटे हुए स्वयं को, उन पर सादगी नहीं होती. वे चढ़ते-उतरते आवेगों का खुरदुरापन समाहित किये होते हैं अपनी गठीली देह में…

और एक दिन रुई के फाहों को विरह के चिरघावों पर लगाने के बजाए उँगली के पोरों से युग को क्षण बनाते हुए उनमें कच्चे गठबंधन की हल्दी लगा के हृदय की चहारदीवारी के कोरों पर टांक देती है ये प्रार्थना करते हुए कि हे! आस! तुम पूरी मत होना यों ही चिरयौवना होकर राह के किनारे सतत रहना और जन्मजन्मांतर के वाहनों को आँसू के ईंधन दे कर बीत जाने देना पीठ के पीछे से…

इसलिये सदा प्रतिक्षित विरहन के कंठ सच्चे सफेद मोती का हार नहीं; रुद्राक्ष की माला पाओगे. वह प्रतीक है कि उलझे लटों वाली केशिप्रिया ने अब तक प्रतीक्षा में इतने जन्म लिए और आंखों से अनवरत आँसू ढार के माला पिरो कर कंठ में धार लिया होगा.

– गीतिका वेदिका

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