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यात्रा : अंतिम यात्रा पर पहला क़दम

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यात्रा और पड़ाव

यात्रा

प्रेम एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ना तो था नहीं
कि इस बार मैं नेपाल से न होकर तिब्बत से चढ़ना शुरु करता.
प्रेम किसी रोमांचक कहानी को गढ़ना भी नहीं था
कि मैं पूरा परिवेश और सारे पात्र ही बदल डालता.

इस बार प्रेम सवारी गाड़ी की स्लीपर क्लास में होने वाली एक लम्बी यात्रा थी
जिसमें मैं और तुम भागते-भागते साथ-साथ चढ़े थे.
गाड़ी को अपने तय रास्ते पर चलना था
और हम स्टेशनों के नाम और उनके आगमन का समय नहीं बदल सकते थे.
इतना ज़रूर था कि मैं पहले यह यात्रा कर चुका था
और तुम अब यह अनुभव मेरे साथ लेना चाहती थी.

हमारे सहयात्रियों को बार-बार शक होता था कि हम प्रेम में हैं.
उनकी आँखों में निरंतर किसी बंद लिफाफे को पढ़ने की सघन कोशिश थी.
वे प्रेम को लेकर अवश्य ही जीवन भर असमंजस की स्थिति में रह चुके होंगे.
उन्होंने अब उसे स्त्री-पुरुष के बीच उपजने वाला
सबसे मूर्खतापूर्ण और अनावश्यक भाव मान लिया था.
हमें उनकी खास परवाह नहीं थी.

पहले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो मैं चाय ले आया
और हम दोनों ने एक ही गिलास में सुड़क-सुड़क कर चाय पी.
मुझे लगा हर बार चाय की मिठास बढ़ जाती है
जब वह, अपने होठों से उसे छू लेती है.

फिर गरमा गरम पकोड़ियाँ भी मिलीं जिनमें तीखी हरी मिर्च थी.
मैंने कहा – संवेदना को हरी मिर्च बहुत पसंद थी.
तुमने बिस्किट का पैकेट निकाला और कहा – तुम्हारा मुँह जल रहा है, मीठा खाओ.
इन पकोड़ियों को मैं बाहर फेंक रही हूँ.

साँझ हमारी खिड़की से होकर उस की गुलाबी साड़ी तक पहुँच गई थी. ट्रेन इस समय वाराणसी के पास गंगा के पुल से गुज़र रही थी.

मैंने कहा – मेरी एक कविता में इस पुल का ज़िक्र है.
हाँ, उस कविता को मैंने पढ़ा था, उस समय मैंने सोचा था कोई व्यक्ति कैसे कर पाता है इतना प्रेम?
सुनोगी?- मैंने पूछा.
नहीं, निश्चय ही वह तुम्हारी श्रेष्ठ कविता है पर अब मैं उसे नहीं सुन सकती. वह मेरे लिए नहीं लिखी गई थी.
जानते हो, तुम्हारे साथ चलते हुए
तुम्हारी स्मृतियाँ काँटों की तरह मुझे बार-बार घायल करती हैं.
यह मेरी नियति है.
यह मेरे प्रेम की नियति है.

लम्बे समय तक हम पृथ्वी के दो ध्रुवों पर चुपचाप बैठे रहे.
वह टिश्यू पेपर से अपनी आँखों के काजल को रोकने में लगी थी.उसकी आँखें बहुत गीली थीं.
अगर वह ट्रेन में न होती तो मेरे काँधे पर सिर रख कर फूट-फूट कर रो रही होती.

उसने रात्रि-भोज के लिए मना कर दिया.
दुःख भी तो पेट भर देता है.
मैंने उसकी बर्थ पर गुलाबी चादर बिछाई और कंधे से पकड़ कर लिटा दिया.
नर्सरी प्रिंट की दोहड़ में लिपटी वह,
मुझे चौदह साल की बालिका नज़र आ रही थी.

उसने मुझे पास बुला कर धीरे से कहा –
सुनो, हम एक नई यात्रा पर जा रहे हैं, तुम स्मृतियों का इतना भारी थैला कमर पर लाद कर क्यों चल रहे हो?
गंगा अभी फिर से मिलेगी पटना में,
उस में तिरोहित कर दो न उसे!

ट्रेन धड़धड़ा कर दौड़ती रही थी
और वह ऊपर की बर्थ पर थक कर सो गई थी.

मैं नीचे की बर्थ पर रात भर गंगा का इंतज़ार करता रहा.
फिर न जाने कब, मुझे भी नींद आ गई.

सुबह उसने मुझे नींद से जगाते हुए पूछा – कब तक सोते रहोगे?
अभी आसनसोल था,
ट्रेन कब पहुँचेगी हावड़ा?

उसकी आँखों में देखते हुए मैंने कहा – मुझे नहीं मालूम, सुनेत्रा!
मैं तो गई रात सारी स्मृतियाँ गंगा में बहा कर ही सोया था.

– राजेश्वर वशिष्ठ

॥ पड़ाव ॥

हज़ार बारह सौ किलोमीटर चलने के बाद
ट्रेन की भी फूलने लगती है साँस.
पटरियों की शिराएँ खिंचने लगती हैं किसी ऐंठन के प्रभाव में.
दोनों ओर से गुज़रने लगती हैं
हूटर्स बजाती लाल-नीली आवारा लोकल गाड़ियाँ.
नज़दीक होकर भी बहुत दूर रह जाता है हावड़ा स्टेशन.

खिड़की से झाँकते सूर्य की साक्षी में
तुम हाथ-मुँह धोकर हो गई हो तरोताज़ा.
मोबाइल फोन की स्क्रीन पर कैमरे में झाँकते हुए
माथे पर चिपका लेती हो छोटी-सी चमकदार हरी बिंदी.
सहयात्रियों की भरपूर उपेक्षा करते हुए
बैठ जाती हो मेरे बहुत करीब,
मेरे कँधे पर सिर टिका कर.
अनजान स्टेशन के आउटर पर खड़ी ट्रेन
सीटी बजा कर रेंगने लगती है धीरे-धीरे.

दाँतुन बेचने वाली लड़की को बिना दाँतुन लिए
देते हुए दस रुपये का नोट
प्रसन्नता और आश्वस्ति का भाव है तुम्हारे चेहरे पर,
फिर भी बीते कल का सारा नैराश्य और कलुष
अब तक बिखरा पड़ा है कूपे की सीटों के नीचे.
मनुष्यों की अनुभूतियाँ चिप्स और बिस्किटों के रैपर्स की तरह
हवा के साथ उड़ कर
कुछ दूर चलती ही हैं साथ-साथ.

चाय और मूड़ी बेचते अगणित हॉकर्स के पैरों से टकराते हुए
दोनों अटैचियों को सीट के नीचे से निकालते हुए
मैं कहता हूँ – सामान संभाल लो ठीक से
आने वाला है हावड़ा स्टेशन.
यहाँ खाली हो जाएगी समूची ट्रेन.
हमारे साथ-साथ चलती आई गंगा
ठहरेगी नहीं यहाँ पल भर भी
नज़र झुकाए निर्बाध चली जाएगी बंगाल की खाड़ी की ओर
भव्य, ऐतिहासिक हावड़ा ब्रिज के नीचे से.
यहाँ गंगा को कहते हैं हुगली,
लोग इसे पार करते हैं बड़े स्टीमरों से भी.
हावड़ा और कोलकाता को जोड़ता है यही भीमकाय लौह-पुल.

बहुत लंबे प्लेटफॉर्म को पार करते हुए पूछती हो तुम –
अब हम कहाँ जाएँगे?
चिंता और लज्जा का बादल ठहर गया है तुम्हारे चेहरे पर.
होटल बुक किया है मैंने लिंडसे स्ट्रीट में. वहाँ चलेंगे.
डीसेंट होटल है.

उसके चेहरे पर विस्मय
किसी टनल से गुज़रती गाड़ी की खिड़कियों के भीतर आती
मर्करी बल्बों की बार-बार कटती रोशनी की धाराओं-सा
बह रहा था.
अनिश्चय प्रेम की चुनरी पर अवांछित च्युइंगगम की तरह चिपका था
और वह पूरी शक्ति से उसे उतार कर फेंक देना चाहती थी.

टैक्सी-स्टैंड पर आकर उसने नज़र झुका कर कहा –
अलीपुर में मेरी बुआ रहती है, तुम बुरा न मानो तो मैं वहाँ चली जाऊँ?
उनके लिए एक सरप्राइज़ होगा.
कह दूँगी किसी सेमिनार में कोलकाता आई थी.

हावड़ा ब्रिज पर बैठा सलेटी कबूतरों का झुंड
अचानक उड़ता है किसी पटाख़े की आवाज़ से.

ठीक है, फिर मुझे पियाली घोष को खोजना होगा, इसी वक्त.
उसे फोन लगाता हूँ!

टैक्सी में बैठ कर
शरारती अंदाज़ में मुझे नोचते हुए उसने कहा –
तुम्हारे पास कितने थैले भरे हैं स्मृतियों के?

एक भी नहीं…. सुनेत्रा,
पियाली घोष तो मेरी एक पुरानी कविता की चर्चित पात्र है.
अब मेरे पास उसकी कोई जानकारी नहीं है.

हावड़ा ब्रिज पार करते हुए
हमारे बीच प्रेम किसी बरसाती नदी की तरह बह रहा था.
आज हम दोनों
उसमें डूब जाना चाहते थे.

– राजेश्वर वशिष्ठ

अंतिम यात्रा पर पहला क़दम

उस सिरफिरे ने जब उस देवी को देखा
तो उसका चेहरा दहकते हुए अंगारे सा हो गया

आने वाली चाँद रातों की खूबसूरती का ख्याल
उसके चेहरे पे गुलाबों की सी नक्कासी कर गया
वो थोड़ा शरमाया, मुस्कुराया
जानते हुए भी कि उस देवी तक पहुँचने के लिए
उसे लांघना पड़ेगा अंगारों से दहकता हुआ
ज़मीं का एक टुकड़ा

जैसे लोग करते हैं मन्नत माँगने से पहले या फिर पूरी होने के बाद
और फिर उस पार इतना वक़्त भी नहीं होगा
कि वो बैठ कर कुछ पल निहार सके
पलोस सके अपने पाँव के छालों को

उसे जल्द से जल्द वक़्त की गिरफ़्त में पड़ी
उस देवी को मुक्त कराना होगा
न सिर्फ वक़्त से मुक्त
पर मुक्ति से उत्पन्न ग्लानि से भी मुक्त

देवी है पर भूल गई है अपना होना
आह! कितनी सुन्दर है, कितनी नादान, कितनी भोली
उसे सोच कर ही कहर बरपा है मुझ पर
मिलेगी तो न जाने क्या होगा

उसने अपने जूतों के फ़ीते खोले
अपने पाँव धोए साफ़ निर्मल जल से
और चलना शुरू कर दिया दहकते हुए अंगारों पर…

– राजेश जोशी

रैलिया बैरन पिया को लिए जाए रे

पटरियों पर सरपट दौड़ती रेल, कितने सपनों, कितने अरमानों को ढोती हुई आगे रेंगती बढ़ती जाती है, अपने गंतव्य की ओर!

यह बैरन रेलगाड़ी, इसे आग लगे, जो मेरे पिया को मुझसे दूर… बहुत दूर लिए जा रही है. यह मुई रेल, पटरी पर चली जा रही है न जाने कब लौटने के लिए!

सच है,न जाने कितनी ही नव विवाहिताओं के कलेजे को चीरती हुई, सीटी बजाती हुई रेल अपने संग अशेष बिरहिनों की आह को खुद में समेटे आगे बढ़ती है!

बिहार और उत्तरप्रदेश में रोज, न जाने कितनी जोड़ी आंखें अपने पति को रेलगाड़ी में जाते देखती हैं… एक बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में.. रोज़गार की तलाश में!

प्रतीक्षा का अन्तहीन सिलसिला, रो कर नही, तपस्या कर गुज़ारा हमारी बहनों ने.. ऐसे ही एक बहन ने अवध के सुल्तानपुर में गाया,

जउने टिकसवा से सइयां मोरे जईहे
पानी बरसे टिकस गलि जाए रे..
रेलिया बैरन..

पूरी दुनिया में कहीं जाऊँ, मुझसे इस गीत की फ़रमाइश ज़रूर होती है, लद्दाख में भी हुई.

और मैंने यह गीत गाया, समर्पित करते हुए अपने इन भाइयों को, जिन्हें उसी दिन सुबह लद्दाख में सड़क निर्माण में लीन मैंने देखा था… घर परिवार से बहुत दूर, विषम परिस्थिति में!

पूर्वांचल से आये हमारे इन भाइयों से मैंने बात की. अप्रैल में आये हैं, 10 दिन लेह में रहकर ऑक्सिजन की कमी से शरीर को ढालने के बाद, पंद्रह हजार से अठारह हजार फीट की ऊंचाई पर सड़क निर्माण में काम करेंगे. बर्फ ज्यादा पड़ने पर वापस “गाँव” लौट आएंगे.

मैंने उन्हें, उनके पराक्रम, और सेवा को प्रणाम किया, और सोचा, पूरे देश की “इंडिया शाइनिंग” हमारे इन्ही श्रमिकों के बल पर है, जिन्हें उनकी प्रियाओं ने रोते-हंसते-गाते हुए परदेस भेजा..

“रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे..”
नमन उत्तरप्रदेश और बिहार के प्रवासी भाइयों को..
लोकगीतों को अपने आँसुओं से लिखनेवाली स्त्रीशक्ति को शत शत नमन..

– मालिनी अवस्थी

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